तर्ज : चालो-चालो जिनवर दरबार में…
मैं तो मूरति निहारूँ जिननाथ की, दीखे मूरत सहज निजनाथ की । ।टेक ।।
बिन शृंगार सहज ही शोभित, स्वाभाविक आनन्द से पूरित ।
निर्विकार शिवनाथ की।।1।।
अशरीरी चैतन्यमयी है, अद्भुत प्रभुता विलस रही है।
धन्य महिमा है चैतन्यनाथ की । । 2 ।।
यह विभूति और यह निस्पृहता, निर्विकल्प स्वाभाविक समता।
दीखे उपमा नहीं कोई नाथ की ।।3।।
जाननहार रहूँ निष्काम, निज में ही शाश्वत विश्राम।
भासे नहीं जरूरत साथ की।।4।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’