कोई न रोकनहार मुक्ति मारग में, स्वानुभूति है द्वार, मुक्ति मारग में | koi na rokanahara mukti maraga mem svanubhuti hai dvara mukti maraga mem

तर्ज : चित्स्वरूप महावीर…

कोई न रोकनहार मुक्ति मारग में, स्वानुभूति है द्वार, मुक्ति मारग में।

है शक्ति अपरम्पार, निज शुद्धातम में।। टेक ।।

चेतन निज शक्ति को भूला, प्राप्त परिणति में ही फूला,
निज हित समझ न पाया मूढ़ा, झूल रहा भव-भव में झूला ।
अवसर अब भी सुखकार लग शिव-मारग में ।। 1।।

श्री गुरु बार-बार समझावें, सप्त-तत्त्व का मर्म बतावें,
स्व-पर भेद-विज्ञान करावें, सीधी शिव की राह दिखावें।
कर प्रतीति हितकार, मुक्ति मारग में।। 2।।

आतम है शाश्वत परमातम, भूल स्वयं बनता बहिरातम,
कर प्रतीति हो अन्तर आतम, होय लीन प्रगटे परमातम।
पर आश तजो दुःखकार, मुक्ति मारग में।। 3।।

ज्ञान भाव का स्वाद जु पावे, फिर रागादि नहीं सुहावे,
निज पुरुषार्थ प्रकट हो जावे, कर्मादिक खुद निर्जर जावें।
पावे शक्ति अपार मुक्ति मारग में।। 4।।

धन्य मुनिदशा है अविकारी, प्रचुर स्व-संवेदन सुखकारी,
शुक्लध्यान की अग्नि प्रजारी, भस्म होय सब कर्म विकारी।
सिद्धालय
तिष्ठाय शिवसुख मारग में।। 5।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३६५ से ३६६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’