तर्ज : प्रभु बाहुबली…
क्या-क्या कहूँ निज वैभव की, निज वैभव है अनुपम जग में।
जिनने विश्वास किया ध्याया, शाश्वत सुख पाया क्षण भर में ।। 1 ।।
निज को भूले भव-भव भटके, निज पहिचाने शिवमग प्रकटे ।
सिद्धत्व स्वभाव के आश्रय से, सिद्धत्व दशा पावे क्षण में ।। 2 ।।
जब सम्यग्ज्ञान प्रकाश होय, मिथ्यात्व तिमिर नहीं दिखता है।
तब अक्ष विषय तो दूर रहें, नहीं किंचित् प्रीत रहे तन में ।। 3 ।।
सुख बुद्धि पर में छूट गयी, भोगे नहीं मात्र भुगतता है।
किंचित् न सुहाता है बाहर, पुरुषार्थ धरे वह अन्तर में।। 4।।
कुकथा करने को मूक हुआ, विकथा सुनने को वधिर अरे।
विषयों के हेतु नपुंसक वह, मन हीन अहित के चिन्तन में ।। 5 ।।
इष्ट-अनिष्ट कल्पना दूर हुयी, नहीं राग-द्वेष की भ्रान्ति रही।
निज तत्त्व स्वरूप संभाल रहा, बल प्रकटा धारण में ।। 6।।
थिरता निज में बढ़ती जाती, कर्मादि सुख ही भग जावे।
आनन्दमयी निष्कर्म दशा, ज्ञानी को तब प्रकटे क्षण में ।। 7।।
फिर सादि अनन्त सुखी रहता, लोकाग्र शिखर पर वास रहे।
ध्रुव अचल सिद्ध गति पाई है, नहीं भ्रमण करे फिर भव वन में ।। 8 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३५८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’