कहा बानि परी पिय तोरी | Kaha Bani Pari Piya Tori

कहा बानि परी पिय तोरी

कहा बानि परी पिय तोरी,
कुमति संग खेलत है नित होरी ॥टेक॥

कुमति कर कुबजा रंग राची, लाज शरम सब चोरी ।
रागद्वेष भय धूल लगावे, नाचे ज्यों चकडोरी ॥
कहा बानि परी पिय तोरी ॥1॥

अक्ष विषय रंग भरि पिचकारी, कुमति कुत्रिय सरबोरी ।
जा संग चिर दुखी भये, फिर प्रीति करत बरजोरी ॥
कहा बानि परी पिय तोरी ॥2॥

निजघर की पिय सुधि विसारि के परत पराई पोरी ।
तीन लोक के ठाकुर कहियत सो विधि सबरी बोरी ॥
कहा बानि परी पिय तोरी ॥3॥

बरजि रही बरजो नहिं मानत ठानत हठ बर जोरी ।
हठ तजि सुमति सीख भजि ‘मानिक’ तो विलसो शिवगोरी ॥
कहा बानि परी पिय तोरी ॥4॥


Artist: पं. मानिकचंद जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पर्व भजन)

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