# महावीर निर्वाण दिवस- क्या ? क्यों ? कैसे ?
पं श्री कैलाश चंद्र जैन, शास्त्री बीकानेर
समाज में प्रत्येक पर्व बड़े धूमधाम से मनाते आ रहे है रक्षाबन्धन, दशलक्षण, दीपावली आदि सभी पर्वों की अपनी-अपनी प्रासंगिकता है। जैन समाज में दीपावली पर्व का प्रसंग मार्मिक एवं वैराग्यमय है, इसके रहस्य को आज हम भूलते जा रहे है और आधुनिकता की चका-चौंध में बह कर खुशियां प्रकट कर रहे हैं आज का दिन खुशी का ही नही, अपितु वैराग्य का भी दिन था, है और रहेगा, क्योंकि आज ही के दिन भगवान महावीर का सानिध्य सदा-सदा के लिए हमसे छिन गया था अर्थात् 527 ई० पूर्व में महावीर का निर्वाण हुआ था। (तिलोय पण्णत्ति 4/1208, उ.पु. 76/510,511)
(1) निर्वाण का महत्व :-
निर्वाण का व्युत्पत्ति परक अर्थ है निस्+वान निर् अर्थात् रहित वान अर्थात् शरीर(औदारिक)से रहित अवस्था एवं सिद्ध पद की प्राप्ति। निर्वाण एवं देहावसान, स्वर्गवास एवं देवलोक गमन में बहुत अन्तर है। महावीर का निर्वाण हुआ था। देवलोक गमन, देहावसान, या स्वर्गवास नही। क्योंकि जीव निर्वाण होने पर पुनः औदारिक, वैक्रियक शरीर प्राप्त नही करता है। जबकि देहावसान, स्वर्गवास या देवलोक गमन में निश्चित ही अन्य शरीर की औदारिक, वैक्रियक, तैजस, कार्मण शरीर की प्राप्ति होती है। महावीर ने सदा -सदा के लिए औदारिक शरीर के साथ-साथ कार्मण शरीर का भी त्याग कर अपने परम पद को अर्थात् सिद्ध अवस्था को प्राप्त किया था। देहावसान में तो देह +अवसान देह अर्थात् शरीर का अवसान अर्थात् समापा होना, अर्थात् इस शरीर का समापा होना। स्वर्गवास का भी शाब्दिक अर्थ पर विचार करें तो स्वर्ग में वास करना। सांसारिक पर्यायों में जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है, मगर निर्वाण में जन्म-मरण का चक्र सदा-सदा के लिए मिट जाता है। भगवान महावीर का निर्वाण कार्तिक की अमावस्या को ब्रह्म मुहूर्त में स्वाति नक्षत्र में पावापुर (बिहार) में हुआ था। हरिवंश पुराण सर्ग 66/16, और देवों द्वारा निर्वाण कल्याण दिवस मनाया गया था गणधर देव श्रीगौतमस्वामी तुरन्त नश्वर शरीर की अनित्यता को जानकर ध्यानस्थ हो गये और संध्याकाल में पूर्ण वीतरागदशा प्राप्त करके केवलज्ञान प्राप्त किया। उसका अनुसरण करे प्रतिवर्ष निर्वाण दिवस मनाते आ रहे है।
(2) भगवान महावीर का जीवन वृत्त:-
महावीर का जीवन काल सदा संघर्षमय रहा है और अपनी अल्पवय में ही संसार के प्राणियों को सदा सुख शांति एवं मुक्ति के अमोघ अस्त्र दिये। अहिंसा, अणुव्रत, अपरिग्रह और अनेकान्त। महावीर ने धर्म महल को चार स्तम्भो पर खडा करके दिखा दिया। आचरण में अहिंसा, विचारों में अनेकान्त, वाणी में स्याद्वाद, जीवन में अपरिग्रह के सिद्धान्त, महावीर के समय से ही आज तक चले आ रहे है। शास्त्रों के बल पर सुख शांति ना तो कभी किसी को मिली है ना ही मिलेगी ! लेकिन महावीर के सिद्धान्तों के बल पर चहुंमुखी विकास, सुख शांति अवश्य मिलेगी इसका प्रयोगात्मक रूप गांधी जी ने भी सिद्ध कर दिया है। ऐसे महावीर स्वामी का जन्म 599 पूर्व चैत्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन कुण्डलपुर के राजा सिद्धार्थ की रानी त्रिशला के गर्भ से