माँ जिनवाणी मुझ अन्तर | Maa Jinvani Mujh Antar

माँ जिनवाणी मुझ अन्तर में, होकर मुझ रूप समा जाओ।
शान्त शुद्ध ध्रुव ज्ञायक प्रभु की, महिमा प्रतिक्षण दर्शाओ।।

चैतन्य नाथ की बात सुने से, अद्भुत शान्ति मिलती है।
मानो निज वैभव प्रकट हुआ, सब आधि-व्याधि टलती है।।(1)

ज्ञायक महिमा सुनते-सुनते, बस ज्ञायकमय जीवन होवे।
निज ज्ञायक में ही रम जाऊँ, सुनने का भाव विलय होवे।।(2)

हे माँ तेरा उपकार यही, प्रभु सम प्रभु रूप दिखाया है।
चैतन्य रूप की बोधक माँ, मैं सविनय शीश नवाया है।।(3)

Artist - ब्र.श्री रवीन्द्र जी 'आत्मन्'

स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ १७१
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ ७४ से ७५

खोज: Ma Jinvani Mujh Antar

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