तर्जः तुझे बेटा कहूँ की वीरा…
मैं महाभाग्य से पायी, जिनवाणी मंगलकारी।
निज-पर विवेक प्रगटाया, हो परम साम्य अविकारी ॥ टेक ॥
माध्यस्थ रहें दोषों में, नहीं क्षोभ हृदय में आवे।
मोही कर्मों के प्रेरे, यों जिनवाणी समझावे ॥
देखो तो द्रव्यदृष्टि से, सब गुण अनंत के धारी ॥ 1 ॥
भक्ति हो देव-गुरु प्रति, गुणीजन से हर्ष अपारा।
संवेग-प्रशम-अनुकम्पा, आस्तिक्य भाव अवधारा ॥
निज परम ध्येय को पाया, हो ध्यान दशा सुखकारी ॥ 2 ॥
आदर्श परम प्रभु मेरे, गुरुओं की संगति पाऊँ।
सब दोष सहज विनशावें, निर्दोष स्वगुण प्रगटाऊँ ॥
मैं शीश नवाऊँ माता, आशीष दो आनंदकारी ॥ 3 ॥
जीवन का प्रति पल बीते, आराधन में ही मेरा।
चैतन्य-भावना भाऊँ, मेदूँ भव-भव का फेरा॥
निर्मुक्त तृप्त निज में ही, होऊँ चैतन्य-विहारी ॥ 4 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १६० से १६१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ ९१