काल चक्र (जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में) — जैन स्वाध्याय सामग्री | Kaal Chakra (Jain Darshan Ke Pariprekshay Mein)

काल चक्र (जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में)

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

काल चक्र

(जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में)

प्रथम दो संस्करण
(13 जून 2013 से अद्यतन)
तृतीय संस्करण
9 जून, 2016
(मूल पंचमी के अवसर पर)
योग

लागत मूल्य

प्रति स्थल

  1. पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट,
    ए-4, बापूनगर, जयपुर।
    फोन नं - 0141-2705581
  2. श्री अ.भा.दि.जैन विद्वत्परिषद् ट्रस्ट
    129, जादीनगर सी,
    स्टेशन रोड, दुर्गापुरा, जयपुर।
  3. संजीव कुमार गोधा
    बी-54, जनता कॉलोनी, जयपुर।
    मो. 9829064980

टाइपसेटिंग
आर्जेव ग्राफिक्स
बी-54, जनता कॉलोनी,
जयपुर।

मुद्रक:
सन एण्ड ऑफसेट
तिलक नगर, जयपुर।

: 2 हजार
: 2 हजार
: 4 हजार

: पंद्रह रुपये

हमारे प्रकाशन

अध्यात्म बारहखड़ी, मंगल
तीर्थयात्रा, ज्ञानामृत, चतुराहारणी,
दुर्गादेवता, अष्टानुष्ठानो परिरक्षण,
जैन जाति नहीं धर्म है, श्रावकाचार :
दिशा और दृष्टि, शुद्धोपयोग
विवेचन, प्रतिबोध, बसंत तिलका,
अष्टानुक्रमणि, समाधि-भावना और
सिद्धि, छहढाला का सार, सिद्धांतिक
एवं सिद्धान्त साधना के सूत्र, चलते-
फिरते सिद्धों से गुरु, ज्ञानानन्द
श्रावकाचार, सर्वार्थसिद्धि वन्दना,
कालचक्र, भ.महावीर जन्मभूमि का
सच, स्मारिका, क्षमावाणी, आत्मा
ही परमात्मा है तथा आग-परीक्षा।

लेखक :

डॉ. संजीव कुमार गोधा
एम. ए. द्वय (जैन विद्या तुलनात्मक धर्म दर्शन, इतिहास),
नेट, एम. फिल (जैन दर्शन), पीएच.डी.
बी-54, जनता कॉलोनी, जयपुर।

प्रकाशक :

श्री अ.भा.दि.जैन विद्वत्परिषद् ट्रस्ट
129, जादीनगर सी, स्टेशन रोड, दुर्गापुरा, जयपुर।
E-mail : [email protected]

प्रकाशन सहयोग

श्रीमती भंवरीदेवी धर्मपत्नी स्व. श्री राजमलजी जैन, लावावाले

प्राक्कथकीय

श्री अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन विद्वत्परिषद् दिगम्बर जैन समाज के शीर्षस्थ विद्वानों की पुरातन प्रतिष्ठित संस्था है, जिसकी स्थापना प्रातः स्मरणीय पूज्य गणेशप्रसादी वर्णी द्वारा सौ शासन जयन्ती के दिन सन् 1944 में की गई थी। इस संस्था का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है।
विद्वत्परिषद् के प्रख्यात विद्वानों द्वारा देशभर में शिविरों एवं संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता रहा है। सिद्धान्तचक्रवर्ती पूज्य आचार्य श्री विद्यानन्दी मुनिराज के ससंघ पावन सान्निध्य में 18 से 22 अप्रैल 1999 तक संस्था का स्वर्णजयन्ती समारोह एवं सप्तमसाधना वर्ष आर्यिका ज्ञानमती जी का भव्य, जिसमें शीर्षस्थ संगोष्ठियों एवं ज्ञानयज्ञों की धूम मची रही। इसमें आचार्य श्री विद्यानन्दी, आचार्य श्री धर्मचन्द्रजी, श्रवणबेलगोला के भट्टारक स्वस्तिश्री चारुकीर्तिजी एवं त्रयोडश विद्वान पण्डित नायडूसाहब शास्त्री इन्दौर के सान्निध्य में हुए प्रवचनों से प्रभावपूर्ण रही।
विद्वत्परिषद् द्वारा समय-समय पर राष्ट्रीय संगोष्ठियों का आयोजन, विधान-पूजन प्रशिक्षण शिविर, ध्यान व सामाजिक शिविर, विद्वत्सम्मान आदि महत्वपूर्ण कार्य तो किये ही जाते हैं। इनके अतिरिक्त इस संस्था द्वारा सारगर्भित-प्रकाशन के क्षेत्र में अब तक लोकोपयोगी 24 पुस्तकों का प्रकाशन किया जा चुका है।
इसी श्रृंखला में अ.भा.दि.जैन विद्वत्परिषद् के प्रख्यात मंत्री तथा लगभग 18 वर्षों से जुड़े युवा विद्वान डॉ. संतोषकुमार गोधा द्वारा लिखित ‘कालचक्र’ नामक पुस्तक का तृतीय संस्करण प्रकाशित कर रहे हैं। गोधाजी आज देश-विदेश में ख्यातिप्राप्त प्रवचनकार विद्वान के रूप में प्रसिद्ध हैं। सम्पूर्ण भारतवर्ष के साथ-साथ आप अनेक वर्षों से कनाडा, अमेरिका, इंग्लैण्ड आदि देशों के अनेक शहरों में भव्य तत्वाधान के साथ-साथ में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
आपके द्वारा जिनागम के प्रचार-प्रसार हेतु उल्लेखनीय योगदान दिये अ.भा.दि. जैन विद्वत्परिषद् ने अक्टूबर 2015 में आपको प्रतिष्ठा प्राप्त टोडरमल पुरस्कार प्रदान करते हुए ‘युवा विद्वत्वर’ के महान् विरुद्ध से विभूषित किया।
जैनदर्शन के परिप्रेक्ष्य में कालद्रव्य का सर्वांगीण, तर्कसंगत, शोधपरक, प्रष्टीकरण करने वाली यह ‘कालचक्र’ नामक कृति निश्चित ही पाठकों को इस विषय का सम्यक् ज्ञान करायेगी। आप सभी इसका भरपूर लाभ उठायें, इसी आशा के साथ।

  • अखिल जैन ‘बंसल’
    महामंत्री-श्री अ.भा.दि.जैन विद्वत्परिषद्

विषय सूची

काल की परिभाषा / स्वरूप 6
काल के भेद 9
(1) व्यवहार और निश्चय काल 9
(2) व्यवहार काल के विविध मापदण्ड 12
(3) संख्यात, असंख्यात और अनन्त काल 14
(4) भूत, वर्तमान और भविष्य काल 15
(5) उत्सर्पिणी - अवसर्पिणी काल 17

  • अवसर्पिणी के प्रथम तीन काल (भोगभूमि) 23
  • कल्पवृक्षों का स्वरूप 25
  • अवसर्पिणी का पहला काल (सुषमा-सुषमा) 29
  • अवसर्पिणी का दूसरा काल (सुषमा) 32
  • अवसर्पिणी का तीसरा काल (सुषमा-दुषमा) 34
  • कुलकर व्यवस्था 37
  • अवसर्पिणी के अन्तिम तीन काल (कर्मभूमि) 43
  • अवसर्पिणी का चतुर्थ काल (दुषमा-सुषमा) 43
  • तेईस शलाका पुरुष 44
  • अवसर्पिणी का पंचम काल (दुषमा) 49
  • कल्की एवं प्रकलकी 50
  • अवसर्पिणी का छठा काल (अतिदुषमा) 53
  • कालान्त-काल (प्रलय) 55
  • हाहाभूमिकर्मी काल 56
  • उत्सर्पिणी के छह काल 58
  • उत्सर्पिणी काल में कुलकर 59
  • काल अपरिवर्तन काले क्षेत्र 61
    (6) कुछ सहज जिज्ञासाएँ.. 63
  • वर्तमान में कौनसा काल - उत्सर्पिणी या अवसर्पिणी? 63
  • आप कुछ भी करो, हमें तो सर्वत्र विकास ही दिखता है 65
  • विकास नहीं होता, कालचक्र-सा लगता है 68
  • छोटे के बाद छठा या पहला काल? 70
  • क्या सब कुछ बदल जाता है? 70
  • कौनसा काल श्रेष्ठ? 72
    (7) अभिमत (विद्वानों की दृष्टि में प्रस्तुत प्रकाशन) 75
    (8) सन्दर्भ ग्रन्थ सूची 79

जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में -

काल चक्र

‘काल’ बहुत प्रचलित शब्द है। इसका प्रयोग विभिन्न अर्थों में होता है। यहाँ हम जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में काल द्रव्य की चर्चा करते हुए षट् काल रूप चक्र का विस्तृत निरूपण करेंगे। यद्यपि नैयायिक, वैशेषिक, बौद्ध, सांख्य, योग आदि भारतीय दर्शनों के अतिरिक्त पाश्चात्य दार्शनिकों ने भी किसी न किसी रूप में काल को स्वीकार किया है, किन्तु जैसा सूक्ष्म एवं विशद विवेचन जैन दार्शनिकों ने किया है, वैसा अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।

जैन दर्शननानुसार काल का क्या स्वरूप है, उसके कितने भेद-प्रभेद हैं? अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी रूप काल चक्र किस प्रकार बदलता रहता है? कौनसे क्षेत्रों में कौनसा काल वर्तता है? विभिन्न कालों में मनुष्यादि की ऊँचाई, आयु आदि की विविधता के साथ-साथ उन कालों की विशिष्ट परिस्थितियाँ, भोग भूमि, कर्म भूमि, कल्पवृक्षों का स्वरूप, कुलकर व्यवस्था, युग प्रवर्तक तीर्थंकर-चक्रवर्ती आदि शलाका पुरुष, धर्म विध्वंस की चेष्टा करने वाले कल्की एवं अर्द्धकल्की, सृष्टि प्रलय का स्वरूप, पुनः सृष्टि सृजन, हुण्डावसर्पिणी काल की विचित्रतायें आदि अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों को यहाँ रोचक ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। अन्त में विविध जिज्ञासाओं का समुचित समाधान खोजते हुये दृष्टि को स्वभाव सन्मुख करने की प्रेरणा दी है, यही उपादेय है।

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

‘काल चक्र’ दो शब्दों का समुदाय है। काल का अर्थ है ‘समय’ और चक्र का अर्थ है ‘परिवर्तन’ – इस प्रकार समय का परिवर्तन/फेर ही काल चक्र है।

हम यहाँ सर्वप्रथम काल की चर्चा कर रहे हैं, फिर चक्र/परिवर्तन की चर्चा अवसर्पिणी एवं उत्सर्पिणी काल के रूप में आगे विस्तार से करेंगे।

काल की परिभाषा / स्वरूप –

जैन दर्शनानुसार लोक षट्द्रव्यात्मक है।’ छह द्रव्यों में काल भी एक द्रव्य है, जो कि स्वतंत्र पदार्थ है। विभिन्न ग्रन्थों में काल का स्वरूप निम्नानुसार बताया है –

(1) स्पर्श, रस, गंध, वर्ण से रहित, अमूर्तलघुगुरु गुण सहित और वर्तना लक्षण से युक्त काल द्रव्य है।
(2) जीवादिभावानं परिवर्त्तनकारणो भवे कालो।’ अर्थात् जीवादि द्रव्यों के परिवर्तन का कारण काल द्रव्य है।
(3) वर्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य।’ अर्थात् वर्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्व काल के उपकार हैं।
(4) जो लोकाकाश के एक-एक प्रदेश पर रत्नों की राशि के समान भिन्न-भिन्न स्थित है, ऐसे कालाणु असंख्य द्रव्य है।

  1. षट्दर्शनसमुच्चय, 4/49/171/पृ.250
  2. ‘कालतत्त्व’ – तत्त्वार्थसूत्र, 5/39
  3. तिलोयपण्णत्ती, 4/281
  4. नियमसार, गाथा-33
  5. तत्त्वार्थसूत्र, 5/22
  6. द्रव्यसंग्रह, गाथा-22

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

(5) प्रत्येक द्रव्य अपने स्वभाव में सदा ही वर्तते हैं, उनका यह वर्तना किसी बाह्य सहकारी कारण के बिना नहीं हो सकता, अतः इनको वर्तनानेवाला सहकारी कारणरूप वर्तना लक्षण जिसमें पाया जाता है, उसे काल कहते हैं। काल के आधार से ही समस्त द्रव्य वर्तते हैं।

(6) काल द्रव्य अनादिनिधन है, वर्तना उसका लक्षण माना गया है। यह अत्यन्त सूक्ष्म, परमाणु बराबर है तथा असंख्यात होने के कारण सम्पूर्ण लोकाकाश में भरा हुआ है। इसमें अनन्त पदार्थों के परिणमन कराने की सामर्थ्य है, अतः स्वयं असंख्यात होकर भी अनन्त पदार्थों के परिणमन में सहकारी होता है।

जिसप्रकार छह द्रव्यों में धर्मास्तिकाय जीव-पुद्गलों के गमन में तथा अधर्मास्तिकाय उनकी स्थिति में निमित्त होता है, आकाश द्रव्य सब द्रव्यों को अवगाहना देने का कार्य करता है, उसीप्रकार काल द्रव्य सभी द्रव्यों के वर्तना/परिणमन में निमित्त होता है।

लोकाकाश के असंख्यात प्रदेश हैं। प्रत्येक प्रदेश पर एक-एक कालाणु स्थित होने से काल द्रव्य भी असंख्यात है। प्रत्येक कालाणु एक दूसरे से भिन्न है, स्वतंत्र है और एक प्रदेशी है। काल द्रव्य एक प्रदेशी होने से अस्तिकाय में शामिल नहीं है। जिनागम में बहुप्रदेशी द्रव्यों को अस्तिकाय कहा है, अतः काल को छोड़कर शेष पाँच द्रव्य अस्तिकाय" कहलाते हैं।

  1. गोम्मटसार, जीवकाण्ड, गाथा-568
  2. आदिपुराण, भाग-1, 3/2-3
  3. ‘गतिस्थित्यवगाहो धर्म्यधर्म्याकाशकारः।’ – तत्त्वार्थसूत्र 5/17
  4. ‘आकाशस्यावगाहो।’ – वही, 5/18
  5. बृहद् द्रव्यसंग्रह, गाथा-23

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

काल को धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय के समान लोकव्यापी एक अखण्ड द्रव्य नहीं माना जा सकता; क्योंकि इसे अनेक द्रव्य माने बिना जगत के विभिन्न क्षेत्रों में काल भेद संभव नहीं है। आकाश के प्रत्येक प्रदेश पर समय भेद इसे अनेक द्रव्य माने बिना नहीं बन सकता। भरत-ऐरावत क्षेत्र में दिन एवं उसी समय विदेह क्षेत्र में रात्रि रूप व्यवहार से भी काल द्रव्य की अनेकता सिद्ध होती है।

सूर्य-चन्द्रादि मनुष्य क्षेत्र में निरन्तर सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा" देते रहते हैं, इसी के कारण काल का विभाग" अर्थात् दिन-रात की व्यवस्था बनती है। मनुष्य लोक अर्थात् ढाई द्वीप के बाहर सूर्य-चन्द्रादि गमन नहीं करते; अतः बाहर दिन-रात का परिवर्तन भी नहीं होता। वहाँ सदैव एक समान परिस्थिति रहती है। यही कारण है कि आचार्य हरिभद्रसूरि काल द्रव्य का सद्भाव मनुष्य लोक में ही मानते हैं। उनका कहना है ‘मनुष्यलोकादबहिः कालद्रव्यं नास्ति’ अर्थात् मनुष्य लोक के बाहर काल द्रव्य नहीं है। उनके इस कथन को ज्योतिष विभागों के गमन की अपेक्षा उपचार मात्र ही समझना चाहिये।

काल को जब आकाश प्रदेशों पर रत्नाणं रासी इव" अर्थात् अर्थात् बिखरी हुई रत्नराशि के समान देखते हैं तो वह निश्चय काल अर्थात् कालाणु सम्पूर्ण लोकाकाश में मौजूद है, किन्तु जब काल को दिवस-रात्रि के कारण की दृष्टि से देखते हैं तो उस (व्यवहार काल) का सद्भाव मात्र ढाई द्वीप में कहा जा सकता है।

