तर्ज : मैंने प्रभुजी के चरण पखारे …
मैंने प्रभुवर रूप निहारा, आनंद उपज्यो अपरम्पारा।।टेक ।।
अहो अमूर्तिक परम अतीन्द्रिय, रागादिक भावों से न्यारा।
निर्विकल्प निर्भद सहज प्रभु, ज्ञानानन्दमय नित अविकारा ।।1 ।।
देह देवालय माँहिं विराजे, अहो विदेहीनाथ हमारा।
परमब्रह्म शाश्वत परमातम, स्वयं सिद्ध ध्रुव जाननहारा।।2।।
देखो त्रिभुवन गुरु होते भी, सहज विश्व पर तैरनहारा।
निरवलम्ब अवलम्बन सांचा, भव सागर से तारण हारा।।3।।
अहो स्वरूप प्रत्यक्ष शुद्धातम, अनुभव में प्रत्यक्ष निहारा।
सहज ही भाऊँ, सहज ही ध्याऊँ, सहज पूज्य परमातम प्यारा।।4।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’