काल चक्र (जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में)
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काल चक्र
(जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में)
प्रथम दो संस्करण
(13 जून 2013 से अद्यतन)
तृतीय संस्करण
9 जून, 2016
(मूल पंचमी के अवसर पर)
योग
लागत मूल्य
प्रति स्थल
- पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट,
ए-4, बापूनगर, जयपुर।
फोन नं - 0141-2705581 - श्री अ.भा.दि.जैन विद्वत्परिषद् ट्रस्ट
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हमारे प्रकाशन
अध्यात्म बारहखड़ी, मंगल
तीर्थयात्रा, ज्ञानामृत, चतुराहारणी,
दुर्गादेवता, अष्टानुष्ठानो परिरक्षण,
जैन जाति नहीं धर्म है, श्रावकाचार :
दिशा और दृष्टि, शुद्धोपयोग
विवेचन, प्रतिबोध, बसंत तिलका,
अष्टानुक्रमणि, समाधि-भावना और
सिद्धि, छहढाला का सार, सिद्धांतिक
एवं सिद्धान्त साधना के सूत्र, चलते-
फिरते सिद्धों से गुरु, ज्ञानानन्द
श्रावकाचार, सर्वार्थसिद्धि वन्दना,
कालचक्र, भ.महावीर जन्मभूमि का
सच, स्मारिका, क्षमावाणी, आत्मा
ही परमात्मा है तथा आग-परीक्षा।
लेखक :
डॉ. संजीव कुमार गोधा
एम. ए. द्वय (जैन विद्या तुलनात्मक धर्म दर्शन, इतिहास),
नेट, एम. फिल (जैन दर्शन), पीएच.डी.
बी-54, जनता कॉलोनी, जयपुर।
प्रकाशक :
श्री अ.भा.दि.जैन विद्वत्परिषद् ट्रस्ट
129, जादीनगर सी, स्टेशन रोड, दुर्गापुरा, जयपुर।
E-mail : [email protected]
प्रकाशन सहयोग
श्रीमती भंवरीदेवी धर्मपत्नी स्व. श्री राजमलजी जैन, लावावाले
प्राक्कथकीय
श्री अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन विद्वत्परिषद् दिगम्बर जैन समाज के शीर्षस्थ विद्वानों की पुरातन प्रतिष्ठित संस्था है, जिसकी स्थापना प्रातः स्मरणीय पूज्य गणेशप्रसादजी वर्णी द्वारा सौ शासन जयन्ती के दिन सन् 1944 में की गई थी। इस संस्था का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है।
विद्वत्परिषद् के प्रख्यात विद्वानों द्वारा देशभर में शिविरों एवं संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता रहा है। सिद्धान्तचक्रवर्ती पूज्य आचार्य श्री विद्यानन्दजी मुनिराज के ससंघ पावन सान्निध्य में 18 से 22 अप्रैल 1999 तक संस्था का स्वर्णजयन्ती समारोह एवं सप्तमसाधना वर्ष आर्यिका ज्ञानमती जी का भव्य, जिसमें शीर्षस्थ संगोष्ठियों एवं ज्ञानयज्ञों की धूम मची रही। इसमें आचार्य श्री विद्यानन्दजी, आचार्य श्री धर्मचन्द्रजी, श्रवणबेलगोला के भट्टारक स्वस्तिश्री चारूकीर्तिजी एवं वयोवृद्ध विद्वान् पण्डित नायडूसाहब शास्त्री इन्दौर के सान्निध्य में हुए प्रवचनों से प्रभावपूर्ण रही।
विद्वत्परिषद् द्वारा समय-समय पर राष्ट्रीय संगोष्ठियों का आयोजन, विधान-पूजन प्रशिक्षण शिविर, ध्यान व सामाजिक शिविर, विद्वत्सम्मान आदि महत्वपूर्ण कार्य तो किये ही जाते हैं। इनके अतिरिक्त इस संस्था द्वारा सारगर्भित-प्रकाशन के क्षेत्र में अब तक लोकोपयोगी 24 पुस्तकों का प्रकाशन किया जा चुका है।
इसी श्रृंखला में अ.भा.दि.जैन विद्वत्परिषद् के प्रख्यात मंत्री तथा लगभग 18 वर्षों से जुड़े युवा विद्वान् डॉ. संतोषकुमार गोधा द्वारा लिखित ‘कालचक्र’ नामक पुस्तक का तृतीय संस्करण प्रकाशित कर रहे हैं। गोधाजी आज देश-विदेश में ख्यातिप्राप्त प्रवचनकार विद्वान् के रूप में प्रसिद्ध हैं। सम्पूर्ण भारतवर्ष के साथ-साथ आप अनेक वर्षों से कनाडा, अमेरिका, इंग्लैण्ड आदि देशों के अनेक शहरों में भव्य तत्वाधान के साथ-साथ में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
आपके द्वारा जिनागम के प्रचार-प्रसार हेतु उल्लेखनीय योगदान दिये अ.भा.दि. जैन विद्वत्परिषद् ने अक्टूबर 2015 में आपको प्रतिष्ठा प्राप्त टोडरमल पुरस्कार प्रदान करते हुए ‘युवा विद्वत्वर’ के महान् विरुद्ध से विभूषित किया।
जैनदर्शन के परिप्रेक्ष्य में कालद्रव्य का सर्वांगीण, तर्कसंगत, शोधपरक, प्रष्टीकरण करने वाली यह ‘कालचक्र’ नामक कृति निश्चित ही पाठकों को इस विषय का सम्यक् ज्ञान करायेगी। आप सभी इसका भरपूर लाभ उठायें, इसी आशा के साथ।
- अखिल जैन ‘बंसल’
महामंत्री-श्री अ.भा.दि.जैन विद्वत्परिषद्
विषय सूची
काल की परिभाषा / स्वरूप 6
काल के भेद 9
(1) व्यवहार और निश्चय काल 9
(2) व्यवहार काल के विविध मापदण्ड 12
(3) संख्यात, असंख्यात और अनन्त काल 14
(4) भूत, वर्तमान और भविष्य काल 15
(5) उत्सर्पिणी - अवसर्पिणी काल 17
- अवसर्पिणी के प्रथम तीन काल (भोगभूमि) 23
- कल्पवृक्षों का स्वरूप 25
- अवसर्पिणी का पहला काल (सुषमा-सुषमा) 29
- अवसर्पिणी का दूसरा काल (सुषमा) 32
- अवसर्पिणी का तीसरा काल (सुषमा-दुषमा) 34
- कुलकर व्यवस्था 37
- अवसर्पिणी के अन्तिम तीन काल (कर्मभूमि) 43
- अवसर्पिणी का चतुर्थ काल (दुषमा-सुषमा) 43
- तेईस शलाका पुरुष 44
- अवसर्पिणी का पंचम काल (दुषमा) 49
- कल्की एवं प्रकलकी 50
- अवसर्पिणी का छठा काल (अतिदुषमा) 53
- कालान्त-काल (प्रलय) 55
- हाहाभूमिकर्मी काल 56
- उत्सर्पिणी के छह काल 58
- उत्सर्पिणी काल में कुलकर 59
- काल अपरिवर्तन काले क्षेत्र 61
(6) कुछ सहज जिज्ञासाएँ.. 63 - वर्तमान में कौनसा काल - उत्सर्पिणी या अवसर्पिणी? 63
- आप कुछ भी करो, हमें तो सर्वत्र विकास ही दिखता है 65
- विकास नहीं होता, कालचक्र-सा लगता है 68
- छोटे के बाद छठा या पहला काल? 70
- क्या सब कुछ बदल जाता है? 70
- कौनसा काल श्रेष्ठ? 72
(7) अभिमत (विद्वानों की दृष्टि में प्रस्तुत प्रकाशन) 75
(8) सन्दर्भ ग्रन्थ सूची 79
जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में -
काल चक्र
‘काल’ बहुत प्रचलित शब्द है। इसका प्रयोग विभिन्न अर्थों में होता है। यहाँ हम जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में काल द्रव्य की चर्चा करते हुए षट् काल रूप चक्र का विस्तृत निरूपण करेंगे। यद्यपि नैयायिक, वैशेषिक, बौद्ध, सांख्य, योग आदि भारतीय दर्शनों के अतिरिक्त पाश्चात्य दार्शनिकों ने भी किसी न किसी रूप में काल को स्वीकार किया है, किन्तु जैसा सूक्ष्म एवं विशद विवेचन जैन दार्शनिकों ने किया है, वैसा अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।
जैन दर्शनानुसार काल का क्या स्वरूप है, उसके कितने भेद-प्रभेद हैं? अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी रूप काल चक्र किस प्रकार बदलता रहता है? कौनसे क्षेत्रों में कौनसा काल वर्तता है? विभिन्न कालों में मनुष्यादि की ऊँचाई, आयु आदि की विविधता के साथ-साथ उन कालों की विशिष्ट परिस्थितियाँ, भोग भूमि, कर्म भूमि, कल्पवृक्षों का स्वरूप, कुलकर व्यवस्था, युग प्रवर्तक तीर्थंकर-चक्रवर्ती आदि शलाका पुरुष, धर्म विध्वंस की चेष्टा करने वाले कल्की एवं अर्द्धकल्की, सृष्टि प्रलय का स्वरूप, पुनः सृष्टि सृजन, हुण्डावसर्पिणी काल की विचित्रतायें आदि अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों को यहाँ रोचक ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। अन्त में विविध जिज्ञासाओं का समुचित समाधान खोजते हुये दृष्टि को स्वभाव सन्मुख करने की प्रेरणा दी है, यही उपादेय है।
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
‘काल चक्र’ दो शब्दों का समुदाय है। काल का अर्थ है ‘समय’ और चक्र का अर्थ है ‘परिवर्तन’ – इस प्रकार समय का परिवर्तन/फेर ही काल चक्र है।
हम यहाँ सर्वप्रथम काल की चर्चा कर रहे हैं, फिर चक्र/परिवर्तन की चर्चा अवसर्पिणी एवं उत्सर्पिणी काल के रूप में आगे विस्तार से करेंगे।
काल की परिभाषा / स्वरूप –
जैन दर्शनानुसार लोक षट्द्रव्यात्मक है।’ छह द्रव्यों में काल भी एक द्रव्य है, जो कि स्वतंत्र पदार्थ है। विभिन्न ग्रन्थों में काल का स्वरूप निम्नानुसार बताया है –
(1) स्पर्श, रस, गंध, वर्ण से रहित, अमूर्तलघुगुरु गुण सहित और वर्तना लक्षण से युक्त काल द्रव्य है।
(2) जीवादिभावानं परिवर्त्तनकारणो भवे कालो।’ अर्थात् जीवादि द्रव्यों के परिवर्तन का कारण काल द्रव्य है।
(3) वर्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य।’ अर्थात् वर्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्व काल के उपकार हैं।
