तर्जः मीठो-मीठो बोल थारो काईं बिगड़े …
महावीर-महावीर-महावीर हो, वर्द्धमान सन्मति अतिवीर हो ।। टेक ।।
अन्तिम तीर्थंकर सुखकारी, पंचम बालयती अविकारी।
वीतराग सर्वज्ञ हितंकर, साँचे तारणहार शिवंकर।। 1।।
सकल विभावों से हो न्यारे, शासन नायक भविजन प्यारे ।
परम तत्त्व दर्शाया स्वामी, उपादेय तिहुँ जग अभिरामी ।। 2 ।।
परम तत्त्व मैं जाना-जाना, परमानन्दमय प्रभु पहिचाना।
अन्तर्मुख हो ध्याऊँ-ध्याऊँ, भाव सहित प्रभु शीस नवाऊँ ।। 3 ।।
मोहमयी जग से घबराया, सहज मार्ग तुम ही दर्शाया।
तेरे पथ का हो अनुगामी, पाऊँ शिवपद अन्तर्यामी ।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १२५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’