क्रोध है दुःखमय, निज क्षमा शान्तिमय | krodha hai duhkhamaya nija kshama shantimaya

क्रोध है दुःखमय, निज क्षमा शान्तिमय।

क्रोध निज को जलाए, क्षमा मुक्ति है ।। 1।।

मान से हो अधोगति, जगत् में सदा।
मान है भव-भ्रमण, मार्दव मुक्ति है ।। 2।।

मायाचारी से तिर्यञ्च-नारीपना ।
माया अति क्लेशमय आर्जव मुक्ति है।। 3 ।।

झूठवादी का विश्वास सब ही तजें।
झूठ तो दुखमय, सत्य ही मुक्ति है।। 4।।

लोभ तो पापमय, नरक का हेतु है।
लोभ संताप है, शौच ही मुक्ति है ।। 5।।

होती तृष्णा असंयम से अति तीव्र है।
है असंयम करम संयम ही मुक्ति है ।। 6।।

शान्ति तप से मिले इच्छा दुखमूल है।
तप बिना जग रुले, उत्तम तप मुक्ति है ।। 7 ।।

ग्रहण भावक लघु, दान दाता गुरु।
ग्रहण से बंध है, त्याग ही मुक्ति है ।। 8।।

पर को निज में मिलाना ही संसार है।
व्यर्थ चिन्ता बुरी, आकिंचन मुक्ति है ।। ९।।

भोग हैं नाग सम, दुःखदाई सदा।
ब्रह्म है सुखमय, ब्रह्मचर्य मुक्ति है।। 10।।

धर्म दशधा कहे, मात्र व्यवहार से।
लक्ष्य इनका तजो, निज में हो लीन अब ।। 11 ।।

राग ही मूल है सब दुःखों का सही।
शुद्ध आत्मा लखो जो सहज मुक्त है।। 12 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २८५ से २८६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’