हुआ। ये जन्म से ही मति, श्रुत, अवधि ज्ञान के धारी थे इन्द्र की आज्ञा से कुबेर द्वारा नौ मास पहले से ही प्रतिदिन साढ़े तीन करोड़ रत्नों की वर्षा होती रही, जो निरन्तर 15 मास तक जारी रही। जन्मोत्सव पर इन्द्र ने वीर और वर्द्धमान नाम से सम्बोधित किया। ये जन्म से ही तीक्ष्ण बुद्धि के धनी थे समस्या का समाधानपलक झपकते ही कर दिया करते थे जिससे सन्मति नाम पाया, संगमदेव ने सर्प का रूप धारण कर वर्द्धमान को डराना चाहा तो उसका मान मर्दन कर महावीर नाम पाया। महावीर 30 वर्ष तक कुमार काल व्यतीत कर जाति स्मरण हो जाने के कारण वैराग्य धारण कर 12 वर्ष तक घोर तपस्या करते रहे और वैशाख शुक्ला दशमी के दिन अपरान्ह में हस्त नक्षत्र में चन्द्रमा के आने पर क्षपक श्रेणी आरूढ़ होते हुए शुक्ल ध्यान के द्वारा चारों घातिया कर्मों (दर्शनावरण, ज्ञानावरण, मोहनीय, अन्तराय) को नष्ट कर केवल ज्ञान प्राप्त किया। 66 दिन तक गणधर के अभाव में दिव्य ध्वनि से मुमुक्षु समाज को वंचित रहना पड़ा, गौतम गोत्रीय इन्द्रभूति अपने ज्ञान के मद में आकर महावीर से ही शास्त्रार्थ करने चला तो मानस्तम्भ को देखते ही अहंकार चूर चूर होकर विशुद्ध परिणामों वाला होकर चार ज्ञान का धारी हो गया और दिव्य ध्वनि प्रसार में सहायक बना। इस प्रकार जगह जगह महावीर का समवशरण पूरे देश में 29 वर्ष 5 माह 19 दिन तक भ्रमण करता रहा और जैन शासन की महती प्रभावना होती रही। समाज धर्म पान करती रहा तथा समाज में सुख शांति बनी रही, विवादों का शमन हुआ विरोधी भाव वाले पशु भी वैर भाव को भूल कर प्रेम भाव से रहने लगे ।
(3)अन्यमत मान्यतायें-
इस दिन श्री रामचन्द्र जी का वनवास पूर्ण कर अयोध्या आना, महाभारत ग्रंथ में पांडवों का वनवास से वापिस आना, कोई समुद्र मंथन मंथन से उत्पन्न हुई लक्ष्मी के जन्मदिन से कोई श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध से, तो कोई श्री विष्णु जी द्वारा नरसिंहरूूप धारण कर हिरण्यकश्यप वध से सिक्खों में गुरु हरगोविन्द सिंह की जेल से रिहाई, रामतीर्थ के जन्म व समाधी से, आर्य समाज में महर्षि दयानन्द सरस्वती के देह वियोग के प्रसंग से पर्व को मनाने का प्रसंग जोडते हैं। तथा निर्वाण से एक दिन पूर्व नरकासुर वध की मान्यता से नरक चतुर्दशी, छोटी दीपावली, रूपचतुर्दशी मानते हैं।
(4)धन्य त्रयोदशी बनाम धनतेरस :-
महावीर की देशना निरन्तर लगभग 30 वर्ष तक समाज को मिलती रही। लेकिन अचानक कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को अन्तिम देशना ही समाज को प्राप्त हुई। इसके बाद वाचिक देशना (दिव्य ध्वनि) समाज को सुलभ नही हो सकी। क्योंकि आयु काल नजदीक जानकर महावीर ने योग निरोध धारण कर लिया। देशना लाभ हेतु जगह-जगह से मुमुक्षु आते रहे, लेकिन लाभ न मिल पाने से निराश होकर घर लौटने लगे। इस प्रकार चतुर्दशी का भी दिन निकल गया। धन्य हैं वे लोग जिन्होंने महावीर की अन्तिम दिव्य ध्वनि त्रयोदशी को सुनी थी, धन्य है वह तिथि। इस तिथि का नाम धन्य त्रयोदशी नाम सार्थक हुआ।
(5) रूप चतुर्दशी-
