माँ-माँ-माँ-माँ
माँ सुनाओ वो गाथा सुहानी,
जिससे परिणति हो वीतरागी ॥टेक ॥
तीर्थंकर विरह को भुला दे, सीधे सिद्धों से बातें करा दे।
जो साधु समागम करा दे, निज धरम के मरम को बता दे ॥
ऐसी पर्याय सहज प्रगटा दे ॥1 ॥
वो कहानी जो समता सिखा दे, निज स्वरूप में रमना सिखा दे।
शुद्ध चेतन की कथनी सुहानी, जिसमें वृद्धि न हो न हो हानि ॥
जिसमें परिणति हो आसमानी ॥2॥
जिसमें शुद्धात्मा की कथा हो, जो हरती हमारी व्यथा हो।
अनेकांतमयी जो बखानी, स्याद्वादी है जिसकी निशानी ॥
न हो कथनी जिसकी पुरानी ॥3 ॥
जिसमें कर्तृत्व का वास न हो, जिसमें भोक्तृत्व की सोच न हो।
जिसमें एकत्व ममत्व न हो, मात्र ज्ञायक भाव पूरा हो ॥
जिसमें तृप्त रहे मुक्ति रानी ॥4॥
जो पामर से प्रभुता जगा दे, सारी पामरता क्षण में मिटा दे।
दीनता हीनता को मिटा दे, और लघुता से हृदय सजा दे॥
प्रभुता की अमर हो कहानी ॥5॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ ७८ से ७९