महावीर ने क्या किया, मिथ्यातम को दूर किया।
सबसे भिन्न त्रिकाली आतम, स्वानुभूति कर जोड़ लिया ।। 1 ।।
जग का होता स्वयं परिणमन, मेरा उसमें हाथ नहीं।
मैं यदि उसे बदलना चाहूँ, तो सुख का उत्पाद नहीं ।। 2 ।।
दृष्टि अतः हटाकर पर से, निज को दुख से पार किया।
यही मार्ग हितकारी सबको, ऐसा ही उपदेश दिया।। 3।।
निज की भी परिणति क्रम से ही, होती इसमें भेद नहीं।
उसका भी ज्ञाता ही रहना, करना उसमें खेद नहीं ।। 4।।
ऐसा चिंतन करते-करते दोष दृष्टि को त्याग दिया।
ध्रुव स्वभाव में तन्मय होकर, निज अनन्त सुख प्राप्त किया।। 5 ।।
दुख का कारण मिथ्यादर्शन, राग भाव अज्ञान है।
इनको दूर किया जब प्रभु ने, पाया पद निर्वाण है।। 6।।
वह निर्वाण महासुखमय है, अन्य सभी दुख रूप है।
बाह्य जगत् की ममता त्यागे, स्वयं होय शिव भूप है।। 7 ।।
प्रभु समान ही उद्यम कर लें, आत्मा की पहिचान धरें।
यथाजात निर्ग्रन्थ रूप धर, भाव शुभाशुभ दूर करें ।। 8।।
चित्स्वरूप ध्रुव ध्येय सु ध्यावें, दुखमय सर्व विभाव हरें।
सकल कर्ममल वर्जित अनुपम, परमातम पद प्राप्त करें ।। ९ ।।
निर्वाण महोत्सव तभी मनेगा, इसका यही प्रयोजन है।
राग-द्वेष को दूर कराने को ही, यह आयोजन है।। 10।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १३३ से १३४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’