भग.महावीर ने त्रयोदशी को योग निरोध कर लेने के पश्चात दिव्यध्वनि तो नही खिरी ध्यानस्थ मुद्रा का दर्शन तो मिला, उनके रूप के दर्शन तो हुए इस कारण से रूप चतुर्दशी का पर्व प्रचलन में आया। उनका रूप जो भव्य जीवों को भी प्रेरणा दे रहा था कि ध्यान से ही मुक्त हो सकते हैं, मुनियों, सामान्य श्रावकों को भी इस प्रकार ध्यान करना चाहिये, क्योंकि ध्यान से ही मुक्ति होगी क्रियाकांड से नही। निरखत जिन चन्द्र वदन स्वपद रूचि आई,…जिन प्रतिभा जिन सारखी…तिहारे ध्यान की मूरत अजब छवि को दिखाती है…निरखो अंग अंग जिनवर के जिनसे झलके शांति अपार… इस प्रकार जिनदेव के रूप को देखकर अपने स्वरूप में लीन हो जाना ही रूप चतुर्दशी मानना सार्थक है।
(हिन्दू मान्यता के अनुसार जो त्रयोदशी के दिन धन्वन्तरि का जन्मदिवस, कुबेर की कृपा, लक्ष्मी आगमन, आदि मान्यतायें प्रचलित हैं।) जैन आगम से कोई संबंध नही होने पर महावीर के अनुयायी रूढिवादिता के कारण मनाते आ रहे हैं, जरा भी विचार नही करते। समाज को क्या पता था कि अमावस्या को क्या होगा?
(6) निर्वाण-
महावीर ने शेष अघातिया कर्मों (वेदनीय, आयु, नाम, गौत्र) का नाश कर कार्तिक की अमावस्या के ब्रह्म मुहूर्त में स्वाति नक्षत्र में नश्वर शरीर को छोड़ कर सिद्ध अवस्था को प्राप्त किया। महावीर का शरीर भी कर्पूर की भांति बिखरकर हवा में विलीन हो गया। अमावस्या के प्रातःकाल में यह समाचार समाज को मिला तो समाज स्तब्ध सा रह गया, जो जिस अवस्था में थे, उस ही अवस्था में निर्वाण स्थली की ओर दौड़ पड़े, वहाँ अब कुछ भी नही था। महावीर की अस्थियों को इन्द्र ने चुन कर क्षीर सागर में विसर्जित कर दिया था।
(7) लाडू एक प्रतीक-
मुमुक्षु समाज भग. महावीर के दर्शन करने की भावना से पावापुर के समवशरण में आये तो उनके दर्शन भी नही हुए दर्शन लाभ से वंचित शरीर को नश्वर मानकर वैराग्य भाव युक्त होकर भगवान के दरबार में समर्पण हेतु लाई गई सामग्री अचित्त (नारियल का गोला, बादाम आदि) वही छोड़कर निर्वाण स्थली पर बैठकर आत्म आराधना करने लगे। विसर्जित सामग्री का रूप आज लड्डू ने ले लिया छे जिसमें मिठास एवं स्निग्धता के कारण हजारों कीड़े, चींटी अनायास ही हिंसा का शिकार हो जाते हैं। लाडू चढाना भट्टारकों द्वारा चलाई गई परंपरा है। मूल आगम में इसका कोई प्रमाण नही मिलता। लाडू चढ़ाने की प्रबल इच्छा हो तो लाडू के स्थान पर गोला (घिसा हुआ गट) को प्रयोग में लिया जा सकता है। जिस पर पृथक् से चिन्तन की आवश्यकता है।
(8)केवलज्ञान प्रतीक दीपमालिका-
प्रातः महावीर के निर्वाण से मुमुक्षु समाज स्तब्ध सा हो गया था। सारा समाज वैराग्य में डूब चुका था। आत्म आराधन में लीन समाज को संध्या काल में ये समाचार मिला कि गौतम गणधर को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई है। इसे देवों द्वारा वैक्रियक दीपकों द्वारा (जिससे जीवो की हिंसा नही होती) केवलज्ञान का गुणगान किया। जो केवलज्ञान सूर्य के समान है जो अज्ञानरूपी अंधकार को हरने वाला है, अनन्त गुणरूपी लक्ष्मी का द्योतक है। तथा इस शुभ समाचार से मुमुक्षु समाज में भी हर्ष की लहर दौड़ गई। यह समाचार अपने-2 परिजनों तक देने गये ग्राम में उस समय अंधेरा हुआ करता था। उस समय प्रकाश का माध्यम दीपक ही था। खुशी का यह समाचार विश्वास प्रतीक के रूप में दीपक जलाकर सुनाया। जिन घरों में अंधेरा था वहाँ दीपक जला कर अंधकार दूर किया और यह समाचार सुनाया कि गौतम गणधर को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। आज भी केवलज्ञान को दीपक का प्रतीक मान कर जलाते जा रहे हैं। जबकि आज प्रकाश के साधन बहुत हो गये हैं।