  1. ‘मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो मनुलोके।’ – तत्त्वार्थसूत्र, 4/13
  2. ‘तत्कृतः कालविभागः।’ – वही, 4/14
  3. षट्दर्शनसमुच्चय, 4/49/177/पृ. 253
  4. द्रव्यसंग्रह, गाथा-22

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

यह साध्य कथन है, वस्तुतः तो व्यवहार काल का सद्भाव भी सम्पूर्ण लोक में है।

काल के भेद –

काल एक द्रव्य होने से उत्पाद-व्यय-ध्रुवता से युक्त है। इसमें भी द्रव्य-गुण-पर्याय पाये जाती हैं। यद्यपि काल में प्रतिपल परिणमन होने से उत्पाद-व्यय होते रहते हैं, तथापि वस्तु स्वरूप (द्रव्य) की दृष्टि से वह जैसा का तैसा रहता है, उसके स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं होता, वह कभी भी कालान्तर रूप या अकालान्तर रूप हो जाता। अतीत, वर्तमान या भविष्य कोई भी अवस्था क्यों न हो – सभी में ‘काल, काल, काल’ – यह साधारण व्यवहार पाया ही जाता है। अविरल प्रवाहमान उस काल द्रव्य के विविध अपेक्षाओं से अनेक भेद मिलते हैं। जैसे – व्यवहार काल, निश्चयकाल, भूत-वर्तमान-भविष्य काल, उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल आदि।

1. व्यवहार और निश्चय काल –

काल द्रव्य के मुख्य (निश्चय) और अमुख्य (व्यवहार) – ऐसे दो भेद हैं। इनमें से मुख्य काल के आश्रय से अमुख्य काल की प्रवृत्ति होती है। जो द्रव्य के परिणमनरूप है, वह व्यवहार काल है तथा स्वयं वर्तना लक्षणयुक्त निश्चय काल है। आचार्य पूज्यपाद कहते हैं कि परमार्थकालो वर्तनालक्षणः, परिणामदि लक्षणो व्यवहारकालः" अर्थात् परमार्थ काल वर्तना लक्षण वाला

  1. तिलोयपण्णत्ती, 4/282
  2. द्रव्यसंग्रह, गाथा-21
  3. बृहद् द्रव्यसंग्रह, गाथा-223

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

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काल को धर्मस्तिकाय और अधर्मस्तिकाय के समान लोकाव्यापी एक अखण्ड द्रव्य नहीं माना जा सकता; क्योंकि इसे अनेक द्रव्य माने बिना जगत के विभिन्न क्षेत्रों में काल भेद संभव नहीं है। आकाश के प्रत्येक प्रदेश पर समय भेद इसे अनेक द्रव्य माने बिना नहीं बन सकता। भरत-ऐरावत क्षेत्र में दिन एवं उसी समय विदेह क्षेत्र में रात्रि रूप व्यवहार से भी काल द्रव्य की अनेकता सिद्ध होती है।

सूर्य-चन्द्रादि मनुष्य क्षेत्र में निरन्तर सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा12 देते रहते हैं, इसी के कारण काल का विभाग13 अर्थात् दिन-रात की व्यवस्था बनती है। मनुष्य लोक अर्थात् ढाई द्वीप के बाहर सूर्य-चन्द्रादि गमन नहीं करते; अतः बाहर दिन-रात का परिवर्तन भी नहीं होता। वहाँ सदैव एक समान परिस्थिति रहती है। यही कारण है कि आचार्य हरिभद्रसूरि काल द्रव्य का सद्भाव मनुष्य लोक में ही मानते हैं। उनका कहना है 'मनुष्यलोकादबहिः कालद्रव्यं नास्ति’14 अर्थात् मनुष्य लोक के बाहर काल द्रव्य नहीं है। उनके इस कथन को ज्योतिष विभागों के गमन की अपेक्षा उपचार मात्र ही समझना चाहिये।

काल को जब आकाश प्रदेशों पर रश्मणाणि रासी हुव15 अर्थात् बिखरी हुई रत्नराशि के समान देखते हैं तो वह निश्चय काल अर्थात् कालानु सम्पूर्ण लोकाकाश में मौजूद है, किन्तु जब काल को दिवस-रात्रि के कारण की दृष्टि से देखते हैं तो उस (व्यवहार काल) का सद्भाव मात्र ढाई द्वीप में कहा जा सकता है।

  1. मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो भूलोके। – तत्त्वार्थसूत्र, 4/13
  2. संस्कृतः कालविभागः। – वही, 4/14
  3. षड्दर्शनसमुच्चय, 4/49 /177 /पृ. 253
  4. द्रव्यसंग्रह, गाथा-22

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

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यह सापेक्ष कथन है, वस्तुतः तो व्यवहार काल का सद्भाव भी सम्पूर्ण लोक में है।

काल के भेद

काल एक द्रव्य होने से उत्पाद-व्यय-ध्रुवता से युक्त है। उसमें भी द्रव्य-गुण-पर्याय पायी जाती हैं। यद्यपि काल में प्रतिप्रण परिवर्तन होने से उत्पाद-व्यय होते रहते हैं, तथापि वस्तु स्वरूप (द्रव्य) की दृष्टि से वह जैसा का तैसा रहता है, उसके स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं होता, वह कभी भी कालान्तर रूप या अकालान्तर रूप हो जाता। अतीत, वर्तमान या भविष्य कोई भी अवस्था क्यों न हो – सभी में 'काल, काल, काल… यह साधारण व्यवहार पाया ही जाता है। अविरल प्रवाहमान उस काल द्रव्य के विविध अपेक्षाओं से अनेक भेद मिलते हैं। जैसे – व्यवहार काल, निश्चयकाल, भूत-वर्तमान-भविष्य काल, उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल आदि।

1. व्यवहार और निश्चय काल

काल द्रव्य के मुख्य (निश्चय) और अमुख्य (व्यवहार) – ऐसे दो भेद हैं। इनमें से मुख्य काल के आश्रय से अमुख्य काल की प्रवृत्ति होती है।16 जो दूसरे द्रव्यों के परिस्पन्दनरूप है, वह व्यवहार काल है तथा स्वयं वर्तना लक्षणयुक्त निश्चय काल है।17 आचार्य पूज्यपाद कहते हैं कि 'परमार्थकालो वर्तनालक्षणः, परिणामदि लक्षणो व्यवहारकालः’18 अर्थात् परमार्थ काल वर्तना लक्षण वाला

  1. तिलोयपण्णत्ती, 4/282
  2. द्रव्यसंग्रह, गाथा-21
  3. सर्वार्थसिद्धि, 5/22 /569 /पृ. 223

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

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व्यंजन पर्याय के वर्तमानरूप में ठहरने जितने काल को व्यवहार काल कहते हैं।19 यह समय, आवलि, उच्छ्वास, नाड़ी आदि अनेक प्रकार का होता है, इसकी गणना सूर्यादि ज्योतिषचक्र के घूमने से होती है।20 आचार्य पूज्यपाद भी इसीप्रकार की बात कहते हैं कि – समय और आवादी आदि रूप व्यवहार काल विभाग गतिवाले ज्योतिषी देवों के कारण किया गया है।21 आचार्य अकलंकदेव ने भी व्यवहार काल का कारण ज्योतिषी देवों को ही बताया है।22

व्यवहार काल का क्षेत्र बताते हुए आचार्य नेमिचन्द्र लिखते हैं कि – 'माणुसखेत्तम्हि’23 अर्थात् यह मनुष्य क्षेत्र में ही होता है। वस्तुतः व्यवहार काल का संबंध सूर्य, चन्द्रादि विमानों के गमन से है। ये सभी विमान मनुष्य लोक (ढाई द्वीप) में ही गमन करते हैं, अतः इस अपेक्षा से व्यवहार काल भी मनुष्य क्षेत्र में ही प्रवर्तता है। ढाई द्वीप के बाहर समस्त द्वीप-समुद्रों में तथा ऊर्ध्व-अधो लोक में सर्वत्र मनुष्य लोक की अपेक्षा से ही काल की गणना होती है।

आचार्य कुन्दकुन्द पंचास्तिकाय24 में कहते हैं कि – समय, निमिष, काष्ठा, कला, घड़ी, दिन-रात, मास, ऋतु, अयन और

