माँ जिनवाणी ज्ञायक बताय दियो रे | ma n jinavani j nayaka bataya diyo re

माँ जिनवाणी ज्ञायक बताय दियो रे ।

आनंद भयो रे, आनंद भयो रे ॥
सविनय शीश नवाय रह्यो रे।
आनन्द भयो रे, आनंद भयो रे ॥ टेक ॥
काल अनादि से भ्रमता फिरता,
जन्म- जन्म में बहु दुःख सहता।
अब सब दुःख पलाय गयो रे ॥ 1 ॥

जो प्रमत्त-अप्रमत्त नहीं है,
ज्ञायक शुद्ध अभेद सही है।
स्वयं सिद्ध दर्शाय रह्यो रे ॥ २॥

पर अवलम्बन छोड़ जु देख,
निज का वैभव प्रत्यक्ष देख ।
सम्यक् भाव जगाय रह्यो रे ॥ ३॥

अब न कामना कोई बाँकी,
निज महिमा सर्वोत्तम आँकी।
निज महिमा माँहि डुबाय रह्यो रे॥ 4॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १५६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’