(4) जो लोकाकाश के एक-एक प्रदेश पर रत्नों की राशि के समान भिन्न-भिन्न स्थित है, ऐसे कालाणु असंख्य द्रव्य है।
- षट्दर्शनसमुच्चय, 4/49/171/पृ.250
- ‘कालतत्त्व’ – तत्त्वार्थसूत्र, 5/39
- तिलोयपण्णत्ती, 4/281
- नियमसार, गाथा-33
- तत्त्वार्थसूत्र, 5/22
- द्रव्यसंग्रह, गाथा-22
(5) प्रत्येक द्रव्य अपने स्वभाव में सदा ही वर्तते हैं, उनका यह वर्तना किसी बाह्य सहकारी कारण के बिना नहीं हो सकता, अतः इनको वर्तानेवाला सहकारी कारणरूप वर्तना लक्षण जिसमें पाया जाता है, उसे काल कहते हैं। काल के आधार से ही समस्त द्रव्य वर्तते हैं।
(6) काल द्रव्य अनादिनिधन है, वर्तना उसका लक्षण माना गया है। यह अत्यन्त सूक्ष्म, परमाणु बराबर है तथा असंख्यात होने के कारण सम्पूर्ण लोकाकाश में भरा हुआ है। इसमें अनन्त पदार्थों के परिणमन कराने की सामर्थ्य है, अतः स्वयं असंख्यात होकर भी अनन्त पदार्थों के परिणमन में सहकारी होता है।
जिसप्रकार छह द्रव्यों में धर्मास्तिकाय जीव-पुद्गलों के गमन में तथा अधर्मास्तिकाय उनकी स्थिति में निमित्त होता है, आकाश द्रव्य सब द्रव्यों को अवगाहना देने का कार्य करता है, उसीप्रकार काल द्रव्य सभी द्रव्यों के वर्तना/परिणमन में निमित्त होता है।
लोकाकाश के असंख्यात प्रदेश हैं। प्रत्येक प्रदेश पर एक-एक कालाणु स्थित होने से काल द्रव्य भी असंख्यात है। प्रत्येक कालाणु एक दूसरे से भिन्न है, स्वतंत्र है और एक प्रदेशी है। काल द्रव्य एक प्रदेशी होने से अस्तिकाय में शामिल नहीं है। जिनागम में बहुप्रदेशी द्रव्यों को अस्तिकाय कहा है, अतः काल को छोड़कर शेष पाँच द्रव्य अस्तिकाय" कहलाते हैं।
- गोम्मटसार, जीवकाण्ड, गाथा-568
- आदिपुराण, भाग-1, 3/2-3
- ‘गतिस्थित्यवगाहो धर्म्यधर्म्याकाशकारः।’ – तत्त्वार्थसूत्र 5/17
- ‘आकाशस्यावगाहः।’ – वही, 5/18
- बृहद् द्रव्यसंग्रह, गाथा-23
काल को धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय के समान लोकव्यापी एक अखण्ड द्रव्य नहीं माना जा सकता; क्योंकि इसे अनेक द्रव्य माने बिना जगत् के विभिन्न क्षेत्रों में काल भेद संभव नहीं है। आकाश के प्रत्येक प्रदेश पर समय भेद इसे अनेक द्रव्य माने बिना नहीं बन सकता। भरत-ऐरावत क्षेत्र में दिन एवं उसी समय विदेह क्षेत्र में रात्रि रूप व्यवहार से भी काल द्रव्य की अनेकता सिद्ध होती है।
सूर्य-चन्द्रादि मनुष्य क्षेत्र में निरन्तर सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा" देते रहते हैं, इसी के कारण काल का विभाग" अर्थात् दिन-रात की व्यवस्था बनती है। मनुष्य लोक अर्थात् ढाई द्वीप के बाहर सूर्य-चन्द्रादि गमन नहीं करते; अतः बाहर दिन-रात का परिवर्तन भी नहीं होता। वहाँ सदैव एक समान परिस्थिति रहती है। यही कारण है कि आचार्य हरिभद्रसूरि काल द्रव्य का सद्भाव मनुष्य लोक में ही मानते हैं। उनका कहना है ‘मनुष्यलोकाद्बहिः कालद्रव्यं नास्ति’ अर्थात् मनुष्य लोक के बाहर काल द्रव्य नहीं है। उनके इस कथन को ज्योतिष विभागों के गमन की अपेक्षा उपचार मात्र ही समझना चाहिये।
काल को जब आकाश प्रदेशों पर रत्नाणं रासी इव" अर्थात् अर्थात् बिखरी हुई रत्नराशि के समान देखते हैं तो वह निश्चय काल अर्थात् कालाणु सम्पूर्ण लोकाकाश में मौजूद है, किन्तु जब काल को दिवस-रात्रि के कारण की दृष्टि से देखते हैं तो उस (व्यवहार काल) का सद्भाव मात्र ढाई द्वीप में कहा जा सकता है।
- ‘मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो मनुलोके।’ – तत्त्वार्थसूत्र, 4/13
- ‘तत्कृतः कालविभागः।’ – वही, 4/14
- षट्दर्शनसमुच्चय, 4/49/177/पृ. 253
- द्रव्यसंग्रह, गाथा-22
यह साध्य कथन है, वस्तुतः तो व्यवहार काल का सद्भाव भी सम्पूर्ण लोक में है।
काल के भेद –
काल एक द्रव्य होने से उत्पाद-व्यय-ध्रुवता से युक्त है। इसमें भी द्रव्य-गुण-पर्याय पाये जाती हैं। यद्यपि काल में प्रतिपल परिणमन होने से उत्पाद-व्यय होते रहते हैं, तथापि वस्तु स्वरूप (द्रव्य) की दृष्टि से वह जैसा का तैसा रहता है, उसके स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं होता, वह कभी भी कालान्तर रूप या अकालान्तर रूप हो जाता। अतीत, वर्तमान या भविष्य कोई भी अवस्था क्यों न हो – सभी में ‘काल, काल, काल’ – यह साधारण व्यवहार पाया ही जाता है। अविरल प्रवाहमान उस काल द्रव्य के विविध अपेक्षाओं से अनेक भेद मिलते हैं। जैसे – व्यवहार काल, निश्चयकाल, भूत-वर्तमान-भविष्य काल, उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल आदि।
1. व्यवहार और निश्चय काल –
काल द्रव्य के मुख्य (निश्चय) और अमुख्य (व्यवहार) – ऐसे दो भेद हैं। इनमें से मुख्य काल के आश्रय से अमुख्य काल की प्रवृत्ति होती है। जो द्रव्य के परिणमनरूप है, वह व्यवहार काल है तथा स्वयं वर्तना लक्षणयुक्त निश्चय काल है। आचार्य पूज्यपाद कहते हैं कि परमार्थकालो वर्तनालक्षणः, परिणामादि लक्षणो व्यवहारकालः" अर्थात् परमार्थ काल वर्तना लक्षण वाला
- तिलोयपण्णत्ती, 4/282
- द्रव्यसंग्रह, गाथा-21
- बृहद् द्रव्यसंग्रह, गाथा-223
8
काल को धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय के समान लोकव्यापी एक अखण्ड द्रव्य नहीं माना जा सकता; क्योंकि इसे अनेक द्रव्य माने बिना जगत् के विभिन्न क्षेत्रों में काल भेद संभव नहीं है। आकाश के प्रत्येक प्रदेश पर समय भेद इसे अनेक द्रव्य माने बिना नहीं बन सकता। भरत-ऐरावत क्षेत्र में दिन एवं उसी समय विदेह क्षेत्र में रात्रि रूप व्यवहार से भी काल द्रव्य की अनेकता सिद्ध होती है।
सूर्य-चन्द्रादि मनुष्य क्षेत्र में निरन्तर सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा12 देते रहते हैं, इसी के कारण काल का विभाग13 अर्थात् दिन-रात की व्यवस्था बनती है। मनुष्य लोक अर्थात् ढाई द्वीप के बाहर सूर्य-चन्द्रादि गमन नहीं करते; अतः बाहर दिन-रात का परिवर्तन भी नहीं होता। वहाँ सदैव एक समान परिस्थिति रहती है। यही कारण है कि आचार्य हरिभद्रसूरि काल द्रव्य का सद्भाव मनुष्य लोक में ही मानते हैं। उनका कहना है 'मनुष्यलोकाद्बहिः कालद्रव्यं नास्ति’14 अर्थात् मनुष्य लोक के बाहर काल द्रव्य नहीं है। उनके इस कथन को ज्योतिष विभागों के गमन की अपेक्षा उपचार मात्र ही समझना चाहिये।
काल को जब आकाश प्रदेशों पर रश्मणाणि रासी हुव15 अर्थात् बिखरी हुई रत्नराशि के समान देखते हैं तो वह निश्चय काल अर्थात् कालाणु सम्पूर्ण लोकाकाश में मौजूद है, किन्तु जब काल को दिवस-रात्रि के कारण की दृष्टि से देखते हैं तो उस (व्यवहार काल) का सद्भाव मात्र ढाई द्वीप में कहा जा सकता है।
- मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो भूलोके। – तत्त्वार्थसूत्र, 4/13
- संस्कृतः कालविभागः। – वही, 4/14
- षड्दर्शनसमुच्चय, 4/49 /177 /पृ. 253
- द्रव्यसंग्रह, गाथा-22
9
यह सापेक्ष कथन है, वस्तुतः तो व्यवहार काल का सद्भाव भी सम्पूर्ण लोक में है।
काल के भेद
काल एक द्रव्य होने से उत्पाद-व्यय-ध्रुवता से युक्त है। उसमें भी द्रव्य-गुण-पर्याय पायी जाती हैं। यद्यपि काल में प्रतिप्रण परिवर्तन होने से उत्पाद-व्यय होते रहते हैं, तथापि वस्तु स्वरूप (द्रव्य) की दृष्टि से वह जैसा का तैसा रहता है, उसके स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं होता, वह कभी भी कालान्तर रूप या अकालान्तर रूप हो जाता। अतीत, वर्तमान या भविष्य कोई भी अवस्था क्यों न हो – सभी में 'काल, काल, काल… यह साधारण व्यवहार पाया ही जाता है। अविरल प्रवाहमान उस काल द्रव्य के विविध अपेक्षाओं से अनेक भेद मिलते हैं। जैसे – व्यवहार काल, निश्चयकाल, भूत-वर्तमान-भविष्य काल, उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल आदि।
1. व्यवहार और निश्चय काल
काल द्रव्य के मुख्य (निश्चय) और अमुख्य (व्यवहार) – ऐसे दो भेद हैं। इनमें से मुख्य काल के आश्रय से अमुख्य काल की प्रवृत्ति होती है।16 जो दूसरे द्रव्यों के परिस्पन्दनरूप है, वह व्यवहार काल है तथा स्वयं वर्तना लक्षणयुक्त निश्चय काल है।17 आचार्य पूज्यपाद कहते हैं कि 'परमार्थकालो वर्तनालक्षणः, परिणामादि लक्षणो व्यवहारकालः’18 अर्थात् परमार्थ काल वर्तना लक्षण वाला
- तिलोयपण्णत्ती, 4/282
- द्रव्यसंग्रह, गाथा-21
- सर्वार्थसिद्धि, 5/22 /569 /पृ. 223
10
व्यंजन पर्याय के वर्तमानरूप में ठहरने जितने काल को व्यवहार काल कहते हैं।19 यह समय, आवलि, उच्छ्वास, नाड़ी आदि अनेक प्रकार का होता है, इसकी गणना सूर्यादि ज्योतिषचक्र के घूमने से होती है।20 आचार्य पूज्यपाद भी इसीप्रकार की बात कहते हैं कि – समय और आवादी आदि रूप व्यवहार काल विभाग गतिवाले ज्योतिषी देवों के कारण किया गया है।21 आचार्य अकलंकदेव ने भी व्यवहार काल का कारण ज्योतिषी देवों को ही बताया है।22
व्यवहार काल का क्षेत्र बताते हुए आचार्य नेमिचन्द्र लिखते हैं कि – 'माणुसखेत्तम्हि’23 अर्थात् यह मनुष्य क्षेत्र में ही होता है। वस्तुतः व्यवहार काल का संबंध सूर्य, चन्द्रादि विमानों के गमन से है। ये सभी विमान मनुष्य लोक (ढाई द्वीप) में ही गमन करते हैं, अतः इस अपेक्षा से व्यवहार काल भी मनुष्य क्षेत्र में ही प्रवर्तता है। ढाई द्वीप के बाहर समस्त द्वीप-समुद्रों में तथा ऊर्ध्व-अधो लोक में सर्वत्र मनुष्य लोक की अपेक्षा से ही काल की गणना होती है।
आचार्य कुन्दकुन्द पंचास्तिकाय24 में कहते हैं कि – समय, निमिष, काष्ठा, कला, घड़ी, दिन-रात, मास, ऋतु, अयन और
- गोम्मटसार जीवकाण्ड, गाथा-572
- आदिपुराण, 3/12
- सर्वार्थसिद्धि, 4/14 /469 /पृ. 185
- तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 4/14 /पृ.407
- गोम्मटसार जीवकाण्ड, गाथा-577
- पंचास्तिकाय, गाथा-25
11
वर्ष – इनमें परप्रतिपन्न अर्थात् पर की अपेक्षा होने से इन्हें व्यवहार काल कहा जाता है।
निश्चय काल का स्वरूप बताते हुए आचार्य कुन्दकुन्द लिखते हैं – काल दव्व पीच वण्ण व पंच रस से रहित, दो गन्ध व आठ स्पर्श से रहित, अगुरुलघु, अमूर्त और वर्तना लक्षणवाला है।25 आचार्य अमृतचन्द्र क्रम से होने वाली समयरूप पर्यायों को व्यवहार काल तथा उसके आधारभूत द्रव्य को निश्चय काल कहते हैं। उनका मूल कथन इसप्रकार है –
क्रमानुपाती समयाख्यः पर्यायो व्यवहारकालः, तदाधारभूतं द्रव्यं निश्चयकालः।26
इसीप्रकार का भाव वे आगे भी व्यक्त करते हैं – 'निश्चय-कालो णिययः द्रव्यरूपत्वात्, व्यवहारकालः क्षणिकः पर्याय रूपत्वादिति’27 अर्थात् निश्चयकाल द्रव्यरूप होने से नित्य है तथा व्यवहार काल पर्यायरूप होने से क्षणिक है।
उक्त सम्पूर्ण आगम प्रमाणों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्तना लक्षण युक्त कालाणु निश्चय काल द्रव्य है तथा जो दूसरे द्रव्यों के परिणमन में निमित्त हो वह व्यवहार काल है। तथा जब द्रव्यों के परिणमन में सहयोगी होने को निश्चय काल कहा जाता है, तब घड़ी-घण्टा, दिन-रात आदि को व्यवहार काल कहते हैं।
- पंचास्तिकाय, गाथा-24
- वही, गाथा-100 की टीका
- वही, गाथा-101 की टीका
2. व्यवहार काल के विविध मापदण्ड
व्यवहार काल को प्रदर्शित करने के लिये जैनाचार्यों ने अनेक माप दण्ड निर्धारित किये हैं। गोम्मटसार जीवकाण्ड२८ एवं लोकविभाग२९ में दिये गये विविध घटकों को निम्नानुसार देखा जा सकता है –
काल का अविभागी अंश = 1 समय
असंख्यात समय = 1 आवली
संख्यात आवली = 1 उच्छ्वास
7 उच्छ्वास = 1 स्तोक
7 स्तोक = 1 लव
38.5 लव (24 मिनिट) = 1 नाली (घड़ी/घटी)
2 नाली = 1 मुहूर्त
1 मुहूर्त में 1 समय कम = भिन्नमुहूर्त/अंतर्मुहूर्त
30 मुहूर्त (24 घण्टा) = 1 दिनरात
15 दिन = 1 पक्ष
2 पक्ष = 1 मास
2 मास = 1 ऋतु
3 ऋतु = 1 अयन (छः मास)
2 अयन = 1 वर्ष
व्यवहार काल सूचक इसीप्रकार के विविध घटकों की चर्चा किंचित् शब्द भेद करते हुये आचार्य यतिवृषभस्वामी३० ने तथा
असंख्य समय = 1 निमिष
8 निमिष = 1 काष्ठा
16 काष्ठा = 1 कला
32 कला = 1 घड़ी
60 घड़ी = 1 अहोरात्र
30 अहोरात्र = 1 मास
2 मास = 1 ऋतु
3 ऋतु = 1 अयन (छः मास)
2 अयन = 1 वर्ष
काल का सबसे छोटा अविभागी अंश समय के नाम से जाना जाता है, इसका परिमाण बताते हुये कहा है कि पुद्गल के परमाणु को आकाश के एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश पर गमन में जो अविभागी काल लगता है, वह समय है।३१ लोक विभाग में एक परमाणु द्वारा दूसरे परमाणु को लांघने में लगे काल को समय कहा है।३२ जैनाचार्यों ने 150 अंक प्रमाण वर्षों के काल को उत्कृष्ट संख्यात काल कहा है और इसे अचलात्मा३३ संज्ञा से संबोधित किया है। वर्ष से लेकर अचलात्म तक के कालांशों की चर्चा को आचार्य यतिवृषभ ने तिलोयपण्णत्ती३४ में विस्तार से बताया है।
- गोम्मटसार जीवकाण्ड, गाथा 573 से 576
- लोकविभाग, 6/201-204
- तिलोयपण्णत्ती, 4/289-292
- नियमसार, गाथा-31 टीका
- तिलोयपण्णत्ती, 4/288
- लोकविभाग, 6/201
- तिलोयपण्णत्ती, 4/312
- वही, 4/294 से 312 का सार
3. संख्यात, असंख्यात और अनन्त काल
जैन आगम३७ में दो को जघन्य संख्यात तथा अचलात्म को उत्कृष्ट संख्यात कहा है। इन दोनों के बीच की संख्याओं को मध्यम संख्यात कहा गया है। उत्कृष्ट संख्यात काल को 150 अंक प्रमाण उक्त माप निकालने के लिये बुद्धि कल्पित एक लाख योजन विस्तारवाले और एक हजार योजन गहरे – शलाका, प्रतिशलाका, महाशलाका तथा अनवस्था नामक चार कुण्ड स्थापित कर उनमें सरसों के दानों को आधार बनाकर विस्तार से समझाया है। यह 150 अंक प्रमाण उत्कृष्ट संख्यात चौदह पूर्व के ज्ञाता श्रुतकेवली के ज्ञान का विषय है।
उत्कृष्ट संख्यात में एक जोड़ देने पर जघन्य असंख्यात हो जाता है। यहाँ असंख्यात के भी नौ भेद बताये गये हैं। जघन्य परित्तासंख्यात, मध्यम परित्तासंख्यात, उत्कृष्ट परित्तासंख्यात, जघन्य युक्तासंख्यात, मध्यम युक्तासंख्यात, उत्कृष्ट युक्तासंख्यात, जघन्य असंख्यातासंख्यात, मध्यम असंख्यातासंख्यात और उत्कृष्ट असंख्यातासंख्यात। यह उत्कृष्ट असंख्यात अवधि ज्ञान का विषय है।३८
उत्कृष्ट असंख्यातासंख्यात में एक जोड़ देने पर जघन्य अनन्त होता है। इसके भी नौ भेद बताये गये हैं। जघन्य परित्तानन्त, मध्यम परित्तानन्त, उत्कृष्ट परित्तानन्त, जघन्य युक्तानन्त,
मध्यम युक्तानन्त, उत्कृष्ट युक्तानन्त, जघन्य अनन्तानन्त, मध्यम अनन्तानन्त और उत्कृष्ट अनन्तानन्त। यह अनन्त केवलज्ञान का विषय है।३९ छद्मस्थ के ज्ञान का विषय नहीं है।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मतिज्ञान, श्रुतज्ञान के माध्यम से इन्हीं तक की गणना को जाना जा सके, वह संख्यात है। इससे अधिक वर्षों तक की गणना अवधिज्ञान-मनःपर्यय ज्ञान का विषय बने, वह असंख्यात है। इससे अधिक जिसे सिर्फ केवलज्ञान के माध्यम से जाना जा सके, वह अनन्त है।
इसप्रकार आत्मा के ज्ञान नामक एक गुण की एक समय की पर्याय में अपरिमित अनन्त काल को जानने की सामर्थ्य है। इससे ज्ञान गुण की सामर्थ्य एवं ज्ञान जैसे अनन्त गुण जिस आत्मा में हैं – ऐसे आत्मा की सामर्थ्य का अनुमान लगाया जा सकता है। अनन्त सामर्थ्यवान होकर भी यह जीव अपनी प्रभुता को न पहचानने के कारण ही अनंत दुख भोग रहा है।
4. भूत, वर्तमान और भविष्य काल
व्यवहार काल के भूत, वर्तमान, और भविष्य के रूप में तीन भेद भी किये गये हैं। आचार्य पूज्यपाद कहते हैं – स त्रिधा व्यवतिष्ठते-भूतो वर्तमानो भविष्यति। परमार्थात्काले कालव्यपदेशो मुख्यः, मुक्तादिपदेशो गौणः। व्यवहारकाले भूतादिव्यपदेशो मुख्यः, कालव्यपदेशो गौणः।४० अर्थात् वह
- तिलोयपण्णत्ती, 4/313 व टीका का सार
- तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/38, पृष्ठ-206
- तिलोयपण्णत्ती, 4/314 व टीका से
- तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/38, पृष्ठ-206/प. 30
- सर्वार्थसिद्धि, 5/22/569/पृ. 223
3. संख्यात, असंख्यात और अनंत काल -
जैन आगमों में दो को जघन्य संख्यात तथा अचलात्म को उत्कृष्ट संख्यात कहा है। इन दोनों के बीच की संख्याओं को मध्यम संख्यात कहा गया है। उत्कृष्ट संख्यात काल का 150 अंक प्रमाण उक्त माप निकालने के लिये बुद्धि कल्पित एक लाख योजन विस्तारवाले और एक हजार योजन गहरे - शलाका, प्रतिशलाका, महाशलाका तथा अनवस्था नामक चार कुण्ड स्थापित कर उनमें सरसों के दानों को आधार बनाकर विस्तार से समझाया है। यह 150 अंक प्रमाण उत्कृष्ट संख्यात चौदह पूर्व के ज्ञाता श्रुतकेवली के ज्ञान का विषय है।
उत्कृष्ट संख्यात में एक जोड़ देने पर जघन्य असंख्यात हो जाता है। यहीं असंख्यात के भी नौ भेद बताये गये हैं। जघन्य परित्तासंख्यात, मध्यम परित्तासंख्यात, उत्कृष्ट परित्तासंख्यात, जघन्य युक्तासंख्यात, मध्यम युक्तासंख्यात, उत्कृष्ट युक्तासंख्यात, जघन्य असंख्यातासंख्यात, मध्यम असंख्यातासंख्यात और उत्कृष्ट असंख्यातासंख्यात। यह उत्कृष्ट असंख्यात अवधि ज्ञान का विषय है।
उत्कृष्ट असंख्यातासंख्यात में एक जोड़ देने पर जघन्य अनंत होता है। इसके भी नौ भेद बताये गये हैं। जघन्य परित्तानंत, मध्यम परित्तानंत, उत्कृष्ट परित्तानंत, जघन्य युक्तानंत,
- तिलोयपण्णत्ती, 4/313 व टीका का सार
- तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/38, पृष्ठ-206
- (1) तिलोयपण्णत्ती, 4/314 एवं टीका से
(2) तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/38 /पृ. 206/पृ. 30
मध्यम युक्तानंत, उत्कृष्ट युक्तानंत, जघन्य अनंतानंत, मध्यम अनंतानंत और उत्कृष्ट अनंतानंत। यह अनंत केवलज्ञान का विषय है। छद्मस्थ के ज्ञान का विषय नहीं है।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मतिज्ञान, श्रुतज्ञान के माध्यम से जहाँ तक की गणना का जाना जा सके, वह संख्यात है। इससे अधिक जहाँ तक की गणना अवधिज्ञान-मनःपर्यय ज्ञान का विषय बने, वह असंख्यात है। इससे अधिक जिसे सिर्फ़ केवलज्ञान के माध्यम से जाना जा सके, वह अनंत है।
इसप्रकार आत्मा के ज्ञान नामक एक गुण की एक समय की पर्याय में अपरिमित अनंत काल को जानने की सामर्थ्य है। इससे ज्ञान गुण की सामर्थ्य एवं ज्ञान जैसे अनंत गुण जिस आत्मा में हैं - ऐसे आत्मा की सामर्थ्य का अनुमान लगाया जा सकता है। अनंत सामर्थ्यवान होकर भी यह जीव अपनी प्रभुता को न पहिचानने के कारण ही अनंत दुःख भोग रहा है।
4. भूत, वर्तमान और भविष्य काल -
व्यवहार काल के भूत, वर्तमान, और भविष्य के रूप में तीन भेद भी किये गये हैं। आचार्य पूज्यपाद कहते हैं - स त्रिधा व्यवतिष्ठते-भूतो वर्तमानो भविष्यति। तत्र परमार्थकाले काव्यपदेशो मुख्यः, मृतादिपदेशो गौणः। व्यवहारकाले भूतादिपदेशो मुख्यः, कालव्यपदेशो गौणः। अर्थात् वह
- (1) तिलोयपण्णत्ती, 4/315 एवं टीका से
(2) तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/38 /पृ. 206/पृ. 31 - सर्वार्थसिद्धि, 5/22/569/पृ. 223
काल - भूत, वर्तमान और भविष्य के भेद से तीन प्रकार का कहा गया है। निश्चय काल का कथन करने पर काल संज्ञा मुख्य तथा भूतकाल आदि का उपदेश (कथन) गौण रहता है तथा व्यवहार काल का कथन करने पर भूतकाल आदिप संज्ञा मुख्य है और काल संज्ञा गौण है। आचार्य अमृतचन्द्र ने भी अतीतानागतवर्तमान भेदात् त्रिधा वा कहकर व्यवहार काल को तीन भेद वाला बताया है। आदिपुराण में कहा है कि संसार का व्यवहार चलाने में समर्थ होने से भूत, भविष्यत और वर्तमान रूप से व्यवहार काल की कल्पना की है।
इन तीनों कालों की परिभाषा बताते हुये आचार्य नेमिचन्द्र कहते हैं कि सिद्ध राशि को संख्यात आवली के प्रमाण से गुणा करने पर जो प्रमाण हो, उतना ही अतीत/भूतकाल का प्रमाण है। वस्तुतः हर छह महीना आठ समय में छह सौ आठ जीव मुक्ति/सिद्धदशा प्राप्त करते हैं। अतः सिद्ध राशि को छह महीना आठ समय से गुणा करके 608 का भाग देने पर अतीत काल का प्रमाण संख्यात आवलि गुणित सिद्धराशि प्राप्त होता है।
वर्तमान काल का प्रमाण एक समय मात्र है। तथा सम्पूर्ण जीव राशि व समस्त पुद्गलद्रव्य राशि से भी अननुगुणा भविष्यत काल का प्रमाण है। यह व्यवहार काल वर्तमान की अपेक्षा उत्तरोत्तरक्षी और भूत-भविष्य की अपेक्षा दीर्घातरस्थायी अर्थात् लम्बे समय तक रहने वाला है।
- नियमसार, गाथा-31 टीका
- आदिपुराण, 3/11
- गोम्मटसार जीवकाण्ड, गाथा - 578-580
5. उत्सर्पिणी - अवसर्पिणी काल -
जैन परम्परा के अनुसार कालचक्र उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के रूप में क्रमशः निरन्तर परिवर्तन किया करता है। उत्सर्पिणी काल उत्थान का काल है, इस काल में विकास देखा जाता है तथा अवसर्पिणी काल ह्रास का काल है, इसमें निरन्तर गिरावट /कमी देखी जाती है। इन दोनों का स्वरूप स्पष्ट करनेवाले कतिपय शास्त्रीय उद्धरण निम्नानुसार है, किंचित शब्द भेद से लगभग सभी में एकसी बात कही गई है -
(1) नर-तिरियांण आयु, उच्छेह-विहुद्धि सव्वं। अवसप्पिणि हादि, उसप्पिणिआसु वड्ढदि।।
अवसर्पिणी काल में मनुष्य एवं तिर्यंचों की आयु, शरीर की ऊँचाई व वृद्धि आदि सब ही घटते रहते हैं तथा उत्सर्पिणी काल में बढ़ते रहते हैं।
(2) भरते ऐरावते च मनुष्याणां वृद्धाहासाविति…अनुवायुः प्रमाणादिकृति।
जिसमें भरत और ऐरावत क्षेत्र में मनुष्यों के अनुयु, आयु, प्रमाण आदि की वृद्धि होती है, वह उत्सर्पिणी काल है और जिसमें इनका ह्रास होता है, वह अवसर्पिणी काल है।
(3) अनुवृद्धिमिरवसर्पशीला अवसर्पिणी। तद्विपरीतोत्सर्पिणी।
जिसमें अनुवृद्ध, आयु, शरीरादि की उत्तरोत्तर उन्नति हो, वह
- तिलोयपण्णत्ती, 4/318
- सर्वार्थसिद्धि, 3/27/418/पृ. 166
- तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/27/4-5/पृ. 191
उत्सर्पिणी और जिसमें अवनति हो, वह अवसर्पिणी है।
(4) उत्सर्पिण्यवसर्पिणी द्वौ भेदो तयो कीर्तिता।
उत्सर्पिणवसर्पिणौ बलाढ्यदुर्बलगम् ।।
जिसमें मनुष्यों के बल, आयु और शरीर का प्रमाण क्रम-क्रम से बढ़ता जाये, उसे उत्सर्पिणी कहते हैं और जिसमें वे क्रम-क्रम से घटते जाये, उसे अवसर्पिणी कहते हैं।
(5) जब बाहुबल, वैभव, मनुष्य शरीर, धर्म, ज्ञान, गाम्भीर्य और धैर्य बढ़ते हैं तो उत्सर्पिणी काल होता है, और जब ये घटते हैं, तब अवसर्पिणी काल होता है।
(6) पंच भरत एवं पंच ऐरावत क्षेत्रों में स्थित जीवों के शरीर की ऊँचाई, आयु और बल की क्रमशः अवसर्पिणी में हानि और उत्सर्पिणी काल में वृद्धि होती है।
अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी कालों का प्रमाण –
दोनों ही काल छह-छह प्रकार के हैं। अवसर्पिणी काल – सुषमासुषमा, सुषमा, सुषमादुषमा, दुषमासुषमा, दुषमा और अतिदुषमा (दुषमादुषमा) के भेद से छह प्रकार का है तथा उत्सर्पिणी काल अतिदुषमा से प्रारंभ करके क्रमशः बढ़ता हुआ सुषमासुषमा तक जाता है। दोनों ही कालों का प्रमाण दस-दस कोड़ाकोड़ी सागरोपम है। दोनों को मिलाकर एक कल्पकाल
- आदिपुराण, 3/14
- आचार्य पुष्पदन्त : महापुराण, भाग-1, संधि-2/8/पृ.31
- त्रिलोकसार, गाथा 779
होता है। कोड़ाकोड़ी का अर्थ करोड़ गुणा करोड़ होता है। वर्तमान में कुछ विचारक गणनाओं में साम्राज्य बैलोन के लिये कोड़ी शब्द का अर्थ 20 अथवा 10 भी बताने लगे हैं। लौकिक में पतंग आदि कुछ वस्तुयें कोड़ी की गणनानुसार बिकती है, परन्तु अलौकिक गणनाओं में यह अर्थ उचित प्रतीत नहीं होता।
सागरोपम –
यह काल का एक नाप है, जिसका अर्थ मानव को द्वारा समस्त संख्याओं से अधिक काल वाले काल खण्ड का उपमा द्वारा प्रदर्शित परिमाण होता है। दस कोड़ाकोड़ी पल्योपम का एक सागरोपम होता है। पल्योपम की चर्चा त्रिलोकपण्णत्ती, सर्वार्थसिद्धि, राजवार्तिक, त्रिलोकसार, कार्तिकेयानुप्रेक्षा आदि अनेक आगम ग्रन्थों में विस्तार से की गई है। यहाँ इसका स्वरूप स्पष्ट करते हुये कहा है कि – एक प्रमाण योजन विस्तार वाले और इतने ही गहरे गड्ढे को उत्तम भोगभूमि में एक दिन से लेकर सात दिन तक के उत्पन्न हुये मेढ़े के करोड़ों रोमों के अविभागी खण्डों से भरकर सौ-सौ वर्षों में एक-एक बाल निकाले। जब वह गड्ढा पूरा खाली हो जाये तब एक व्यवहार पल्य (पल्योपम) होता है। असंख्य व्यवहार पल्य का एक उद्धारपल्य तथा असंख्य
- (1) त्रिलोकपण्णत्ती, 4/319 व 320 (पूर्वार्ध)
(2) तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/27/पृ. 388
(3) आदिपुराण, 3/15/पृ. 47 - त्रिलोकपण्णत्ती, 1/130
- त्रिलोकपण्णत्ती, 1/119-130 का सार
- सर्वार्थसिद्धि, 3/38/439/पृ.174 का सार
- तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/38/7/पृ. 208 का सार
- त्रिलोकसार, गाथा-102
- कार्तिकेयानुप्रेक्षा, लोकानुप्रेक्षा, भावार्थ पृ.-56-57
उदाहरणरूप एक अद्धापल्य होता है। दस कोड़ाकोड़ी अद्धापल्योपम का एक सागरोपम होता है। ऐसे बीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम का एक कल्पकाल कहा गया है।
अवसर्पिणी व उत्सर्पिणी के विभाग –
त्रिलोकपण्णत्ती, राजवार्तिक, त्रिलोकसार एवं लोकविभाग में अवसर्पिणी व उत्सर्पिणी के दस-दस कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण काल को उनके छह भेदों में विभाजित किया है। अवसर्पिणी के छह विभाग / काल निम्नानुसार है –
(1) सुषमासुषमा – 4 कोड़ाकोड़ी सागर
(2) सुषमा – 3 कोड़ाकोड़ी सागर
(3) सुषमादुषमा – 2 कोड़ाकोड़ी सागर
(4) दुषमासुषमा – 1 कोड़ाकोड़ी सागर में 42,000 वर्ष कम
(5) दुषमा – 21,000 वर्ष
(6) अतिदुषमा – 21,000 वर्ष
उत्सर्पिणी के छह विभाग इसके विपरीत क्रम में है, जो कि निम्नानुसार है –
(1) अतिदुषमा – 21,000 वर्ष
- त्रिलोकपण्णत्ती, 4/320-323
- सर्वार्थसिद्धि, 3/27/418/पृ. 166-167
- तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/27/पृ. 388
- त्रिलोकसार, 781
- लोकविभाग, 5/5-7
- त्रिलोकपण्णत्ती, 4/15-76
(2) दुषमा – 21,000 वर्ष
(3) दुषमासुषमा – 1 कोड़ाकोड़ी सागर में 42,000 वर्ष कम
(4) सुषमादुषमा – 2 कोड़ाकोड़ी सागर
(5) सुषमा – 3 कोड़ाकोड़ी सागर
(6) सुषमासुषमा – 4 कोड़ाकोड़ी सागर
उक्त नामों में काल अथवा समय सूचक ‘समा’ शब्द में ‘सु’ एवं ‘दुर’ उपसर्गों का प्रयोग उनके शुभ और अशुभ का सूचक है। इन उपसर्गों से छहों कालों के नाम की सार्थकता बताते हुये आचार्य जिनसेन लिखते है –
समा कालविभागः स्यात् सुदुसार्द्धयोः।
सुषमा दुषमेत्येवतोऽर्द्धमेवतोः ।।
समा काल के विभाग को कहते हैं तथा ‘सु’ और ‘दुर’ उपसर्ग क्रम से अच्छे और बुरे अर्थ में आते हैं। ‘सु’ और ‘दुर’ उपसर्गों को पृथक्-पृथक् समा के साथ जोड़ देने तथा व्याकरण के नियमानुसार ‘स’ को ‘ष’ कर देने से सुषमा और दुषमा शब्दों की सिद्धि होती है, जिनका अर्थ क्रम से अच्छा काल और बुरा काल होता है। इस तरह उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल के छहों भेद सार्थक नाम वाले हैं।
ये उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी नामक दोनों ही भेद कालचक्र के परिक्षण में अपने छहों कालों के साथ-साथ कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की तरह घूमते रहते हैं अर्थात् जिस तरह कृष्ण पक्ष
- आदिपुराण, 3/19
- वही, 3/21
20
उदाहरणपल का एक अद्धापल्य होता है। दस कोड़ाकोड़ी अद्धापल्य का एक सागरोपम होता है। ऐसे बीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम का एक कल्पकाल कहा गया है।
अवसर्पिणी व उत्सर्पिणी के विभाग - तिलोयपण्णत्ती, सर्वार्थसिद्धि, राजवार्तिक, तिलोयसार एवं लोकविभाग में अवसर्पिणी व उत्सर्पिणी के दस-दस कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण काल को उनके छह भेदों में विभाजित किया है। अवसर्पिणी के छह विभाग / काल निम्नानुसार है -
(1) सुषमासुषमा - 4 कोड़ाकोड़ी सागर
(2) सुषमा - 3 कोड़ाकोड़ी सागर
(3) सुषमादुषमा - 2 कोड़ाकोड़ी सागर
(4) दुषमासुषमा - 1 कोड़ाकोड़ी सागर में 42,000 वर्ष कम
(5) दुषमा - 21,000 वर्ष
(6) अतिदुषमा - 21,000 वर्ष
उत्सर्पिणी के छह विभाग इसके विपरीत क्रम में है, जो कि निम्नानुसार है -
(1) अतिदुषमा - 21,000 वर्ष
- तिलोयपण्णत्ती, 4/320-323
- सर्वार्थसिद्धि, 3/27 /418 /पृ. 166-167
- तत्त्वार्थ राजवार्तिक, 3/27 /पृ. 388
- तिलोयसार, 781
- लोकविभाग, 5/5-7
- तिलोयपण्णत्ती, 4/1576-77
21
(2) दुषमा - 21,000 वर्ष
(3) दुषमासुषमा - 1 कोड़ाकोड़ी सागर में 42,000 वर्ष कम
(4) सुषमादुषमा - 2 कोड़ाकोड़ी सागर
(5) सुषमा - 3 कोड़ाकोड़ी सागर
(6) सुषमासुषमा - 4 कोड़ाकोड़ी सागर
उक्त नामों में काल अथवा समय सूचक ‘समा’ शब्द में ‘सु’ एवं ‘दुर’ उपसर्गों का प्रयोग उनके शुभ और अशुभ का सूचक है। इन उपसर्गों से छहों कालों के नाम की सार्थकता बताते हुये आचार्य जिनसेन लिखते है -
समा कालविभागः स्यात् सुदुषावसर्गयोः।
सुषमा दुषमेत्येवन्तोऽर्थवत्तयोः ।।
समा काल के विभाग को कहते हैं। तथा ‘सु’ और ‘दुर’ उपसर्ग क्रम से अच्छे और बुरे अर्थ में आते हैं। ‘सु’ और ‘दुर’ उपसर्गों को पृथक्-पृथक् समा के साथ जोड़ देने तथा व्याकरण के नियमानुसार ‘स’ को ‘ष’ कर देने से सुषमा और दुषमा शब्दों की सिद्धि होती है, जिनका अर्थ क्रम से अच्छा काल और बुरा काल होता है। इस तरह उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल के छहों भेद सार्थक नाम वाले हैं।
ये उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी नामक दोनों ही भेद कालचक्र के परिक्षण में अपने छहों कालों के साथ-साथ कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की तरह घूमते रहते हैं अर्थात् जिस तरह कृष्ण पक्ष
- आदिपुराण, 3/19 65. वही, 3/21
22
के बाद शुक्ल पक्ष और शुक्ल पक्ष के बाद कृष्ण पक्ष आता है, उसीतरह अवसर्पिणी काल के बाद उत्सर्पिणी और उत्सर्पिणी के बाद अवसर्पिणी काल आता है। कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष के समान कालचक्र परिवर्तन की बात रविषेणाचार्य ने पद्म पुराण में भी की है। तिलोयपण्णत्ती में भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों में रँहट-घटिका न्याय की तरह अनन्तानन्त उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी होने का उल्लेख है। ये क्रम सदा चलता ही रहता है।
इस कल्पचक्र के क्रम को चित्र द्वारा निम्नानुसार देखा जा सकता है -
चित्र: एक चक्र जिसमें अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी के छह-छह काल दर्शाए गए हैं। अवसर्पिणी में पहला काल सुषमासुषमा (4 कोड़ाकोड़ी सागर), दूसरा सुषमा (3 कोड़ाकोड़ी सागर), तीसरा सुषमादुषमा (2 कोड़ाकोड़ी सागर), चौथा दुषमासुषमा (1 कोड़ाकोड़ी सागर में 42,000 वर्ष कम), पाँचवाँ दुषमा (21,000 वर्ष) और छठा अतिदुषमा (21,000 वर्ष) हैं। उत्सर्पिणी में ये काल विपरीत क्रम में हैं।
- पद्मपुराण, प्रथम भाग, 3/73
- रँहट घटिका न्याय - जैसे रँहट की घड़ियाँ चक्रवत् घूमती हुई बार-बार ऊपर एवं नीचे आती-जाती हैं, उसीप्रकार अवसर्पिणी के बाद उत्सर्पिणी और उत्सर्पिणी के बाद अवसर्पिणी - इन कालों का परिवर्तन होता ही रहता है।
- तिलोयपण्णत्ती, 4/1636
23
अवसर्पिणी के प्रथम तीन काल (भोगभूमि)
भारत एवं ऐरावत क्षेत्रों में अवसर्पिणी के प्रथम तीन कालों में भोग भूमि रहती है। इन कालों में भोगों की प्रधानता होती है, इसीलिए यहाँ के काल भोगभूमि कहलाते हैं। यहाँ सभी बाह्य सामग्री विविध प्रकार के कल्पवृक्षों से प्राप्त होती है। यहाँ सभी युगलिया जन्म लेते हैं, और वे जीवन पर्यंत पति-पत्नी के समान रहते हैं। इन मनुष्यों की आयु नौ मास शेष रहने पर ही स्त्री के गर्भ धारण होता है, शेष काल में किसी के भी गर्भ नहीं रहता, फिर नौ मास पूर्ण होने पर युगल (नर-नारी) भूशय्या पर सोकर गर्भ से युगल (पुत्र-पुत्री) के निकलने पर तत्काल ही मरण को प्राप्त हो जाते हैं। अंतिम समय में पुरुष को छींक और स्त्री को जँभाई आने से मृत्यु होती है अथवा आदिपुराण एवं तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक के अनुसार आयु के अन्त में पुरुष को जँभाई और स्त्री को छींक आने से मृत्यु होती है।
भोगभूमि में नर-नारी के शरीरों शरीर शरद ऋतु के मेघों के समान स्वयं ही आमूल विलीन हो जाते हैं। तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिक के अनुसार उनके शरीर विशुद्ध के समान विघट जाते हैं। यहाँ उत्पन्न हुये जीवों का कदलीघात मरण अथवा आयु का अपवर्तन
- युगलिया = बालक-बालिका युगल रूप में
- तिलोयपण्णत्ती, 4/379-380
- वही 4/381
- आदिपुराण, 3/42
- तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिक, भाग-5, 3/31 /पृ. 351 /पं.4
- तिलोयपण्णत्ती, 4/381
- तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिक, भाग-5, 3/31 /पृ. 351 /पं.5
नहीं होता।‘’ इनका शरीर सान्त धातुमय होते हुए भी छेदा-भेदा नहीं जा सकता। अशुचिता से रहित होने के कारण उनके शरीर से मूत्र तथा विष्ठा का आस्रव नहीं होता। आदिपुराण के अनुसार उन लोगों को पसीना भी नहीं आता। यही शरीर में रोग भी नहीं होते, कोई किसी का शत्रु नहीं होता, सिंह और हाथी भी साथ रहते हैं, लोगों का लावण्य रंग और विलास से परिपूर्ण वय और यौवन भी नष्ट नहीं होते।
देखो ! पुण्योदय का यह ठाठ देखकर हमारा मन ललचाता है, किन्तु भाई ! हमने भी आत्मज्ञान के अभाव में इस पंच परावर्तन रूप संसार में परिश्रम करते हुए भोगभूमि में अनन्त बार जन्म लिया है। उत्तम, मध्यम और जघन्य सभी भोगभूमियों में हम अनन्त बार जन्म-मरण कर चुके हैं।
अनेक बार भावलिंगी मुनिराजों को आहार दान देने के बाद भोगभूमि में जन्म लेकर भी यह जीव स्वयं सम्यक्त्व से शून्य रहा। वहाँ अनंत बार तीन पल्य की आयु तक बाह्य अनुकूलतामय जीवन भी पारमार्थिक सुख के बिना दुख से ही बीता।
भोगभूमियों के सभी जीव स्वभाव से ही कोमल परिणामी होते हैं, इसलिये मरकर स्वर्ग में ही जाते हैं, इनकी स्वर्ग के सिवाय और कोई गति नहीं होती। यहाँ के मिथ्यादृष्टि
- (1) तिलोयपण्णत्ती, 4/361 (2) तत्त्वार्थसूत्र, 2/53
- (3) सर्वार्थसिद्धि, 2/53/365/पृ. 148
- तिलोयपण्णत्ती, 4/387
- आदिपुराण, 3/31
- आचार्य पूज्यपाद कृत महापुराण, भाग-1, सन्धि-2/8, पृष्ठ-31
- आदिपुराण, 3/43
मनुष्य-तिर्यंच मरकर भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी देवों में तथा सम्यग्दृष्टि मनुष्य-तिर्यंच मरकर सौधर्म युगल में उत्पन्न होते हैं। इससे ऊपर नहीं जाते।
इन कालखण्डों में जन्म लेने वाले मनुष्यादि प्राणियों का जीवन भोग प्रधान रहता है। इस समय प्रकृति इतनी सम्पन्न होती है कि उसके निवासियों को जीवन यापन के लिए किसी भी प्रकार के कृषि, मसि, व्यापार, उद्योग, शिल्प अथवा असि आदि कर्म की आवश्यकता नहीं होती। प्रकृति से सहज रूप से प्राप्त भोग्य सामग्री का उपभोग करना ही उनका कार्य रहता है। सभी सामग्री उनको संकल्प मात्र से कल्पवृक्षों द्वारा प्राप्त हो जाती है।
कल्पवृक्षों का स्वरूप -
भोगभूमि में उत्पन्न हुए जीवों को मनवांछित पदार्थ कल्पवृक्ष से प्राप्त हो जाते हैं। पुण्यात्मा पुरुषों को मनचाहे भोग देने में समर्थ होने से ही ज्ञानियों ने इनको कल्पवृक्ष संज्ञा सार्थक कही है। इन भोगभूमियों में जन्मे युगल कल्पवृक्षों द्वारा दी गई वस्तुओं को ग्रहण करके और विक्रिया द्वारा बहुत प्रकार के शरीर बना कर अनेक भोग भोगते हैं। इनके भोगों की बाहुल्यता बताते हुये आचार्य यतिवृषभदेव लिखते हैं -
‘जुगलाणि अणंतगुणं, भोगं चक्कहर भोग लाहादो।’
- तिलोयपण्णत्ती, 4/382
- आदिपुराण, 3/38
- तिलोयपण्णत्ती, 4/362
- वही, 4/361 (पूर्वार्द्ध)
अर्थात् ये युगलिया जीव चक्रवर्ती के भोग-लाभ की अपेक्षा अनंत गुण भोग भोगते हैं। चक्रवर्ती तो कर्म भूमि में होते हैं, उन्हें विशेष कर्म करना पड़ता है, जब कि भोगभूमिया जीवों को सर्व सुविधाएँ कल्पवृक्षों से प्राप्त होती हैं, उन्हें मनवांछित समस्त भोग सामग्री प्राप्त होती है, फिर भी आचार्य नेमिचन्द्र लिखते हैं कि -
‘सुलहेसु वि गो तित्तिं पंचक्खविएसु’
अर्थात् पंचेंद्रिय भोगों की अतिसुलभता भी उन्हें तृप्ति प्रदान नहीं करती। कहने का तात्पर्य यह है कि भोगों की बाहुल्यता इस जीव को सुखी करने में समर्थ नहीं है।
भोग सामग्री इकट्ठी करने के पहले हमें भी यह विचार करना चाहिये कि भोगों में सुख है भी या नहीं ? ‘इनमें सुख है ही नहीं’ - यदि ऐसी प्रतीति हो जाये तो भोगों की वासना मिटे बिना न रहे। वर्तमान में हम कितनी भी भोग सामग्री एकत्रित कर लें, वह भोगभूमि की तुलना में अत्यल्प ही होगी; अतः विचार करना कि भोगभूमि में इतनी अनुकूल सामग्री में भी तृप्ति नहीं हुई तो अब इस अल्प सामग्री से तृप्ति कैसे होगी ? अतः भोग सामग्री से दृष्टि हटाकर अपने स्वभाव को देखने का प्रयत्न करना चाहिये।
जीवन पर्यंत भोगी वाले वे समस्त भोग सामग्री उनको दस प्रकार के कल्पवृक्षों से प्राप्त होती है। जैन आगमों में इनकी 10 जातियाँ बताई गई हैं, उनके नाम निम्नानुसार हैं -
-
पानांग 2. तूर्यांग 3. भूषणांग 4. वस्त्रांग
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आलयांग 7. दीपांग 8. भाजनांग 9. मालांग और 10. तेजांग। इनके नाम किंचित् शब्द से आदिपुराण में निम्नानुसार मिलते हैं - 1. मद्यांग 2. तूर्यांग 3. चित्रांग 4. सर्वांग 5. ज्योतींग 6. दीपांग 7. गृहांग 8. भोजनांग 9 पात्रांग और 10. वस्त्रांग।
ये सभी वृक्ष अपने-अपने नाम के अनुसार ही फल प्रदान करने वाले हैं। तिलोयपण्णत्ती लोकविभाग आदि ग्रन्थों में इनका स्वरूप इसप्रकार बताया गया है -
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पानांग - इस जाति के कल्पवृक्ष भोगभूमिया जीवों को मधुर, सुखद, छह रसों से युक्त, प्रशस्त, अतिशीतल तथा पुष्टिद और पुष्टिकारक बत्तीस प्रकार के पेय दिया करते हैं।
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तूर्यांग - इस जाति के कल्पवृक्ष उत्तम वीणा, पटह, मृदंग, झालर, शंख, दुन्दुभि, भेरी और काहल इत्यादि भिन्न-भिन्न प्रकार के बाजे देते हैं।
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भूषणांग/रत्नांग - इस जाति के कल्पवृक्ष पुरुषों के 16 प्रकार के और स्त्रियों के 14 प्रकार के कंकण, कटिसूत्र, हार, केयूर, मंजीर, कटक, कुण्डल, किरीट और मुकुट इत्यादि विविध उत्तम आभूषण प्रदान करते हैं -
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वस्त्रांग - इस जाति के कल्पवृक्ष नित्य चीनपट (सूती
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तिलोयपण्णत्ती, 4/346
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आदिपुराण, 3/38
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तिलोयपण्णत्ती, 4/347-357
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लोकविभाग, 5/14-23
26
अर्थात् ये युगलिया जीव चक्रवर्ती के भोग-लाभ की अपेक्षा अनंत गुण भोग भोगते हैं। चक्रवर्ती तो कर्म भूमि में होते हैं, उन्हें विशेष कर्म करना पड़ता है, जब कि भोगभूमिया जीवों को सर्व सुविधाएँ कल्पवृक्ष से प्राप्त होती हैं, उन्हें मनवांछित समस्त भोग सामग्री प्राप्त होती है, फिर भी आचार्य नेमिचन्द्र लिखते हैं कि -
“सुलहेसु वि गो तित्तिं पंचक्खविएसु”
अर्थात् पंचेंद्रिय भोगों की अतिसुलभता भी उन्हें तृप्ति प्रदान नहीं करती। कहने का तात्पर्य यह है कि भोगों की बाहुल्यता इस जीव को सुखी करने में समर्थ नहीं है।
भोग सामग्री इकट्ठी करने के पहले हमें भी यह विचार करना चाहिये कि भोगों में सुख है भी या नहीं ? ‘इनमें सुख है ही नहीं’ - यदि ऐसी प्रतीति हो जाये तो भोगों की वासना मिटे बिना न रहे। वर्तमान में हम कितनी भी भोग सामग्री एकत्रित कर लें, वह भोगभूमि की तुलना में अत्यल्प ही होगी; अतः विचार करना कि भोगभूमि में इतनी अनुकूल सामग्री में भी तृप्ति नहीं हुई तो अब इस अल्प सामग्री से तृप्ति कैसे होगी ? अतः भोग सामग्री से दृष्टि हटाकर अपने स्वभाव को देखने का प्रयत्न करना चाहिये।
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
अर्थात् ये युगलिया जीव चक्रवर्ती के भोग-लाभ की अपेक्षा अनंत गुणे भोग भोगते हैं। चक्रवर्ती तो कर्म भूमि में होते हैं, उन्हें विशेष कर्म करना पड़ता है, जब कि भोगभूमिया जीवों को सर्व सुविधायें कल्पवृक्षों से प्राप्त होती हैं, उन्हें मनवांछित समस्त भोग सामग्री प्राप्त होती है; फिर भी आचार्य नेमीचन्द्र लिखते हैं कि – 'सुलहेसु वि णो तित्ती तेसिं पंचक्खविसएसु’86
अर्थात् पंचेन्द्रिय भोगों की अतिसुलभता भी उन्हें तृप्ति प्रदान नहीं करती। कहने का तात्पर्य यह है कि भोगों की बाहुल्यता इस जीव को सुखी करने में समर्थ नहीं है।
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
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आलयांग 7. दीपांग 8. भाजनांग 9. मालांग और 10. तेजांग।87 इनके नाम किंचित् शब्द भेद से आदिपुराण88 में निम्नानुसार मिलते हैं – 1. मद्यांग 2. तूर्यांग 3. विभूषांग 4. स्रगंग 5. ज्योतिरंग 6. दीपांग 7. गृहांग 8. भोजनांग 9 पात्रांग और 10. वस्त्रांग।
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पानांग – इस जाति के कल्पवृक्ष भोगभूमिया जीवों को मधुर, सुस्वाद, छह रसों से युक्त, प्रशस्त, अतिशीतल तथा तुष्टि और पुष्टिकारक बत्तीस प्रकार के पेय दिया करते हैं। 2. तूर्यांग – इस जाति के कल्पवृक्ष उत्तम वीणा, पटु पटह, मृदंग, झालर, शंख, दुन्दुभि, भम्भा, भेरी और काहल इत्यादि भिन्न-भिन्न प्रकार के बाजे देते हैं।
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वस्त्रांग – इस जाति के कल्पवृक्ष नित्य चीनपट (सूती 87. तिलोयपण्णत्ती, 4/346
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आदिपुराण, 3/39-40
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तिलोयपण्णत्ती, 4/347-357
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लोकविभाग, 5/14-23
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
वस्त्र) एवं उत्तम क्षौम (रेशमी) वस्त्र तथा मन और नेत्रों को आनन्दित करने वाले नाना प्रकार के अन्य वस्त्र देते हैं।
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भोजनांग – इस जाति के कल्पवृक्ष सोलह प्रकार का आहार, सोलह प्रकार के व्यंजन, चौदह प्रकार के सूप (दाल आदि) चौवन के दुगुने (108) प्रकार के खाद्य पदार्थ, तीन सौ तिरेसठ प्रकार के स्वाद्य पदार्थ एवं तिरेसठ प्रकार के रस भेद पृथक्–पृथक् दिया करते हैं।
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आलयांग – इस जाति के कल्पवृक्ष स्वस्तिक एवं नन्द्यावर्त आदि सोलह प्रकार के रत्नमय और सुवर्णमय रमणीय दिव्य भवन दिया करते हैं।
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दीपांग – इस जाति के कल्पवृक्ष प्रासादों में शाखा, प्रवाल, फल, फूल और अंकुरादि के द्वारा जलते हुये दीपकों के सदृश प्रकाश देते हैं।
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भाजनांग – इस जाति के कल्पवृक्ष स्वर्ण एवं बहुत प्रकार के रत्नों से निर्मित थाल, झारी, कलश, गागर, चामर और आसनादिक प्रदान करते हैं।
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मालांग – इस जाति के कल्पवृक्ष बल्ली, तरु, गुच्छों और लताओं से उत्पन्न हुए सोलह हजार भेदरूप पुष्पों की विविध मालायें देते हैं।
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तेजांग/ज्योतिरांग – इस जाति के कल्पवृक्ष मध्य दिन के करोड़ों सूर्यों की किरणों के सदृश होते हुए नक्षत्र, चन्द्र और सूर्यादि की कान्ति का संहरण करते हैं।
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
ये कल्पवृक्ष वनस्पति रूप नहीं होते और इनका स्वरूप किसी व्यन्तर के समान भी नहीं होता। ये पृथ्वीरूप होते हुये भी जीवों को उनके पुण्य का फल प्रदान करने में समर्थ होते हैं। इनके माध्यम से भोगभूमि के जीव निरन्तर इन्द्रिय जनित उत्तम सुखों को भोगते हैं और अत्यन्त संतोषपूर्वक अपना जीवन यापन करते हैं; किन्तु तृप्त नहीं होते।
भरत एवं ऐरावत क्षेत्र में अवसर्पिणी के प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय काल में जीवों को प्राप्त सभी अनुकूलतायें इन कल्पवृक्षों के द्वारा ही प्राप्त होती है। सामान्यरूप में तीनों भोग भूमियों में भोग सामग्री की बाहुल्यता है, भोगों की ही प्रधानता रहती है, फिर भी तीनों के स्वरूप एवं परिस्थितियों में होने वाले परिवर्तन को हम पृथक्–पृथक् देखते हैं –
अवसर्पिणी का पहला काल (सुषमा–सुषमा) –
यह काल उत्तम भोगभूमि का काल कहलाता है। इस काल
में भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों की परिस्थितियाँ उत्तरकुरु एवं देवकुरु नामक शाश्वत भोगभूमियों के समान होती है। ध्यान रहे, षट् कालों का परिवर्तन भरत एवं ऐरावत क्षेत्र के भी सभी खण्डों में नहीं होता, यह परिवर्तन इन क्षेत्रों के मात्र आर्यखण्डों में ही होता है। म्लेच्छ खण्डों की व्यवस्था को आगे “काल अपरिवर्तन वाले क्षेत्र” शीर्षक में बताया गया है।
यह सुषमा–सुषमा नामक पहला काल चार कोड़ाकोड़ी सागर का कहा गया है। इस काल में भूमि रज, धूम, दाह और हिम से रहित साफ–सुथरी, ओलावृष्टि तथा बिच्छू आदि कीड़ों के उपसर्ग काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
वस्त्र) एवं उत्तम क्षौम (रेशमी) वस्त्र तथा मन और नेत्रों को आनन्दित करने वाले नाना प्रकार के अन्य वस्त्र देते हैं।
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भोजनांग – इस जाति के कल्पवृक्ष सोलह प्रकार का आहार, सोलह प्रकार के व्यंजन, चौदह प्रकार के सूप (दाल आदि) चौवन के दुगुने (108) प्रकार के खाद्य पदार्थ, तीन सौ तिरेसठ प्रकार के स्वाद्य पदार्थ एवं तिरेसठ प्रकार के रस भेद पृथक्–पृथक् दिया करते हैं।
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आलयांग – इस जाति के कल्पवृक्ष स्वस्तिक एवं नन्द्यावर्त आदि सोलह प्रकार के रत्नमय और सुवर्णमय रमणीय दिव्य भवन दिया करते हैं।
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दीपांग – इस जाति के कल्पवृक्ष प्रासादों में शाखा, प्रवाल, फल, फूल और अंकुरादि के द्वारा जलते हुये दीपकों के सदृश प्रकाश देते हैं।
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भाजनांग – इस जाति के कल्पवृक्ष स्वर्ण एवं बहुत प्रकार के रत्नों से निर्मित थाल, झारी, कलश, गागर, चामर और आसनादिक प्रदान करते हैं।
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मालांग – इस जाति के कल्पवृक्ष बल्ली, तरु, गुच्छों और लताओं से उत्पन्न हुए सोलह हजार भेदरूप पुष्पों की विविध मालायें देते हैं।
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तेजांग/ज्योतिरांग – इस जाति के कल्पवृक्ष मध्य दिन के करोड़ों सूर्यों की किरणों के सदृश होते हुए नक्षत्र, चन्द्र और सूर्यादि की कान्ति का संहरण करते हैं।
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
ये कल्पवृक्ष वनस्पति रूप नहीं होते और इनका स्वरूप किसी व्यन्तर के समान भी नहीं होता। ये पृथ्वीरूप होते हुये भी जीवों को उनके पुण्य का फल प्रदान करने में समर्थ होते हैं। इनके माध्यम से भोगभूमि के जीव निरन्तर इन्द्रिय जनित उत्तम सुखों को भोगते हैं और अत्यन्त संतोषपूर्वक अपना जीवन यापन करते हैं; किन्तु तृप्त नहीं होते।
भरत एवं ऐरावत क्षेत्र में अवसर्पिणी के प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय काल में जीवों को प्राप्त सभी अनुकूलतायें इन कल्पवृक्षों के द्वारा ही प्राप्त होती है। सामान्यरूप में तीनों भोग भूमियों में भोग सामग्री की बाहुल्यता है, भोगों की ही प्रधानता रहती है, फिर भी तीनों के स्वरूप एवं परिस्थितियों में होने वाले परिवर्तन को हम पृथक्–पृथक् देखते हैं –
अवसर्पिणी का पहला काल (सुषमा–सुषमा) –
यह काल उत्तम भोगभूमि का काल कहलाता है। इस काल
में भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों की परिस्थितियाँ उत्तरकुरु एवं देवकुरु नामक शाश्वत भोगभूमियों के समान होती है। ध्यान रहे, षट् कालों का परिवर्तन भरत एवं ऐरावत क्षेत्र के भी सभी खण्डों में नहीं होता, यह परिवर्तन इन क्षेत्रों के मात्र आर्यखण्डों में ही होता है। म्लेच्छ खण्डों की व्यवस्था को आगे “काल अपरिवर्तन वाले क्षेत्र” शीर्षक में बताया गया है।
यह सुषमा–सुषमा नामक पहला काल चार कोड़ाकोड़ी सागर का कहा गया है। इस काल में भूमि रज, धूम, दाह और हिम से रहित साफ–सुथरी, ओलावृष्टि तथा बिच्छू आदि कीड़ों के उपसर्ग काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
