मग्न रहूँ अपने में ही
मग्न रहूँ अपने में ही,
पूर्ण स्वयं अपने में ही, तृप्त स्वयं अपने में ही ।
तुष्ट स्वयं अपने में ही, लीन स्वयं अपने में ही ।।टेक।।
अपना प्रभु है आप स्वयं, अपना गुरु है आप स्वयं ।
अपना तीर्थ है आप स्वयं, अपना मंदिर आप स्वयं ।।1।।
अपना ध्येय है आप स्वयं, अपना ज्ञेय है आप स्वयं ।
अपना साध्य है आप स्वयं, अपना साधन आप स्वयं ।।2।।
अपना जीवन अपने में, अपना वैभव अपने में ।
अपना आसन अपने में, अपना घर है अपने में ।।3।।
अपना धैर्य है अपने में, अपना ज्ञान है अपने में ।
अपना सुख है अपने में, अपनी मुक्ति है अपने में ।।4।।
पर का हस्तक्षेप नहीं, अपने में कोई क्लेश नहीं ।
करने का संक्लेश नहीं, अपना सर्वस्व अपने में ।।5।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ११७