महाभाग्य से मैंने जिनदर्श पाया | mahabhagya se maimne jinadarsha paya

तर्ज : प्रभो आपने एक ज्ञायक बताया …

महाभाग्य से मैंने जिनदर्श पाया।

निजानन्दमय नाथ निज दर्श पाया ।। टेक ।।

जगी ज्ञान ज्योति, महा मोह नाशा।
दर्श-ज्ञान-चारित्र सम्यक् प्रकाशा।।
परम शान्तिमय धर्म का स्वाद आया ।। 1 ।।

जगत् के प्रपंचों से आई उदासी।
टूटी सहज झूठी आशा की पासी ।।
निर्ग्रन्थता का, सुभाव जगाया।। 2।।

लगें इन्द्रिय के भोग भी नाथ दुःखमय।
सहज ज्ञान वैराग्य ही एक निर्भय ।।
शिवमग में बढ़ने का उल्लास आया।। 3 ।।

झड़े कर्म बिन भोगे अब चाह ना है।
परम ब्रह्मचर्य हो यही भावना है।।
निजाराधना में सुमन है लगाया।। 4।।

परम मुक्त प्रभुता तिहारी सुहाई।
दशा एक भी और मुझको न भाई ।।
हो आदर्श मेरे चरण सिर नमाया ।। 5।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ७८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’