मैं उस पथ का अनुगामी हूँ, जिस पर चलकर प्रभु मुक्त हुए।। टेक।।
है मूल अहो सम्यक् दर्शन, पथ सम्यग्ज्ञान विरागमयी।
पर से निरपेक्ष सहज स्वाश्रित, निर्ग्रन्थ मार्ग आनन्दमयी ।। 1 ।।
अविरल आतम अनुभव वर्ते, स्वयमेव स्वयं में तृप्ति हो।
सब ज्ञेय ज्ञान में रहें भले पर किंचित् नहीं आसक्ति हो।। 2।।
नहीं असत् विभावों की चिन्ता, नहीं वांछा हो पर भावों की।
निर्वेद रहूँ, निष्काम रहूँ, नहीं चंचलता हो भावों की।। 3।।
आराधन में ही मग्न रहूँ, ध्येय-ध्याता-ध्यान विकल्प नहीं।
निश्चलता हो अविकलता हो, जहँ कोई अन्तर्जल्प नहीं ।। 4 ।।
बस सहज ध्यान-धारा वर्ते, भव बन्ध टूटें शिव पाऊँ।
ज्ञायक हूँ ज्ञायक रहूँ सदा, अपनी प्रभुता मैं विलसाऊँ।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १४१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’