तर्जः दिन-रात स्वामी तेरे…
महाभाग्य से पार्श्व प्रभु दर्श पाया।
महानन्द मेरे न उर में समाया।। टेक।।
छवि वीतरागी मुझे है सुहाई,
जिसे देखते सुधि निजातम की आई।
स्व-पर भेद-विज्ञान अन्तर जगाया ।। महानन्द. ।। 1 ।।
नहीं आवरण है, नहीं है करम रज,
अहो ! ज्ञान-दर्शन, अहो सुख-वीरज ।
अनन्त गुणों का न पार दिखाया ।। महानन्द. ।। 2 ।।
नहीं आप सी जग में प्रभुता दिखावे,
तुम्हें देखकर सहज सन्तोष आवे ।
सर्वांग वैराग्य रंग में रंगाया।। महानन्द. ।। 3।।
मुक्ति का मारग, अहो ज्ञान ही है,
अहो! ज्ञान का फल, परम ज्ञान ही है ।
सहज ज्ञान का, सहज माहात्म्य आया ।। महानन्द ।।4।।
नहीं कामना अब रही कोई मन में,
यही भावना नाथ ! रम जाऊँ निज में।
परम तृप्त हो शीस चरणों नवाया।। महानन्द. ।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १११
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’