  1. गोम्मटसार जीवकाण्ड, गाथा-572
  2. आदिपुराण, 3/12
  3. सर्वार्थसिद्धि, 4/14 /469 /पृ. 185
  4. तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 4/14 /पृ.407
  5. गोम्मटसार जीवकाण्ड, गाथा-577
  6. पंचास्तिकाय, गाथा-25

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

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वर्ष – इनमें परप्रतिपन्न अर्थात् पर की अपेक्षा होने से इन्हें व्यवहार काल कहा जाता है।

निश्चय काल का स्वरूप बताते हुए आचार्य कुन्दकुन्द लिखते हैं – काल दव्व पीच वण्ण व पंच रस से रहित, दो गन्ध व आठ स्पर्श से रहित, अगुरुअलघु, अमूर्त और वर्तना लक्षणवाला है।25 आचार्य अमृतचन्द्र क्रम से होने वाली समयरूप पर्यायों को व्यवहार काल तथा उसके आधारभूत द्रव्य को निश्चय काल कहते हैं। उनका मूल कथन इसप्रकार है –

क्रमानुपाती समयाख्यः पर्यायो व्यवहारकालः, तदाधारभूतं द्रव्यं निश्चयकालः।26

इसीप्रकार का भाव वे आगे भी व्यक्त करते हैं – 'निश्चय-कालो णिययः द्रव्यरूपत्वात्, व्यवहारकालः क्षणिकः पर्याय रूपात्वादिति’27 अर्थात् निश्चयकाल द्रव्यरूप होने से नित्य है तथा व्यवहार काल पर्यायरूप होने से क्षणिक है।

उक्त सम्पूर्ण आगम प्रमाणों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्तना लक्षण युक्त कालानु निश्चय काल द्रव्य है तथा जो दूसरे द्रव्यों के परिणमन में निमित्त हो वह व्यवहार काल है। तथा जब द्रव्यों के परिणमन में सहयोगी होने को निश्चय काल कहा जाता है, तब घड़ी-घण्टा, दिन-रात आदि को व्यवहार काल कहते हैं।

  1. पंचास्तिकाय, गाथा-24
  2. वही, गाथा-100 की टीका
  3. वही, गाथा-101 की टीका

2. व्यवहार काल के विविध मापदण्ड

व्यवहार काल को प्रदर्शित करने के लिये जैनाचार्यों ने अनेक माप दण्ड निर्धारित किये हैं। गोम्मटसार जीवकाण्ड२८ एवं लोकविभाग२९ में दिये गये विविध घटकों को निम्नानुसार देखा जा सकता है –

काल का अविभागी अंश = 1 समय
असंख्यात समय = 1 आवली
संख्यात आवली = 1 उच्छ्वास
7 उच्छ्वास = 1 स्तोक
7 स्तोक = 1 लव
38.5 लव (24 मिनिट) = 1 नाली (घड़ी/घटी)
2 नाली = 1 मुहूर्त
1 मुहूर्त में 1 समय कम = भिन्नमुहूर्त/अंतर्मुहूर्त
30 मुहूर्त (24 घण्टा) = 1 दिनरात
15 दिन = 1 पक्ष
2 पक्ष = 1 मास
2 मास = 1 ऋतु
3 ऋतु = 1 अयन (छः मास)
2 अयन = 1 वर्ष

व्यवहार काल सूचक इसीप्रकार के विविध घटकों की चर्चा किंचित् शब्द भेद करते हुये आचार्य यतिवृषभस्वामी३० ने तथा

असंख्य समय = 1 निमिष
8 निमिष = 1 काष्ठा
16 काष्ठा = 1 कला
32 कला = 1 घड़ी
60 घड़ी = 1 अहोरात्र
30 अहोरात्र = 1 मास
2 मास = 1 ऋतु
3 ऋतु = 1 अयन (छः मास)
2 अयन = 1 वर्ष

काल का सबसे छोटा अविभागी अंश समय के नाम से जाना जाता है, इसका परिमाण बताते हुये कहा है कि पुद्गल के परमाणु को आकाश के एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश पर गमन में जो अविभागी काल लगता है, वह समय है।३१ लोक विभाग में एक परमाणु द्वारा दूसरे परमाणु को लांघने में लगे काल को समय कहा है।३२ जैनाचार्यों ने 150 अंक प्रमाण वर्षों के काल को उत्कृष्ट संख्यात काल कहा है और इसे अचलात्मा३३ संज्ञा से संबोधित किया है। वर्ष से लेकर अचलात्म तक के कालांशों की चर्चा को आचार्य यतिवृषभ ने तिलोयपण्णत्ती३४ में विस्तार से बताया है।

  1. गोम्मटसार जीवकाण्ड, गाथा 573 से 576
  2. लोकविभाग, 6/201-204
  3. तिलोयपण्णत्ती, 4/289-292
  4. नियमसार, गाथा-31 टीका
  5. तिलोयपण्णत्ती, 4/288
  6. लोकविभाग, 6/201
  7. तिलोयपण्णत्ती, 4/312
  8. वही, 4/294 से 312 का सार

3. संख्यात, असंख्यात और अनन्त काल

जैन आगम३७ में दो को जघन्य संख्यात तथा अचलात्म को उत्कृष्ट संख्यात कहा है। इन दोनों के बीच की संख्याओं को मध्यम संख्यात कहा गया है। उत्कृष्ट संख्यात काल को 150 अंक प्रमाण उक्त माप निकालने के लिये बुद्धि कल्पित एक लाख योजन विस्तारवाले और एक हजार योजन गहरे – शलाका, प्रतिशलाका, महाशलाका तथा अनवस्था नामक चार कुण्ड स्थापित कर उनमें सरसों के दानों को आधार बनाकर विस्तार से समझाया है। यह 150 अंक प्रमाण उत्कृष्ट संख्यात चौदह पूर्व के ज्ञाता श्रुतकेवली के ज्ञान का विषय है।

उत्कृष्ट संख्यात में एक जोड़ देने पर जघन्य असंख्यात हो जाता है। यहाँ असंख्यात के भी नौ भेद बताये गये हैं। जघन्य परित्तासंख्यात, मध्यम परित्तासंख्यात, उत्कृष्ट परित्तासंख्यात, जघन्य युक्तासंख्यात, मध्यम युक्तासंख्यात, उत्कृष्ट युक्तासंख्यात, जघन्य असंख्यातासंख्यात, मध्यम असंख्यातासंख्यात और उत्कृष्ट असंख्यातासंख्यात। यह उत्कृष्ट असंख्यात अवधि ज्ञान का विषय है।३८

उत्कृष्ट असंख्यातासंख्यात में एक जोड़ देने पर जघन्य अनन्त होता है। इसके भी नौ भेद बताये गये हैं। जघन्य परित्तानन्त, मध्यम परित्तानन्त, उत्कृष्ट परित्तानन्त, जघन्य युक्तानन्त,

मध्यम युक्तानन्त, उत्कृष्ट युक्तानन्त, जघन्य अनन्तानन्त, मध्यम अनन्तानन्त और उत्कृष्ट अनन्तानन्त। यह अनन्त केवलज्ञान का विषय है।३९ छद्मस्थ के ज्ञान का विषय नहीं है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मतिज्ञान, श्रुतज्ञान के माध्यम से इन्हीं तक की गणना को जाना जा सके, वह संख्यात है। इससे अधिक वर्षों तक की गणना अवधिज्ञान-मनःपर्यय ज्ञान का विषय बने, वह असंख्यात है। इससे अधिक जिसे सिर्फ केवलज्ञान के माध्यम से जाना जा सके, वह अनन्त है।

इसप्रकार आत्मा के ज्ञान नामक एक गुण की एक समय की पर्याय में अपरिमित अनन्त काल को जानने की सामर्थ्य है। इससे ज्ञान गुण की सामर्थ्य एवं ज्ञान जैसे अनन्त गुण जिस आत्मा में हैं – ऐसे आत्मा की सामर्थ्य का अनुमान लगाया जा सकता है। अनन्त सामर्थ्यवान होकर भी यह जीव अपनी प्रभुता को न पहचानने के कारण ही अनंत दुख भोग रहा है।