अज्ञानतिमिरान्धानां, ज्ञानांजन शलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः।।
जिस प्रकार दीपक अंधकार को नष्ट करने में समर्थ है, उसी प्रकार अज्ञान को केवलज्ञान नष्ट करने में समर्थ है। यह उदाहरण समझाने के लिए दिया गया था यथा- इस प्रकार दीपक तो केवलज्ञान प्राप्ति की खुशी का समाचार प्रसारित करने के लिए विश्वास दिलाने के लिए जलाए गए थे। मगर आज दीपक के साथ फूलझड़ी, रंग बिरंगी रोशनी एवं आतिशबाजी के प्रदर्शन में ही दीपमालिका को सीमित कर दिया। इससे होने वाली हानि से हम सभी परिचित हैं जलते हुए दीपक की लौ पर कितने कीट पतंगे, मच्छर आदि विषय लोलुपता के कारण अपने प्राणों का घात करते हैं इस हिंसा के दोष से तथा एकेन्द्रिय एवं त्रस जीवों के घात के पाप से हम बच नहीं सकते हैं। जिन भगमहावीर ने अहिंसा का उपदेश दिया था, उन्हीं के निर्वाण दिवस पर नाना प्रकार की अतिशबाजी करके हिंसा ही करते हैं, जरा भी विचार नहीं करते और नवीन कर्मों का ही बंध करते हैं।
(9)महावीर के प्रमुख सिद्धांत :-
भगवान महावीर के प्रमुख सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है ‘जिओ और जीने दो’ तथा व्यक्ति जन्म से नही कर्म से महान बनता है इन सिद्धांतों को स्वयं भग.महावीर स्वामी ने चरितार्थ भी किया है। जैन समाज ही नही अपितु समूचा विश्व भी भग. महावीर स्वामी के सिद्धांतों को स्वीकार कर रहा है वर्तमान में यदि निम्न चार ही सिद्धांतों को स्वीकार कर लिया जाय तो विश्व में शांति, परस्पर सदभावना बना रहेगा।
(1) अहिंसा-
महावीर ने सर्व प्रथम अहिंसा को प्रमुखता दी,क्योंकि महावीर के जन्म से पूर्व ही धर्म के नाम पर हिंसा का जो ताण्डव हो रहा था, उससे समाज में त्राहि-त्राहि मची हुई थी, ब्राह्मण संस्कृति श्रमण संस्कृति पर आधिपत्य जमा रही थी, यज्ञ में घृत मधु के साथ-साथ पशुओं का हवन किया जाता था, जिसे धर्म की संज्ञा दी जा रही थी। ईर्ष्या, द्वेष, अज्ञान, अहंकार, लोभ आदि दुर्गुणों के कारण जाति भेद चरम पर था। महावीर ने हिंसा के इस ताण्डव को मिटाने के लिए अहिंसा का मंत्र दिया। मन से,वचन से, कार्य से किसी भी प्राणी (अपराधी हो या निरपराधी) को मारना या मारने के भाव मन में उत्पन्न होना या बोलना हिंसा है।
अप्रादुर्भावः खलु रागादीनां भवत्यहिंसेति।
तेषामेवोत्पत्तिर्हिंसेति जिनागमस्य संक्षेपः।। पुरुषार्थसिद्धि उपाय 44
अर्थात् निश्चय से रागादि भावों का प्रगट न होना यही अहिंसा है, और उन रागादि भावों का उत्पन्न होना ही हिंसा है, ऐसा जैन सिद्धांत का सार है। प्राणी का वध करना द्रव्य हिंसा है, वध करने के भाव मन में उत्पन्न होना भाव हिंसा है। राग,द्वेष आदि भावों की उत्पत्ति आत्मा में होना भाव हिंसा है। भाव हिंसा का फल एवं स्थिति वज्र से भी कठोर होता है अतः हम सभी को द्रव्य हिंसा एवं भाव हिंसा से रहित होकर जीवन जीने की कला सीखनी चाहिए।
