मैं ज्ञायक हूँ मैं ज्ञायक हूँ,
मैं परमानन्द विधायक हूँ ।
निज में ही मंगल रूप सदा,
अतीन्द्रिय सुख का नायक हूँ ।।1।।
जीवत्व प्रभुत्व विभुत्व सहित,
कर्त्तृत्व और भोक्तत्व रहित ।
अनबद्ध स्पृष्ट अनन्य सदा,
मैं निज-पर का प्रकटायक हूँ ।।2।।
निज पर्यायें भी सहज होंय,
इस रूप नहीं किंचित् होता ।
पर का परिणमन स्वयं ही है,
पर कार्य हेतु नहीं लायक हूँ ।।3।।
मैं देव नहीं तिर्यंच नहीं,
नारक भी नहीं मनुष्य नहीं ।
हूँ नित्य निरंजन प्रभु सदा,
रागादि दाह्य का दाहक हूँ ।।4।।
नहिं कोई है शत्रु जग में,
अरु मित्र नहीं कोई मेरा ।
मैँ पर द्रव्यों से भिन्न सदा,
काया से रहित अकाय हूँ ।।5।।
मैं निराबाध लोकोत्तम हूँ,
अनुपम शीतल चिद् शक्तिमयी ।
है यद्यपि बल अनन्त मुझमें,
पर, पर को मैं असहायक हूँ ।।6।।
नहिं कोई सुन्दर शरण मुझे,
है व्यर्थ भटकाना बाहर में ।
नहीं कोई मुझे मुक्ति दाता,
मैं निज को मुक्ति प्रदायक हूँ ।।7।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ८३ से ८४