मा विलंब न लाव पठाव तहां री, जहँ जगपति पिय प्यारो
मा विलंब न लाव पठाव तहां री, जहँ जगपति पिय प्यारो ।।
और न मोहि सुहाय, कछु अब, दीसै जगत् अंधारो री ।।
मैं श्रीनेमिदिवाकरको कब, देखों बदन उजारो ।
बिन विन देखैं मुरझाय रह्यो है, उर अरविंद हमारो री ।।१।।
तन छाया ज्यौं संग रहौंगी, वे छांडहिं तो छारो ।
बिन अपराध दंड मोहि दीनो, कहा चलै मेरो चारो ।।२।।
इहि विधि रागउदय राजुलनैं, सह्यो विरह दुःख भारो ।
पीछैं ज्ञानभान बल विनश्यो, मोह महातम कारो री ।।३।।
पियके पैंडें पैंडो कीनों, देखि अथिर जग सारो ।
‘भूधर’ के प्रभु नेमि पियासौं, पाल्यौ नेह करारो री ।।४।।
Artist: पं. श्री भूधरदास जी
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पृष्ठ १३
अर्थ
राजुल विनती कर रही है कि विलंब मत करो, मुझे वहाँ पहुँचा दो जहाँ जगत के स्वामी, मेरे प्रियतम (नेमिकुमार) हैं। मुझे अब कुछ भी नहीं सुहाता। सारा जगत अंधकारमय दीख रहा है। सूर्य के समान नेमिनाथ के उज्ज्वल मुख के दर्शन मुझे कब होंगे? जिसे देखे बिना मेरा हृदयरूपी कमल मुरझा रहा है। मैं शरीर की छाया के समान सदा उनके संग रहूँगी, वे मुझे छोड़ें तो भले ही छोड़ दें। बिना किसी अपराध के मुझे यह दंड मिला है, इसमें मेरा किसी भी प्रकार का दोष नहीं है, मेरा कोई वश नहीं है। इस प्रकार मोहवशीभूत होकर राजुल वियोग की भारी वेदना से ग्रस्त हुई। तत्पश्चात् ज्ञान-सूर्य के प्रकट होने पर मोह की गहन कालिमा नष्ट हो गई। तब उन्होंने इस संसार को अस्थिर जानकर प्रियतम का पग-पग पर अनुसरण किया अर्थात् जिन-दीक्षा धारण कर ली। भूधरदास कहते हैं कि इस प्रकार राजुल ने अपने प्रियतम भगवान नेमिनाथ के प्रति अतिशय प्रेम का निर्वाह किया।
शब्दार्थ: लाव - कर। पठाव - पहुँचाना।
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पद 12।
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