हिंसाया अविरमणं हिंसा परिणमनपि भवति हिंसा।
तस्मात्प्रमत्तयोगे प्राणव्यपरोपणं नित्यम्।।
पुरुषार्थसिद्धि उपाय 48) अर्थात् हिंसा से विरक्त न होने से हिंसा होती है और हिंसारूप परिणमन करने से भी हिंसा होती है, इसलिए प्रमाद के योग में निरंतर प्राणघात का सदभाव है। परजीव के घातरूप हिंसा दो प्रकार की है। एक अविरमणरूप और एक परिणमनरूप। (आलेख-अविरमण पदार्थों से कर्मबंध व निवृति) आज हमारे देश में जगह-जगह आतंकी गतिविधियों से जो हिंसा का ताण्डव हो रहा है इस पर अहिंसात्मक तरीके से ही विजय प्राप्त की जा सकती है। क्योंकि सभी धर्मों में कर्म विधान का वर्णन है जो जैसे कर्म करेगा वो वैसे ही फल को प्राप्त करेगा । हिंसात्मक कार्यों के फल में ही यह जीव चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करता रहता है, दुःखों को भोगता रहता है।
(2) अणुव्रत :-
मानव प्राणी पारिवारिक जीवन के साथ साथ अपने आचार विचार को संयमित रूप से जीने के लिए छोटे-छोटे नियमों का पालन करता रहे, तो धर्म के मार्ग पर चल सकता है। एवं आत्मिक सुख को भी प्राप्त कर सकता है। परमात्म पद की प्राप्ति का मार्ग यहीं से प्रारम्भ होता है। ये सिद्धान्त अणुव्रतों के नाम से जैन समाज में प्रचलित हैं अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह । इन सिद्धान्तों की व्याख्यायें प्रत्येक धर्म में पाई जाती है। यदि आज मानव इन सिद्धान्तों का पालन करता है, तो सुख शांति का साम्राज्य दूर नहीं है।
(3) अनेकान्त :-
प्रत्येक वस्तु में अनन्तगुण है वे परस्पर विरोधी होते हुए भी अविरोधी भाव से समाहित रहते है अस्ति-नास्ति, एक-अनेक, भेद-अभेद, सामान्य-विशेष आदि वाणी में तो स्याद्वाद का रूप ही आयेगा। किसी एक पक्ष से ही एक समय में वर्णन किया जा सकता है। यदि अनेकान्त को भली प्रकार समझ लिया जाए तो हठग्राहिता का जन्म ही नही होगा, एकान्तवाद, द्वैतवाद आदि भाव ही समाप्त हो जाए। किसी एक पक्ष को ग्रहण करना ही एकान्तवाद है। वस्तु के स्वरूप को अनेकान्त के द्वारा ही सर्वांग रूप से निरीक्षण परीक्षण कर समझा जा सकता है।
(4) अपरिग्रह :-
महावीर ने अपरिग्रह का सिद्धान्त समाज में व्याप्त असमानता को देखते हुए दिया था। अपरिग्रह को हमने सीमित दायरे में रख कर ही व्याख्या की है। किसी भी वस्तु को आवश्यकता से अधिक संग्रह नही करना ही अपरिग्रह है। यदि अधिक संग्रह हो भी जाता है तो योग्य पात्रों को तथा समाज में समान रूप से दान कर दिया जाए। इससे समाज में हिंसा, चोरी आदि कृत्य भी नहीं होगें। तथा दान की उत्कृष्ट परम्परा भी विकसित होगी। महावीर के इस सिद्धान्त के आधार पर ही समाजवाद का सिद्धान्त, साम्यवाद का सिद्धान्त निकाला गया है। इससे वर्ग शोषण, पूंजी पतियों का आधिपत्य की भावना को विराम लगेगा। इस प्रकार महावीर के सिद्धान्त आज भी उतने ही प्रासंगिक है जितने उस समय थे। आवश्यकता है उनके सिद्धान्तों को समझने की, चिंतन करने की, और मनन करने की। इसी पवित्र भावना के साथ विराम लेता हूँ।
पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री, बीकानेर
जैन दर्शनाचार्य, एम.ए. हिन्दी, संस्कृत, राजनीतिशास्त्र
अरिहंत भवन 14/214 मुक्ताप्रसाद नगर