माँ तेरी शरणा में
(तर्ज-माता तू दया करके…)
माँ तेरी शरणा में, मैंने ज्ञायक जाना है ।
जुदा राग-विकल्पों से, मेरा रूप बखाना है ।टेक ।।
निर्दोष, निरालंबी, निर्मम, अविकारी हूँ,
आनंद ज्ञान परिपूर्ण, चैतन्य बिहारी हूँ ।
कोई अद्भुत तत्त्व अहो, निज गुण से साना है ।।1।।
निज चक्षु बिना भानु, कहाँ मार्ग प्रकाश करे,
जहाँ ज्ञान नहीं भासे, वहाँ ज्ञेय में जिय उलझे ।
जो देखें चेतन को, सो जिनवच जाना है ।।2।।
शुभ-अशुभ राग दोनों, मम शांति लुटेरे हैं,
स्वाश्रय से प्रभु बने, हम उनके चेरे हैं ।
उनकी वाणी का सार, ज्ञाता को भाना है ।।3।।
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ ८४