4. भूत, वर्तमान और भविष्य काल

व्यवहार काल के भूत, वर्तमान, और भविष्य के रूप में तीन भेद भी किये गये हैं। आचार्य पूज्यपाद कहते हैं – **स त्रिधा व्यवतिष्ठते-भूतो वर्तमानो भविष्यति। परमार्थात्काले कालव्यपदेशो मुख्यः, मुक्तादिपदेशो गौणः। व्यवहारकाले भूतादिव्यपदेशो मुख्यः, कालव्यपदेशो गौणः।**४० अर्थात् वह

  1. तिलोयपण्णत्ती, 4/313 व टीका का सार
  2. तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/38, पृष्ठ-206
  3. तिलोयपण्णत्ती, 4/314 व टीका से
  4. तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/38, पृष्ठ-206/प. 30
  5. सर्वार्थसिद्धि, 5/22/569/पृ. 223

3. संख्यात, असंख्यात और अनंत काल -

जैन आगमों में दो को जघन्य संख्यात तथा अचलात्म को उत्कृष्ट संख्यात कहा है। इन दोनों के बीच की संख्याओं को मध्यम संख्यात कहा गया है। उत्कृष्ट संख्यात काल का 150 अंक प्रमाण उक्त माप निकालने के लिये बुद्धि कल्पित एक लाख योजन विस्तारवाले और एक हजार योजन गहरे - शलाका, प्रतिशलाका, महाशलाका तथा अनवस्था नामक चार कुण्ड स्थापित कर उनमें सरसों के दानों को आधार बनाकर विस्तार से समझाया है। यह 150 अंक प्रमाण उत्कृष्ट संख्यात चौदह पूर्व के ज्ञाता श्रुतकेवली के ज्ञान का विषय है।

उत्कृष्ट संख्यात में एक जोड़ देने पर जघन्य असंख्यात हो जाता है। यहीं असंख्यात के भी नौ भेद बताये गये हैं। जघन्य परित्तासंख्यात, मध्यम परित्तासंख्यात, उत्कृष्ट परित्तासंख्यात, जघन्य युक्तासंख्यात, मध्यम युक्तासंख्यात, उत्कृष्ट युक्तासंख्यात, जघन्य असंख्यातासंख्यात, मध्यम असंख्यातासंख्यात और उत्कृष्ट असंख्यातासंख्यात। यह उत्कृष्ट असंख्यात अवधि ज्ञान का विषय है।

उत्कृष्ट असंख्यातासंख्यात में एक जोड़ देने पर जघन्य अनंत होता है। इसके भी नौ भेद बताये गये हैं। जघन्य परित्तानंत, मध्यम परित्तानंत, उत्कृष्ट परित्तानंत, जघन्य युक्तानंत,

  1. तिलोयपण्णत्ती, 4/313 व टीका का सार
  2. तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/38, पृष्ठ-206
  3. (1) तिलोयपण्णत्ती, 4/314 एवं टीका से
    (2) तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/38 /पृ. 206/पृ. 30

मध्यम युक्तानंत, उत्कृष्ट युक्तानंत, जघन्य अनंतानंत, मध्यम अनंतानंत और उत्कृष्ट अनंतानंत। यह अनंत केवलज्ञान का विषय है। छद्मस्थ के ज्ञान का विषय नहीं है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मतिज्ञान, श्रुतज्ञान के माध्यम से जहाँ तक की गणना का जाना जा सके, वह संख्यात है। इससे अधिक जहाँ तक की गणना अवधिज्ञान-मनःपर्यय ज्ञान का विषय बने, वह असंख्यात है। इससे अधिक जिसे सिर्फ़ केवलज्ञान के माध्यम से जाना जा सके, वह अनंत है।

इसप्रकार आत्मा के ज्ञान नामक एक गुण की एक समय की पर्याय में अपरिमित अनंत काल को जानने की सामर्थ्य है। इससे ज्ञान गुण की सामर्थ्य एवं ज्ञान जैसे अनंत गुण जिस आत्मा में हैं - ऐसे आत्मा की सामर्थ्य का अनुमान लगाया जा सकता है। अनंत सामर्थ्यवान होकर भी यह जीव अपनी प्रभुता को न पहिचानने के कारण ही अनंत दुःख भोग रहा है।

4. भूत, वर्तमान और भविष्य काल -

व्यवहार काल के भूत, वर्तमान, और भविष्य के रूप में तीन भेद भी किये गये हैं। आचार्य पूज्यपाद कहते हैं - स त्रिधा व्यवतिष्ठते-भूतो वर्तमानो भविष्यति। तत्र परमार्थकाले काव्यपदेशो मुख्यः, मृतादिपदेशो गौणः। व्यवहारकाले भूतादिपदेशो मुख्यः, कालव्यपदेशो गौणः। अर्थात् वह

  1. (1) तिलोयपण्णत्ती, 4/315 एवं टीका से
    (2) तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/38 /पृ. 206/पृ. 31
  2. सर्वार्थसिद्धि, 5/22/569/पृ. 223

काल - भूत, वर्तमान और भविष्य के भेद से तीन प्रकार का कहा गया है। निश्चय काल का कथन करने पर काल संज्ञा मुख्य तथा भूतकाल आदि का उपदेश (कथन) गौण रहता है तथा व्यवहार काल का कथन करने पर भूतकाल आदिप संज्ञा मुख्य है और काल संज्ञा गौण है। आचार्य अमृतचन्द्र ने भी अतीतानागतवर्तमान भेदात् त्रिधा वा कहकर व्यवहार काल को तीन भेद वाला बताया है। आदिपुराण में कहा है कि संसार का व्यवहार चलाने में समर्थ होने से भूत, भविष्यत और वर्तमान रूप से व्यवहार काल की कल्पना की है।

इन तीनों कालों की परिभाषा बताते हुये आचार्य नेमिचन्द्र कहते हैं कि सिद्ध राशि को संख्यात आवली के प्रमाण से गुणा करने पर जो प्रमाण हो, उतना ही अतीत/भूतकाल का प्रमाण है। वस्तुतः हर छह महीना आठ समय में छह सौ आठ जीव मुक्ति/सिद्धदशा प्राप्त करते हैं। अतः सिद्ध राशि को छह महीना आठ समय से गुणा करके 608 का भाग देने पर अतीत काल का प्रमाण संख्यात आवलि गुणित सिद्धराशि प्राप्त होता है।

वर्तमान काल का प्रमाण एक समय मात्र है। तथा सम्पूर्ण जीव राशि व समस्त पुद्गलद्रव्य राशि से भी अननुगुणा भविष्यत काल का प्रमाण है। यह व्यवहार काल वर्तमान की अपेक्षा उत्तरोत्तरक्षी और भूत-भविष्य की अपेक्षा दीर्घातरस्थायी अर्थात् लम्बे समय तक रहने वाला है।

  1. नियमसार, गाथा-31 टीका
  2. आदिपुराण, 3/11
  3. गोम्मटसार जीवकाण्ड, गाथा - 578-580

5. उत्सर्पिणी - अवसर्पिणी काल -

जैन परम्परा के अनुसार कालचक्र उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के रूप में क्रमशः निरन्तर परिवर्तन किया करता है। उत्सर्पिणी काल उत्थान का काल है, इस काल में विकास देखा जाता है तथा अवसर्पिणी काल ह्रास का काल है, इसमें निरन्तर गिरावट /कमी देखी जाती है। इन दोनों का स्वरूप स्पष्ट करनेवाले कतिपय शास्त्रीय उद्धरण निम्नानुसार है, किंचित शब्द भेद से लगभग सभी में एकसी बात कही गई है -

(1) नर-तिरियांण आयु, उच्छेह-विहुद्धि सव्वं। अवसप्पिणि हादि, उसप्पिणिआसु वड्ढदि।।

अवसर्पिणी काल में मनुष्य एवं तिर्यंचों की आयु, शरीर की ऊँचाई व वृद्धि आदि सब ही घटते रहते हैं तथा उत्सर्पिणी काल में बढ़ते रहते हैं।

(2) भरते ऐरावते च मनुष्याणां वृद्धाहासाविति…अनुवायुः प्रमाणादिकृति।

जिसमें भरत और ऐरावत क्षेत्र में मनुष्यों के अनुयु, आयु, प्रमाण आदि की वृद्धि होती है, वह उत्सर्पिणी काल है और जिसमें इनका ह्रास होता है, वह अवसर्पिणी काल है।

(3) अनुवृद्धिमिरवसर्पशीला अवसर्पिणी। तद्विपरीतोत्सर्पिणी।

जिसमें अनुवृद्ध, आयु, शरीरादि की उत्तरोत्तर उन्नति हो, वह

  1. तिलोयपण्णत्ती, 4/318
  2. सर्वार्थसिद्धि, 3/27/418/पृ. 166
  3. तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/27/4-5/पृ. 191

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

उत्सर्पिणी और जिसमें अवनति हो, वह अवसर्पिणी है।

(4) उत्सर्पिण्यवसर्पिणी द्वौ भेदो तयो कीर्तिता।
उत्सर्पिणवसर्पिणौ बलाढ्यदुर्बलगम् ।।
जिसमें मनुष्यों के बल, आयु और शरीर का प्रमाण क्रम-क्रम से बढ़ता जाये, उसे उत्सर्पिणी कहते हैं और जिसमें वे क्रम-क्रम से घटते जाये, उसे अवसर्पिणी कहते हैं।

(5) जब बाहुबल, वैभव, मनुष्य शरीर, धर्म, ज्ञान, गाम्भीर्य और धैर्य बढ़ते हैं तो उत्सर्पिणी काल होता है, और जब ये घटते हैं, तब अवसर्पिणी काल होता है।

(6) पंच भरत एवं पंच ऐरावत क्षेत्रों में स्थित जीवों के शरीर की ऊँचाई, आयु और बल की क्रमशः अवसर्पिणी में हानि और उत्सर्पिणी काल में वृद्धि होती है।

अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी कालों का प्रमाण –

दोनों ही काल छह-छह प्रकार के हैं। अवसर्पिणी काल – सुषमासुषमा, सुषमा, सुषमादुषमा, दुषमासुषमा, दुषमा और अतिदुषमा (दुषमादुषमा) के भेद से छह प्रकार का है तथा उत्सर्पिणी काल अतिदुषमा से प्रारंभ करके क्रमशः बढ़ता हुआ सुषमासुषमा तक जाता है। दोनों ही कालों का प्रमाण दस-दस कोड़ाकोड़ी सागरोपम है। दोनों को मिलाकर एक कल्पकाल

  1. आदिपुराण, 3/14
  2. आचार्य पुष्पदन्त : महापुराण, भाग-1, संधि-2/8/पृ.31
  3. त्रिलोकसार, गाथा 779

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

होता है। कोड़ाकोड़ी का अर्थ करोड़ गुणा करोड़ होता है। वर्तमान में कुछ विचारक गणनाओं में साम्राज्य बैलोन के लिये कोड़ी शब्द का अर्थ 20 अथवा 10 भी बताने लगे हैं। लौकिक में पतंग आदि कुछ वस्तुयें कोड़ी की गणनानुसार बिकती है, परन्तु अलौकिक गणनाओं में यह अर्थ उचित प्रतीत नहीं होता।

सागरोपम –

यह काल का एक नाप है, जिसका अर्थ मानव को द्वारा समस्त संख्याओं से अधिक काल वाले काल खण्ड का उपमा द्वारा प्रदर्शित परिमाण होता है। दस कोड़ाकोड़ी पत्योपम का एक सागरोपम होता है। पत्योपम की चर्चा त्रिलोकपण्णत्ती, सर्वार्थसिद्धि, राजवार्तिक, त्रिलोकसार, कार्तिकेयानुप्रेक्षा आदि अनेक आगम ग्रन्थों में विस्तार से की गई है। यहाँ इसका स्वरूप स्पष्ट करते हुये कहा है कि – एक प्रमाण योजन विस्तार वाले और इतने ही गहरे गड्ढे को उत्तम भोगभूमि में एक दिन से लेकर सात दिन तक के उत्पन्न हुये मेढ़े के करोड़ों रोमों के अविभागी खण्डों से भरकर सौ-सौ वर्षों में एक-एक बाल निकाले। जब वह गड्ढा पूरा खाली हो जाये तब एक व्यवहार पत्य (पत्योपम) होता है। असंख्य व्यवहार पत्य का एक उद्धारपत्य तथा असंख्य

  1. (1) त्रिलोकपण्णत्ती, 4/319 व 320 (पूर्वार्ध)
    (2) तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/27/पृ. 388
    (3) आदिपुराण, 3/15/पृ. 47
  2. त्रिलोकपण्णत्ती, 1/130
  3. त्रिलोकपण्णत्ती, 1/119-130 का सार
  4. सर्वार्थसिद्धि, 3/38/439/पृ.174 का सार
  5. तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/38/7/पृ. 208 का सार
  6. त्रिलोकसार, गाथा-102
  7. कार्तिकेयानुप्रेक्षा, लोकानुप्रेक्षा, भावार्थ पृ.-56-57

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

उदाहरणरूप एक अद्धापत्य होता है। दस कोड़ाकोड़ी अद्धापत्योपम का एक सागरोपम होता है। ऐसे बीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम का एक कल्पकाल कहा गया है।

अवसर्पिणी व उत्सर्पिणी के विभाग –

त्रिलोकपण्णत्ती, राजवार्तिक, त्रिलोकसार एवं लोकविभाग में अवसर्पिणी व उत्सर्पिणी के दस-दस कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण काल को उनके छह भेदों में विभाजित किया है। अवसर्पिणी के छह विभाग / काल निम्नानुसार है –

(1) सुषमासुषमा – 4 कोड़ाकोड़ी सागर
(2) सुषमा – 3 कोड़ाकोड़ी सागर
(3) सुषमादुषमा – 2 कोड़ाकोड़ी सागर
(4) दुषमासुषमा – 1 कोड़ाकोड़ी सागर में 42,000 वर्ष कम
(5) दुषमा – 21,000 वर्ष
(6) अतिदुषमा – 21,000 वर्ष

उत्सर्पिणी के छह विभाग इसके विपरीत क्रम में है, जो कि निम्नानुसार है –

(1) अतिदुषमा – 21,000 वर्ष

  1. त्रिलोकपण्णत्ती, 4/320-323
  2. सर्वार्थसिद्धि, 3/27/418/पृ. 166-167
  3. तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/27/पृ. 388
  4. त्रिलोकसार, 781
  5. लोकविभाग, 5/5-7
  6. त्रिलोकपण्णत्ती, 4/15-76

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

(2) दुषमा – 21,000 वर्ष
(3) दुषमासुषमा – 1 कोड़ाकोड़ी सागर में 42,000 वर्ष कम
(4) सुषमादुषमा – 2 कोड़ाकोड़ी सागर
(5) सुषमा – 3 कोड़ाकोड़ी सागर
(6) सुषमासुषमा – 4 कोड़ाकोड़ी सागर

उक्त नामों में काल अथवा समय सूचक ‘समा’ शब्द में ‘सु’ एवं ‘दुर’ उपसर्गों का प्रयोग उनके शुभ और अशुभ का सूचक है। इन उपसर्गों से छहों कालों के नाम की सार्थकता बताते हुये आचार्य जिनसेन लिखते है –

समा कालविभागः स्यात् सुदुसार्द्धयोः।

सुषमा दुषमेत्येवतोऽर्द्धमेवतोः ।।
समा काल के विभाग को कहते हैं तथा ‘सु’ और ‘दुर’ उपसर्ग क्रम से अच्छे और बुरे अर्थ में आते हैं। ‘सु’ और ‘दुर’ उपसर्गों को पृथक्-पृथक् समा के साथ जोड़ देने तथा व्याकरण के नियमानुसार ‘स’ को ‘ष’ कर देने से सुषमा और दुषमा शब्दों की सिद्धि होती है, जिनका अर्थ क्रम से अच्छा काल और बुरा काल होता है। इस तरह उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल के छहों भेद सार्थक नाम वाले हैं।

ये उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी नामक दोनों ही भेद कालचक्र के परिक्षण में अपने छहों कालों के साथ-साथ कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की तरह घूमते रहते हैं अर्थात् जिस तरह कृष्ण पक्ष

  1. आदिपुराण, 3/19
  2. वही, 3/21

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

20

उदाहरणपल का एक अद्धापल्य होता है। दस कोड़ाकोड़ी अद्धापल्य का एक सागरोपम होता है। ऐसे बीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम का एक कल्पकाल कहा गया है।

अवसर्पिणी व उत्सर्पिणी के विभाग - तिलोयपण्णत्ती, सर्वार्थसिद्धि, राजवार्तिक, तिलोयसार एवं लोकविभाग में अवसर्पिणी व उत्सर्पिणी के दस-दस कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण काल को उनके छह भेदों में विभाजित किया है। अवसर्पिणी के छह विभाग / काल निम्नानुसार है -

