मैं आतम ध्यन लगाऊँ रे
मैं आतम ध्यन लगाऊँ रे ।।टेक।।
निज शुद्धातम ध्याते-ध्याते, भव सागर तिर जाऊँ रे ।।1।।
दंभ भरी दुनियाँ को तज कर, निर्ग्रन्थ पंथ अपनाऊँ रे ।।2।।
इन्द्रिय-विषय हलाहल भासें, ब्रह्मचर्य प्रगटाऊँ रे ।।3।।
प्रचुर स्वसंवेदनमय जीवन, ज्ञान सुधारस पाऊँ रे ।।4।।
आतम ध्यान ही उत्तम औषधि, भव का रोग नशाऊँ रे ।।5।।
स्वयं-स्वयं में तृप्त सदा ही, काल अनन्त रहाऊँ रे ।।6।।
प्रभुवर हो आदर्श हमारे तुम सम शिवपद पाऊँ रे ।।7।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ९०