महावीर (अतुकान्त) | Mahaveer (Atukant)

(1) आज परिवर्तन क्यों!
खेल ही रहा था कल तो हास मुख मंडल पर विधर्मियों के
भाग्य के विधाता थे मूक पशुओं के कल
होम यज्ञों में उन्हें स्वर्ग पहुँचाते थे।
कमाते थे अक्षय-पुण्य
आज-सहसा ही मुख म्लान क्यों ?

(2) आज कोलाहल है दश ही दिशाओं में
क्षुब्ध हुआ दिग्-दिगंत
प्राची का सूर्य आज म्लान है
सोचा लोगों ने
हैं! सूर्य है यह
इतना म्लान, इतना त्रस्त
ग्रस लिया हो हाय ! जैसे राहु ने
अरे! सूर्य कहाँ
सूर्य तो छलका है आज त्रिशला की गोदी में।

(3) कंपित देवेश हुए
सोचा
हुआ है जन्म आज मध्य-लोक में
किसी पुण्यशाली का
चल पड़े सुरेन्द्र-सुर-सुरांगना
सहज दुंदुभी घोष
दे रहा चुनौती था विधर्मियों को
सर्वत्र मंगलगान
वीर का विजयनाद
सुरभित था दिग्-दिगंत
स्वर्णिम स्वर्ग आभा आज उतरी थी धरा पर ज्यों।

(4) कौन ईश अवतार हुआ था आज ?
कंपित हुआ लोक जिसकी तेजस्विता से
ईश अवतार था वह ? नहीं
स्वर्गों का सुरेन्द्र था क्या, देव इन्द्र जाली था क्या?
नहीं-नहीं
मात्र कर्म-भूमि का, हिंसा की भूमि का,
पैशाची वसुंधरा का
छोटा-सा बालक था वह
छोटा-सा मानव था वह।

(5) युग कैसा था किन्तु
सत्य-अहिंसा तो कर चुकी थी प्राण त्याग
जल चुकी, मर चुकी, बुझ भी चुकी थी मानों
उठ न सकेगी कभी
मूक पशुओं का वह अहिंसात्मक सत्याग्रह
हिंसा से फलित थे स्वर्ग
धर्म के पोषण में प्राणों का शोषण था
चेतन से चेतनता त्रस्त थी पीड़ित थी।

(6) उमड़ उठे वीर अरे !
कैसी भ्रष्ट निष्ठा यह
म्लान प्रतिष्ठा यह
शान्ति चाहते हो विश्व ?
स्वर्ग चाहते हो विश्व, पशुओं के प्राणों में!
सावधान हुए वीर, निर्भय, निशंक और
बढ़ चले एकाकी।
(7) हिंसक जनों पर क्या खंग था चलाया ?
नहीं, हिंसा को हिंसा से मिटाना तो हिंसा है
अरें! हिंसा है हिंसक की, हिंसा पर क्षुब्ध होना
आत्मा तो प्रांजल अहिंसक चेतना है
अहिंसा है नित्य ही उसमें केलि करना
हिंसा का केन्द्र एक राग है विश्व में
राग ही हिंसा है तीर्थंकर दर्शन में
अतएव राग से अंतर को रीता कर
तत्व को कसकर स्याद्वाद की कसौटी पर
वीर-वर्द्धमान अन्तः सलिला में डुबकी ले
बहते ही चले गये
हँसते ही चले गये
कोटि-कोटि यंत्रणायें सहते ही चले गये।

(8) अन्तस् में पावनता
वचनों में माधुर्य
काय में आलौकिक शौर्य
स्तंभित थे विरोधी गण,
धन्य विश्वप्रेमी स्याद्वादी, हे आलौकिक जन !
विरोधी शान्त हुए,
हिंसा, असत्य, एकान्त, उद्भ्रान्त हुये,
पशुओं को त्राण मिला,
अहिंसा को प्राण मिला
जग को वरदान मिला
आज सफल हुआ विश्व तेरी प्रतीक्षा में
सत्य-अहिंसामय जीवन की दीक्षा में।

शब्द अर्थ:
होम यज्ञों = यज्ञों में बलि चढ़ाने
म्लान = मलिन
क्षुब्ध = क्षोभित
इन्द्रजाली = जादूगर
पैशाची = पापी
खंग = तलवार
केलि = लीन होना
रीता = खाली
सलिला = नदी
उद्भ्रान्त = भाग गये
त्राण = रक्षा

रचयिता: श्री बाबू जुगलकिशोर जैन ‘युगल’ जी, कोटा
प्रस्तुति: आचार्य कुन्दकुन्द फाउंडेशन, कोटा

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