मङ्गलमय जिनराज तुम्हारे, निश-दिन शरणे आये।
भक्ति-भाव की सरगम गाकर, चरणे शीश झुकाये ॥ टेक ॥
भाव-सुमन की सुर-सौरभ हो, गाती निश-दिन प्रभु गौरव को।
अमृत देती प्रभु-भक्तों को, भव सागर तिर जाये ॥1 ॥
भाव-किरण की ज्योति जलाई, भक्ति स्वरों में आरती गाई।
अखियाँ दर्शन को ललचाई, जन्म सफल कर जाये ॥2॥
नव लय नव संगीत सुनाये, शान्त-स्वरों में बीन बजाये।
नवरस भक्ति तान सुनाये, निश दिन प्रभु-गुण गाये ॥3 ॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ २३