संसारमें ऐसा एक भी प्राणी नहीं है, जो चिन्ताके चक्रमें न फंसा हो । जीवात्मा प्रतिक्षण किसी न किसी चिन्तामें निमग्न बना रहता है। कोई अपने प्रिय स्त्री-पुत्रादिके वियोगमें चिन्तित है तो किसीको अप्रिय जन एवं वस्तुओंका संयोग झुलसा रहा है। कोई अपनी बीमारीकी वेदनाकी चिन्तामें व्यथित है तो कोई भविष्यकी सुख-चिन्तासे उत्पीड़ित है। इस प्रकार आजका जीवात्मा चिन्ताके जालमें बुरी तरह आबद्ध है। रंकसे लेकर राजा और लघुसे लेकर महान् - कोई भी चिन्तासे मुक्त नहीं है। चिन्ताकी इस दशा में जीवात्माको एक क्षणके लिए भी शान्ति और सुख प्राप्त नहीं होता है। अभाव और दैन्यजन्य हाय-हायकी सांसें उसे निरन्तर व्याकुल और उत्तप्त किये रहती हैं। चिन्ता उसे ऐसा आर्त्तव्यानी बनाये रहती है कि आत्म-कल्याणकी ओर इसका तनिक भी ध्यान नहीं जाता । वस्तुतः ऐसा व्यक्ति आत्म-स्वरूपको यथावत् न समझनेके कारण ही चिन्ताके जालमें फंसता है और अनन्त दुःख उठाता है। वह नहीं समझता है कि जिन वस्तुओं या परिस्थितियोंकी में चिन्ता कर रहा हूँ उनका मेरी आत्मासे कोई सम्बन्ध नहीं है। दूसरे शब्दोंमें, वे पर-पदार्थ ह और उनकी चिन्ता हम क्यों करें ? प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी पूर्व जन्मोपार्जित अशभ कर्मोंका परिणाम ह, जिन्हें साधना द्वारा ही अन्यथा किया जा सकता है, चिन्ता द्वारा नहीं। फिर चिन्ता करने से बुद्धि कलुषित हो जाती है और अशुभ कर्मोक आस्रव एवं बन्धके सिवाय अन्य कुछ भी लाभ नहीं । कविवर द्यानतरायजी चिन्ताके इस स्वरूपसे पूर्णतः अभिज्ञ हैं। फलतः वे चिन्ताशील आत्माको संबोधते हुए कहते हैंः-
काहेको सोचत अतिभारी, रे मन !
हे आत्मन् ! तुम इतना अधिक शोक क्यों करते हो ? तुमने पूर्व जन्ममें जिन कर्मोंका जितने समयके लिए बन्ध किया है, वे उदयमें आकर अवश्य फल देंगे। उन्हें किसी प्रकार भी अन्यथा नहीं किया जा सकता । अतः ऐसा निश्चय समझकर तुम्हारा चिन्ता करना विल्कुल व्यर्थ है; क्योंकि चिन्तासे वर्तमान उद्वेगकारी परिस्थितिको बदला नहीं जा सकता । इस तरह तो अन्यान्य ऐसे अशुभ कर्मोंका बन्ध होता है जो भविष्यमें ऐसी और इससे भी अधिक भयंकर परिस्थिति उत्पन्न कर सकते हैं । हे आत्मन् ! तुम इतना अधिक शोक क्यों करते हो ? संसारमें जितने पदार्थ हैं, उनका अपने-अपने ढंगका पृथक् पृथक् परिणमन होता रहता है। केवलज्ञानीके ज्ञानमें इन वस्तुओंका अतीत, अनागत एवं भविष्यत्कालीन परिणमन हस्तामलकवत् प्रतिविम्बित होता रहता है। पर संसारी आत्मा उन वस्तुओंके स्वाभाविक परिणमनको अपनी रुचिके अनुसार परिणत करना चाहता है और ऐसा न कर सक़नेसे खिन्न एवं दुःखी होता है। दूसरे शब्दोंमें यदि इन वस्तुओंका परिणमन इस आत्माकी रुचिके अनुरूप हो जाता है तो उसमें राग करने लगता है और यदि रुचिके विपरीत जा पड़ता है तो उसमें द्वेष-बुद्धि करने लगता है। इसे यह बोध नहीं है कि किसी भी वस्तुके अनुरूप एवं प्रतिरूप परि-णमन करानेमें किसीकी किञ्चित् भी क्षमता नहीं है। कविवर इसी वस्तु-दर्शनके सिद्धान्तको प्रतिपादित करते हुए दार्शनिक शैलीमें आत्माको चिन्ता-मुक्त होनका संदेश दे रहे हैं। वह कहते हैंः-“सब दरबनिकी तीन कालकी, विधि न्यारी को न्यारी । केवलज्ञान विषं प्रतिभासी, सो सो ह्व है सारी ।। काहेको सोचत अतिभारी ।”