(1) सुषमासुषमा - 4 कोड़ाकोड़ी सागर
(2) सुषमा - 3 कोड़ाकोड़ी सागर
(3) सुषमादुषमा - 2 कोड़ाकोड़ी सागर
(4) दुषमासुषमा - 1 कोड़ाकोड़ी सागर में 42,000 वर्ष कम
(5) दुषमा - 21,000 वर्ष
(6) अतिदुषमा - 21,000 वर्ष

उत्सर्पिणी के छह विभाग इसके विपरीत क्रम में है, जो कि निम्नानुसार है -

(1) अतिदुषमा - 21,000 वर्ष

  1. तिलोयपण्णत्ती, 4/320-323
  2. सर्वार्थसिद्धि, 3/27 /418 /पृ. 166-167
  3. तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/27 /पृ. 388
  4. तिलोयसार, 781
  5. लोकविभाग, 5/5-7
  6. तिलोयपण्णत्ती, 4/1576-77

21

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

(2) दुषमा - 21,000 वर्ष
(3) दुषमासुषमा - 1 कोड़ाकोड़ी सागर में 42,000 वर्ष कम
(4) सुषमादुषमा - 2 कोड़ाकोड़ी सागर
(5) सुषमा - 3 कोड़ाकोड़ी सागर
(6) सुषमासुषमा - 4 कोड़ाकोड़ी सागर

उक्त नामों में काल अथवा समय सूचक ‘समा’ शब्द में ‘सु’ एवं ‘दुर’ उपसर्गों का प्रयोग उनके शुभ और अशुभ का सूचक है। इन उपसर्गों से छहों कालों के नाम की सार्थकता बताते हुये आचार्य जिनसेन लिखते है -

समा कालविभागः स्यात् सुदुषावसर्गयोः।

सुषमा दुषमेत्येवन्तोऽर्थवत्तयोः ।।

समा काल के विभाग को कहते हैं। तथा ‘सु’ और ‘दुर’ उपसर्ग क्रम से अच्छे और बुरे अर्थ में आते हैं। ‘सु’ और ‘दुर’ उपसर्गों को पृथक्-पृथक् समा के साथ जोड़ देने तथा व्याकरण के नियमानुसार ‘स’ को ‘ष’ कर देने से सुषमा और दुषमा शब्दों की सिद्धि होती है, जिनका अर्थ क्रम से अच्छा काल और बुरा काल होता है। इस तरह उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल के छहों भेद सार्थक नाम वाले हैं।

ये उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी नामक दोनों ही भेद कालचक्र के परिक्षण में अपने छहों कालों के साथ-साथ कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की तरह घूमते रहते हैं अर्थात् जिस तरह कृष्ण पक्ष

  1. आदिवपुराण, 3/19 65. वही, 3/21

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काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

के बाद शुक्ल पक्ष और शुक्ल पक्ष के बाद कृष्ण पक्ष आता है, उसीतरह अवसर्पिणी काल के बाद उत्सर्पिणी और उत्सर्पिणी के बाद अवसर्पिणी काल आता है। कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष के समान कालचक्र परिवर्तन की बात रविषेणाचार्य ने पद्म पुराण में भी की है। तिलोयपण्णत्ती में भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों में रेहट-घटिका न्याय की तरह अनन्तानन्त उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी होने का उल्लेख है। ये क्रम सदा चलता ही रहता है।

इस कल्पचक्र के क्रम को चित्र द्वारा निम्नानुसार देखा जा सकता है -

चित्र: एक चक्र जिसमें अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी के छह-छह काल दर्शाए गए हैं। अवसर्पिणी में पहला काल सुषमासुषमा (4 कोड़ाकोड़ी सागर), दूसरा सुषमा (3 कोड़ाकोड़ी सागर), तीसरा सुषमादुषमा (2 कोड़ाकोड़ी सागर), चौथा दुषमासुषमा (1 कोड़ाकोड़ी सागर में 42,000 वर्ष कम), पाँचवाँ दुषमा (21,000 वर्ष) और छठा अतिदुषमा (21,000 वर्ष) हैं। उत्सर्पिणी में ये काल विपरीत क्रम में हैं।

  1. पद्मपुराण, प्रथम भाग, 3/73
  2. रेहट घटिका न्याय - जैसे रेहट की घड़ियाँ चक्रवत घूमती हुई बार-बार ऊपर एवं नीचे आती-जाती हैं, उसीप्रकार अवसर्पिणी के बाद उत्सर्पिणी और उत्सर्पिणी के बाद अवसर्पिणी - इन कालों का परिवर्तन होता ही रहता है।
  3. तिलोयपण्णत्ती, 4/1636

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काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

अवसर्पिणी के प्रथम तीन काल (भोगभूमि)

भारत एवं ऐरावत क्षेत्रों में अवसर्पिणी के प्रथम तीन कालों में भोग भूमि रहती है। इन कालों में भोगों की प्रधानता होती है, इसीलिए यहाँ के काल भोगभूमि कहलाते हैं। यहाँ सभी बाह्य सामग्री विविध प्रकार के कल्पवृक्षों से प्राप्त होती है। यहाँ सभी युगलिया जन्म लेते हैं, और वे जीवन पर्यंत पति-पत्नी के समान रहते हैं। इन मनुष्यों की आयु नौ मास शेष रहने पर ही स्त्री के गर्भ धारण होता है, शेष काल में किसी के भी गर्भ नहीं रहता, फिर नौ मास पूर्ण होने पर युगल (नर-नारी) भूशय्या पर सोकर गर्भ से युगल (पुत्र-पुत्री) के निकलने पर तत्काल ही मरण को प्राप्त हो जाते हैं। अंतिम समय में पुरुष को छींक और स्त्री को जँभाई आने से मृत्यु होती है अथवा आदिवपुराण एवं तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक के अनुसार आयु के अन्त में पुरुष को जँभाई और स्त्री को छींक आने से मृत्यु होती है।

भोगभूमि में नर-नारी के शरीरों शरीर शरद ऋतु के मेघों के समान क्षय ही आबूल विलीन हो जाते हैं। तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिक के अनुसार उनके शरीर विशुद्ध के समान विघट जाते हैं। यहाँ उत्पन्न हुये जीवों का कंदलीघात मरण अथवा आयु का अपवर्तन

  1. युगलिया = बालक-बालिका युगल रूप में
  2. तिलोयपण्णत्ती, 4/379-380
  3. वही 4/381
  4. आदिवपुराण, 3/42
  5. तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिक, भाग-5, 3/31 /पृ. 351 /पं.4
  6. तिलोयपण्णत्ती, 4/381
  7. तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिक, भाग-5, 3/31 /पृ. 351 /पं.5

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

नहीं होता।‘’ इनका शरीर सान्त धातुमय होते हुए भी छेदा-भेदा नहीं जा सकता। अशुचिता से रहित होने के कारण उनके शरीर से मूत्र तथा विष्ठा का आस्रव नहीं होता। आदिपुराण के अनुसार उन लोगों को पसीना भी नहीं आता। यही शरीर में रोग भी नहीं होते, कोई किसी का शत्रु नहीं होता, सिंह और हाथी भी साथ रहते हैं, लोगों का लावण्य रंग और विलास से परिपूर्ण वय और यौवन भी नष्ट नहीं होते।

देखो ! पुण्योदय का यह ठाठ देखकर हमारा मन ललचाता है, किन्तु भाई ! हमने भी आत्मज्ञान के अभाव में इस पंच परावर्तन रूप संसार में परिश्रम करते हुए भोगभूमि में अनन्त बार जन्म लिया है। उत्तम, मध्यम और जघन्य सभी भोगभूमियों में हम अनन्त बार जन्म-मरण कर चुके हैं।

अनेक बार भाविलिंगी मुनिराजों को आहार दान देने के बाद भोगभूमि में जन्म लेकर भी यह जीव स्वयं सम्यक्त्व से शून्य रहा। वहाँ अनंत बार तीन पल्य की आयु तक बाह्य अनुकूलतामय जीवन भी पारमार्थिक सुख के बिना दुख से ही बीता।

