लघु जैन सिद्धान्त प्रवेशिका (पं. गोपालदास बरैया) | Laghu Jain Siddhant Praveshika (Pt. Gopaldas Baraiya)

लघु जैन सिद्धान्त प्रवेशिका

ग्रन्थकर्ता: स्याद्वादवारिधि, वादिगजकेसरी, न्यायवाचस्पति पं. गुरु गोपालदास बरैया
प्रेरणा: पं. श्री सुमत जैन (इटावा)
प्रकाशक: आत्म अनुसंधान ज्ञान गोष्ठी, इटावा (द्वितीय पुष्प)
संस्करण: प्रथम संस्करण, 1.1.2016, वी.नि.सं. 2542, 1000 प्रति
पृष्ठ: 112 (जीवनवृत्त, प्रस्तावना, 5 अध्याय, विषयानुक्रमणिका)

परिचय (सार)

पुस्तक के मुखपृष्ठ पर इसका परिचय है: “समस्त जैन शास्त्रों का मर्म समझने के लिए सिद्धान्तों का प्रतिपादक पारिभाषिक शब्द कोष”। पूरी पुस्तक प्रश्नोत्तर रूप में है: 669 प्रश्न-उत्तर, 5 अध्याय। हर प्रश्न एक पारिभाषिक शब्द या सिद्धान्त पूछता है (“… किसको कहते हैं?”) और उत्तर उसकी छोटी, सटीक परिभाषा देता है।

कैसे बनी: ग्रंथकर्ता के अन्तिम वक्तव्य (दोहे) के अनुसार पं. गोपालदासजी ने यह लघुग्रंथ भिंड (ग्वालियर प्रान्त) में, इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) से तत्त्वज्ञान की खोज में आए श्री मोतीलालजी के निमित्त, “स्वपरहित जान” रचा। पूर्णता: विक्रम संवत 1966, श्रावण कृष्ण नवमी। आरम्भ में संस्कृत मंगलाचरण है: “नत्वा जिनेन्द्रं गतसर्वदोषं … विरच्यते स्वल्पधियां हिताय”।

अध्याय (पुस्तक की विषयसूची अनुसार):

अध्याय प्रश्न पृष्ठ आरम्भ
प्रथम 1 से 111 1-11 पदार्थों को जानने के उपाय: लक्षण, प्रमाण, नय, निक्षेप
द्वितीय 112 से 244 12-23 द्रव्य, गुण, सामान्य और विशेष गुण
तृतीय 245 से 450 24-46 जीव के भेद (संसारी, मुक्त), कर्म
चतुर्थ 451 से 580 47-59 जीव के पाँच असाधारण भाव (औपशमिक आदि)
पंचम 581 से 669 60-75 असली सुख का स्वरूप और उसका उपाय, अन्त में अरहंत भगवान् का मोक्ष

साथ में: पं. गोपालदासजी का जीवनवृत्त (स्व. श्री नाथूराम जी प्रेमी के संस्मरण से), पं. सुमत जैन की प्रस्तावना, और अंत में अकारादि क्रम से विषयानुक्रमणिका (शब्द से प्रश्न संख्या)।

किसके लिए उपयोगी: जो जैन सिद्धान्त के पारिभाषिक शब्दों की पक्की परिभाषा एक जगह चाहते हैं, पाठशाला और स्वाध्याय में पढ़ने-पढ़ाने वाले, और बड़े सिद्धान्त ग्रन्थ पढ़ने से पहले आधार बनाना चाहने वाले। अनुक्रमणिका से कोई भी शब्द सीधे ढूंढा जा सकता है।

इसी ग्रन्थ का गुजराती संस्करण (श्री जैन सिद्धांत प्रवेशिका): t/1930

नीचे पूरी पुस्तक की पीडीएफ है।

स्रोत: laghu jain siddhant praveshika.pdf

laghu jain siddhant praveshika.pdf (1122 KB)