कैसी सुन्दर जिनप्रतिमा है, कैसा सुन्दर है जिनरूप।
जिसे देखते सहज दीखता, सबसे सुन्दर आत्मस्वरूप ॥ टेक ॥
नग्न दिगम्बर नहीं आडम्बर, स्वाभाविक है शान्तस्वरूप।
नहीं आयुध नहीं वस्त्राभूषण, नहीं संग नारी दुखरूप ॥1 ॥
बिन श्रृंगार सहज ही सोहे, त्रिभुवन मांही अतिशयरूप।
कायोत्सर्ग दशा अविकारी, नासादृष्टि आनन्दरूप ॥2॥
अर्हत् प्रभु की याद दिलाती, दर्शाती अपना प्रभुरूप।
बिन बोले ही प्रगट कर रही, मुक्तिमार्ग अक्षय सुखरूप ॥3 ॥
जिसे देखते सहज नशावें, भव-भव के दुष्कर्म विरूप।
भावों में निर्मलता आवे, मानों हुए स्वयं जिनरूप ॥4॥
महाभाग्य से दर्शन पाया, पाया भेदविज्ञान अनूप।
चरणों में हम शीश नवावें, परिणति होवे साम्यस्वरूप ॥5॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ ३२