मैं तो जाऊँ शिखरजी वन्दन को’।
वन्दन को स्वामी, वन्दन को ।। टेक ।।
बीस जिनेश्वर मुक्ति गये हैं, दरश करत सब पाप छये हैं।
झट-पट पाप निकन्दन को ।। 1।।
पारस प्रभु जी की टोंक सु सोहै, भक्ति करत मम मन मोहे ।
मैं तो जाऊँ पूजन वन्दन को।। 2।।
भक्ति से जो दर्शन करते, नरक पशुगति दुःख नहीं भरते ।
चलो दुष्ट करम के खण्डन को।। 3।।
मंगलमय यह पर्वत सारा, जय-जय करत जहाँ नर नारा।
है आनन्द छायो जिनवर को ।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३०१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’