मैं वीतराग सर्वज्ञ प्रभु गुण गाऊँ रे | maim vitaraga sarvaj na prabhu guna gau n re

तर्जः मैं परम दिगम्बर साधु के गुण…

मैं वीतराग सर्वज्ञ प्रभु गुण गाऊँ रे।

नीराग ज्ञानमय ज्ञायक भाव सु पाऊँ रे ।। टेक ।।

तज गृहस्थपना दुःखकारी, मुनिधर्म धर्यो सुखकारी।
मैं भी रागादिक भाव असार लखाऊँ रे ।। 1।।

प्रभु निज स्वभाव साधन से, चहुँ घाति कर्म क्षय करके ।
जिन अनंत चतुष्टय पाया, शीस नवाऊँ रे ।। 2।।

नहीं शस्त्र-वस्त्र शृंगार, कर्मादि न अंग विकार।
लख सौम्यदशा प्रभु, सहज शान्तता पाऊँ रे।। 3।।

प्रभु समवशरण सुखकारी, अतिशय बहु विस्मयकारी ।
जो धर्म तीर्थ प्रगटाया, मैं भी पाऊँ रे ।। 4।।

दुखमय इस अशरण जग में, प्रभु तुम्हीं शरण देखे मैं।
जिनशासन से ही सहज मुक्त पद पाऊँ रे ।। 5।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ५४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’