तर्जः अहो जगत् गुरुदेव…
करूँ भक्ति जिनराज, तिहुँ जग मंगलकारी ।
करूँ भक्ति जिनराज, भविजन आनन्दकारी ।। टेक ।।
वीतराग सर्वज्ञ जिनेश, तीनलोक के हे परमेश।
दिव्यध्वनि अविकार, मोह नशावन हारी।। 1।।
दिव्य तत्त्व प्रभुवर दर्शाये, मिथ्या तम सब दूर भगाये।
भव से तारण हार, मूरति है मनहारी।। 2।।
नाहीं कर्त्ता-हर्त्ता देव, लहें भक्त शिव सुख स्वयमेव।
निमित्तभूत सुखकार, अनन्त चतुष्टय धारी।। 3।।
हम भी शरण आपकी पाय, आत्मज्ञान की ज्योति जगाय ।
आतम गुण प्रगटाय, पूरो आस हमारी ।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ६७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’