काहे पाप करे काहे छल
काहे पाप करे काहे छल, जरा चेत ओ मानव करनी से…
तेरी आयु घटे पल पल ।।टेक।।
तेरा तुझको न बोध विचार है, मानमाया का छाया अपार है
कैसे भोंदू बना है संभल,
जरा चेत ओ मानव करनी से… ।।
तेरा ज्ञाता व दृष्टा स्वभाव है, काहे जड़ से यूं इतना लगाव है
दुनियां ठगनी पे अब ना मचल,
जरा चेत ओ मानव करनी से… ।।
शुद्ध चिद्रूप चेतन स्वरूप तू, मोक्ष लक्ष्मी का ‘सौभाग्य’ भूप तूं
बन सकता है यह बल प्रबल,
जरा चेत ओ मानव करनी से… ।।
स्रोत: जैन भजन पूजा पाठ, पृष्ठ २३७