भोगभूमियों के सभी जीव स्वभाव से ही कोमल परिणामी होते हैं, इसलिये मरकर स्वर्ग में ही जाते हैं, इनकी स्वर्ग के सिवाय और कोई गति नहीं होती। यहाँ के मिथ्यादृष्टि

  1. (1) तिलोयपण्णत्ती, 4/361 (2) तत्त्वार्थसूत्र, 2/53
  2. (3) सर्वार्थसिद्धि, 2/53/365/पृ. 148
  3. तिलोयपण्णत्ती, 4/387
  4. आदिपुराण, 3/31
  5. आचार्य पूज्यपाद कृत महापुराण, भाग-1, सन्धि-2/8, पृष्ठ-31
  6. आदिपुराण, 3/43

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

मनुष्य-तिर्यंच मरकर भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी देवों में तथा सम्यग्दृष्टि मनुष्य-तिर्यंच मरकर सौधर्म युगल में उत्पन्न होते हैं। इससे ऊपर नहीं जाते।

इन कालखण्डों में जन्म लेने वाले मनुष्यादि प्राणियों का जीवन भोग प्रधान रहता है। इस समय प्रकृति इतनी सम्पन्न होती है कि उसके निवासियों को जीवन यापन के लिए किसी भी प्रकार के कृषि, मसि, व्यापार, उद्योग, शिल्प अथवा असि आदि कर्म की आवश्यकता नहीं होती। प्रकृति से सहज रूप से प्राप्त भोग्य सामग्री का उपभोग करना ही उनका कार्य रहता है। सभी सामग्री उनको संकल्प मात्र से कल्पवृक्षों द्वारा प्राप्त हो जाती है।

कल्पवृक्षों का स्वरूप -

भोगभूमि में उत्पन्न हुए जीवों को मनवांछित पदार्थ कल्पवृक्ष से प्राप्त हो जाते हैं। पुण्यात्मा पुरुषों को मनचाहे भोग देने में समर्थ होने से ही ज्ञानियों ने इनको कल्पवृक्ष संज्ञा सार्थक कही है। इन भोगभूमियों में जन्मे युगल कल्पवृक्षों द्वारा दी गई वस्तुओं को ग्रहण करके और विक्रिया द्वारा बहुत प्रकार के शरीर बना कर अनेक भोग भोगते हैं। इनके भोगों की बाहुल्यता बताते हुये आचार्य यतिवृषभदेव लिखते हैं -

‘जुगलाणं अणंतगुण, भोगं चक्कहर भोग लाहदो।’

  1. तिलोयपण्णत्ती, 4/382
  2. आदिपुराण, 3/38
  3. तिलोयपण्णत्ती, 4/362
  4. वही, 4/361 (पूर्वार्द्ध)

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

अर्थात् ये युगलिया जीव चक्रवर्ती के भोग-लाभ की अपेक्षा अनंत गुण भोग भोगते हैं। चक्रवर्ती तो कर्म भूमि में होते हैं, उन्हें विशेष कर्म करना पड़ता है, जब कि भोगभूमिया जीवों को सर्व सुविधाएँ कल्पवृक्षों से प्राप्त होती हैं, उन्हें मनवांछित समस्त भोग सामग्री प्राप्त होती है, फिर भी आचार्य नेमिचन्द्र लिखते हैं कि -

‘सुलहेसु वि गो तित्तिं पंचक्खविएसु’

अर्थात् पंचेंद्रिय भोगों की अतिसुलभता भी उन्हें तृप्ति प्रदान नहीं करती। कहने का तात्पर्य यह है कि भोगों की बाहुल्यता इस जीव को सुखी करने में समर्थ नहीं है।

भोग सामग्री इकट्ठी करने के पहले हमें भी यह विचार करना चाहिये कि भोगों में सुख है भी या नहीं ? ‘इनमें सुख है ही नहीं’ - यदि ऐसी प्रतीति हो जाये तो भोगों की वासना मिटने बिना न रहे। वर्तमान में हम कितनी भी भोग सामग्री एकत्रित कर लें, वह भोगभूमि की तुलना में अत्यल्प ही होगी; अतः विचार करना कि भोगभूमि में इतनी अनुकूल सामग्री में भी तृप्ति नहीं हुई तो अब इस अल्प सामग्री से तृप्ति कैसे होगी ? अतः भोग सामग्री से दृष्टि हटाकर अपने स्वभाव को देखने का प्रयत्न करना चाहिये।

जीवन पर्यंत भोगी वाले वे समस्त भोग सामग्री उनको दस प्रकार के कल्पवृक्षों से प्राप्त होती है। जैन आगमों में इनकी 10 जातियाँ बताई गई हैं, उनके नाम निम्नानुसार हैं -

  1. पानांग 2. तूर्यांग 3. भूषणांग 4. वस्त्रांग

काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में

  1. आलयांग 7. दीपांग 8. भाजनांग 9. मालांग और 10. तेजांग। इनके नाम किंचित् शब्द से आदिपुराण में निम्नानुसार मिलते हैं - 1. मद्यांग 2. तूर्यांग 3. चित्रांग 4. सर्वांग 5. ज्योतींग 6. दीपांग 7. गृहांग 8. भोजनांग 9 पात्रांग और 10. वस्त्रांग।

ये सभी वृक्ष अपने-अपने नाम के अनुसार ही फल प्रदान करने वाले हैं। तिलोयपण्णत्ती लोकविभाग आदि ग्रन्थों में इनका स्वरूप इसप्रकार बताया गया है -

  1. पानांग - इस जाति के कल्पवृक्ष भोगभूमिया जीवों को मधुर, सुखद, छह रसों से युक्त, प्रशस्त, अतिशीतल तथा पुष्टिद और पुष्टिकारक बत्तीस प्रकार के पेय दिया करते हैं।

  2. तूर्यांग - इस जाति के कल्पवृक्ष उत्तम वीणा, पटह, मृदंग, झालर, शंख, दुन्दुभि, भेरी और काहल इत्यादि भिन्न-भिन्न प्रकार के बाजे देते हैं।

  3. भूषणांग/रत्नांग - इस जाति के कल्पवृक्ष पुरुषों के 16 प्रकार के और स्त्रियों के 14 प्रकार के कंकण, कटिसूत्र, हार, केयूर, मंजीर, कटक, कुण्डल, किरीट और मुकुट इत्यादि विविध उत्तम आभूषण प्रदान करते हैं -

  4. वस्त्रांग - इस जाति के कल्पवृक्ष नित्य चूनपट (सूती

  5. तिलोयपण्णत्ती, 4/346

  6. आदिपुराण, 3/38

  7. तिलोयपण्णत्ती, 4/347-357

  8. लोकविभाग, 5/14-23

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अर्थात् ये युगलिया जीव चक्रवर्ती के भोग-लाभ की अपेक्षा अनंत गुण भोग भोगते हैं। चक्रवर्ती तो कर्म भूमि में होते हैं, उन्हें विशेष कर्म करना पड़ता है, जब कि भोगभूमिया जीवों को सर्व सुविधाएँ कल्पवृक्ष से प्राप्त होती हैं, उन्हें मनवांछित समस्त भोग सामग्री प्राप्त होती है, फिर भी आचार्य नेमिचन्द्र लिखते हैं कि -

“सुलहेसु वि गो तित्तिं पंचक्खविएसु”

अर्थात् पंचेंद्रिय भोगों की अतिसुलभता भी उन्हें तृप्ति प्रदान नहीं करती। कहने का तात्पर्य यह है कि भोगों की बाहुल्यता इस जीव को सुखी करने में समर्थ नहीं है।

भोग सामग्री इकट्ठी करने के पहले हमें भी यह विचार करना चाहिये कि भोगों में सुख है भी या नहीं ? ‘इनमें सुख है ही नहीं’ - यदि ऐसी प्रतीति हो जाये तो भोगों की वासना मिटे बिना न रहे। वर्तमान में हम कितनी भी भोग सामग्री एकत्रित कर लें, वह भोगभूमि की तुलना में अत्यल्प ही होगी; अतः विचार करना कि भोगभूमि में इतनी अनुकूल सामग्री में भी तृप्ति नहीं हुई तो अब इस अल्प सामग्री से तृप्ति कैसे होगी ? अतः भोग सामग्री से दृष्टि हटाकर अपने स्वभाव को देखने का प्रयत्न करना चाहिये।

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3664.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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