भजन: कोई कैसे ये कह दे
कोई कैसे ये कह दे, हम मुनि को नहीं भजते।
गुरु बिन सूना जीवन, हम तो ऐसा लखते।।टेक।।
श्री कुंदकुंद आचार्य, गुरुदेव हमारे हैं।
विदेहक्षेत्र में जाकर के, साक्षात् वो आए हैं।।
समयसार में समझाया, स्वरूप हमारा है।
इस में ही रम जाएँ, यही सुखकारा है।।
निर्ग्रन्थ मुनि के हम, दासानुदास ही हैं।1।।
परिषह को धारण करते, वे धीर-वीर से हैं।
वे निज स्वरूप में रमते, अर समता धरते हैं।।
हम उनके रूप को लख, शुद्धातम भजते हैं।
आनंदमय निज आतम, वे सहजहिं लखते हैं।।
अहो ज्ञानानंद का वेदन, वे नित ही करते हैं।।2।।
इन जगत् प्रपंचों में, वे नहीं उलझते हैं।।
कल्याणकारी आतम, गुरुवर वही ध्याते हैं।
तज सकल विभावों को, स्वभाव ही भाते हैं।
वीतरागी परिणति से, कर्म महल ढहाते हैं।
गुरु चरणों में झुककर, हम शीश नवाते हैं।।3।।
संकल्प
हम चित्स्वरूप को पा, भगवान् कहाएँगे।
वे तो हैं साध्य स्वरूप, हम भी बन जाएंगे
Artist : Richa Ji Jabalpur, Tanmaey Jain, Richa Ji Sv