तर्ज : महिमा है अगम जिनागम की…
महिमा अद्भुत जिनराज लखी।
जिनके दर्शन से अक्षय निधि, अपनी अपने माँहि दिखी। । टेक ।।
ऐसो परमानन्द भयो है, चाह दाह क्षण में विनसी।।१।।
जिनमारग अति सुखमय भासो, धारन की उर चटाचटी।।२।।
तत्त्वभावना सहज प्रवर्ते, भयी बन्ध की छटा छटी।।३।।
भक्तिभाव हृदय में उमगे, प्रभु गुण की रहे रटारटी।।४।।
जिन चरणों में शीश नवावें, सम्यग्ज्ञान कला प्रगटी।।५।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’