से रहित, निर्मल दर्पण के समान, निन्द्यपदार्थों से रहित दिव्य बालुकामय होती है, जो तन-मन और नेत्रों को सुख उत्पन्न करती है।91 चारों ओर पंच वर्ण युक्त, मृदुल एवं सुगन्ध से परिपूर्ण सुन्दर छोटे-छोटे घास के मैदान होते हैं। झील, तालाब, वापिका तथा नदियाँ स्वच्छ शीतल जल से परिपूर्ण तथा मकरादि जलचर जीवों से रहित होती हैं और उन्हीं जलाशयों के किनारे रत्नों की सीढ़ियों से युक्त शैय्या एवं आसनों के समूह से परिपूर्ण भोगभूमियों के प्राकृत्रिक भवन, प्रासाद आदि आवास-स्थल बने होते हैं।92 इस काल में शंख, चींटी, खटमल, गोमक्षिका, डाँस, मच्छर और कृमि आदि विकलेन्द्रिय जीव नियम से नहीं होते। यहाँ असंज्ञी भी नहीं होते, स्वामी और भृत्य का भेद भी नहीं होता, कलह एवं भीषण युद्ध आदि तथा ईर्ष्या और रोग आदि भी नहीं होते। यहाँ अन्धकार नहीं होने से दिन-रात का भेद नहीं है। गर्मी और सर्दी की वेदना भी नहीं है। निन्दा, परस्त्री रमण और परधन हरण आदि दुष्कृत्य भी यहाँ नहीं होते।93
इस काल में उत्पन्न हुये युगल चौथे दिन बेर के बराबर आहार ग्रहण करते हैं।94 इनके शरीर की ऊँचाई 6000 धनुष (तीन कोस) एवं आयु तीन पल्य प्रमाण होती है। पुरुष एवं स्त्री दोनों के पृष्ठ भाग में दो सौ छप्पन हड्डियाँ95 होती है। यहाँ जन्मे पुरुषों 91. तिलोयपण्णत्ती 4/324-325
-
वही, 4/326, 328-329
-
(1) तिलोयपण्णत्ती, 4/335-337 (2) लोकविभाग 5/29-30 94. आदिपुराण, 3/30
-
लोकविभाग, 5/11
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
के लिये लोकविभाग में 'नवसहस्त्रेभविक्रमा’96 शब्द का प्रयोग करके नौ हजार हाथियों के सदृश बल की बात कही है।
ये किंचित् लाल हाथ-पैर वाले, नव चम्पक के फूलों की सुगन्ध से व्याप्त, मार्दव और आर्जव गुणों से संयुक्त, मन्दकषायी, सुशील होते हैं। इनका शरीर वज्रवृषभनाराच संहनन से युक्त और समचतुरस्र संस्थान वाला होता है। ये उदित होते हुये सूर्य सदृश तेजस्वी, कवलाहार करते हुये भी मल-मूत्र से रहित होते हैं। नर-नारी के अतिरिक्त इनका और कोई परिवार नहीं होता।97 उत्तम मुकुट को धारण करने वाले यहाँ के पुरुष इन्द्र से भी अधिक सुन्दराकार होते हैं और मणिमय कुण्डलों से विभूषित कपोलों वाली स्त्रियाँ अप्सराओं के सदृश अत्यन्त सुन्दर होती हैं।98 ऐसे उत्तम अनुकूलताओं वाले काल में भी हम अनन्त बार जन्म-मरण कर चुके हैं; किन्तु आत्मभान बिना अशान्त ही रहे। इस काल में आयु पूर्ण होने से 9 माह पूर्व ही स्त्री को गर्भ धारण होता है तथा युगल पुत्र-पुत्री को जन्म देकर स्त्री-पुरुष दोनों का मरण हो जाता है। नवजात बालक-बालिका के शैय्या पर सोते हुये अपना अंगूठा चूसने में तीन दिन व्यतीत हो जाते हैं, पश्चात् तीन दिन में वे बैठना सीख जाते हैं, फिर तीन दिन तक अस्थिर गमन और अगले तीन दिनों में दौड़ने लगते हैं। फिर क्रमशः कलागुणों की प्राप्ति, तरुण अवस्था और सम्यक्त्व प्राप्ति 96. लोकविभाग, 5/26
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तिलोयपण्णत्ती, 4/338-344
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वही, 4/363
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
से रहित, निर्मल दर्पण के समान, निन्द्यपदार्थों से रहित दिव्य बालुकामय होती है, जो तन-मन और नेत्रों को सुख उत्पन्न करती है।91 चारों ओर पंच वर्ण युक्त, मृदुल एवं सुगन्ध से परिपूर्ण सुन्दर छोटे-छोटे घास के मैदान होते हैं। झील, तालाब, वापिका तथा नदियाँ स्वच्छ शीतल जल से परिपूर्ण तथा मकरादि जलचर जीवों से रहित होती हैं और उन्हीं जलाशयों के किनारे रत्नों की सीढ़ियों से युक्त शैय्या एवं आसनों के समूह से परिपूर्ण भोगभूमियों के प्राकृत्रिक भवन, प्रासाद आदि आवास-स्थल बने होते हैं।92 इस काल में शंख, चींटी, खटमल, गोमक्षिका, डाँस, मच्छर और कृमि आदि विकलेन्द्रिय जीव नियम से नहीं होते। यहाँ असंज्ञी भी नहीं होते, स्वामी और भृत्य का भेद भी नहीं होता, कलह एवं भीषण युद्ध आदि तथा ईर्ष्या और रोग आदि भी नहीं होते। यहाँ अन्धकार नहीं होने से दिन-रात का भेद नहीं है। गर्मी और सर्दी की वेदना भी नहीं है। निन्दा, परस्त्री रमण और परधन हरण आदि दुष्कृत्य भी यहाँ नहीं होते।93
इस काल में उत्पन्न हुये युगल चौथे दिन बेर के बराबर आहार ग्रहण करते हैं।94 इनके शरीर की ऊँचाई 6000 धनुष (तीन कोस) एवं आयु तीन पल्य प्रमाण होती है। पुरुष एवं स्त्री दोनों के पृष्ठ भाग में दो सौ छप्पन हड्डियाँ95 होती है। यहाँ जन्मे पुरुषों 91. तिलोयपण्णत्ती 4/324-325
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वही, 4/326, 328-329
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(1) तिलोयपण्णत्ती, 4/335-337 (2) लोकविभाग 5/29-30 94. आदिपुराण, 3/30
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लोकविभाग, 5/11
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
के लिये लोकविभाग में 'नवसहस्त्रेभविक्रमा’96 शब्द का प्रयोग करके नौ हजार हाथियों के सदृश बल की बात कही है।
ये किंचित् लाल हाथ-पैर वाले, नव चम्पक के फूलों की सुगन्ध से व्याप्त, मार्दव और आर्जव गुणों से संयुक्त, मन्दकषायी, सुशील होते हैं। इनका शरीर वज्रवृषभनाराच संहनन से युक्त और समचतुरस्र संस्थान वाला होता है। ये उदित होते हुये सूर्य सदृश तेजस्वी, कवलाहार करते हुये भी मल-मूत्र से रहित होते हैं। नर-नारी के अतिरिक्त इनका और कोई परिवार नहीं होता।97 उत्तम मुकुट को धारण करने वाले यहाँ के पुरुष इन्द्र से भी अधिक सुन्दराकार होते हैं और मणिमय कुण्डलों से विभूषित कपोलों वाली स्त्रियाँ अप्सराओं के सदृश अत्यन्त सुन्दर होती हैं।98 ऐसे उत्तम अनुकूलताओं वाले काल में भी हम अनन्त बार जन्म-मरण कर चुके हैं; किन्तु आत्मभान बिना अशान्त ही रहे। इस काल में आयु पूर्ण होने से 9 माह पूर्व ही स्त्री को गर्भ धारण होता है तथा युगल पुत्र-पुत्री को जन्म देकर स्त्री-पुरुष दोनों का मरण हो जाता है। नवजात बालक-बालिका के शैय्या पर सोते हुये अपना अंगूठा चूसने में तीन दिन व्यतीत हो जाते हैं, पश्चात् तीन दिन में वे बैठना सीख जाते हैं, फिर तीन दिन तक अस्थिर गमन और अगले तीन दिनों में दौड़ने लगते हैं। फिर क्रमशः कलागुणों की प्राप्ति, तरुण अवस्था और सम्यक्त्व प्राप्ति 96. लोकविभाग, 5/26
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तिलोयपण्णत्ती, 4/338-344
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वही, 4/363
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
की योग्यता में तीन–तीन दिन व्यतीत होते हैं।99 इसप्रकार उत्तम भोगभूमि में जन्मे मनुष्य मात्र 21 दिनों में यौवन से परिपूर्ण100 होकर सम्यग्दर्शन प्राप्ति के योग्य हो जाते हैं।
सम्यग्दर्शन प्राप्ति के कारणों की चर्चा करते हुये आचार्य यतिवृषभ101 ने तीन कारण बताये हैं – (1) जाति स्मरण ज्ञान (2) देवों द्वारा प्रतिबोध (3) चारणऋद्धि धारी मुनिराज का सदुपदेश। ये सब उत्तम युगल पारस्परिक प्रेम में अत्यन्त मुग्ध रहा करते हैं, इसलिये उनके श्रावकोचित व्रत संयम नहीं होते।102 जैसे-जैसे सुषमा–सुषमा नामक प्रथम काल व्यतीत होता
जाता है, वैसे-वैसे मनुष्य, तिर्यंचों का शरीर, आयु, बल, ऋद्धि आदि भी कम होते रहते हैं। इसप्रकार चार कोड़ाकोड़ी सागर में यह काल पूर्ण हो जाता है। हमने अतीत में अनंत बार इस प्रकार का काल सुख से दूर रहकर ही बिताया है।
अवसर्पिणी का दूसरा काल (सुषमा) –
यह काल मध्यम भोगभूमि का काल कहलाता है। इस काल
में भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों की परिस्थितियाँ हरि क्षेत्र103 एवं रम्यक् क्षेत्र नामक शाश्वत भोगभूमियों के समान होती हैं।
-
तिलोयपण्णत्ती, 4/383–384
-
‘दिवसैरेकविंशत्या पूर्यन्ते यौवनेन च।’
– लोकविभाग, 5/25 (पूर्वार्द्ध)
-
तिलोयपण्णत्ती, 4/385
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‘तेसुं सावय वद संजमो णत्थि’ – वही, 4/390
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‘शेषो विधिस्तु निश्शेषो हरिवर्षसमो मतः’ – आदिपुराण 3/50 काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
तीन कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण सुषमा नामक इस दूसरे काल के प्रारंभ में मनुष्यों के शरीर की ऊँचाई 4000 धनुष (दो कोस), आयु दो पल्य और शरीर की प्रभा पूर्णचन्द्र सदृश होती है। इनके पृष्ठभाग में एक सौ अट्ठाईस हड्डियाँ होती हैं। स्त्रियाँ अप्सराओं सदृश और पुरुष देवों सदृश होते हैं। इस काल में मनुष्य समचतुरस्र संस्थान ये युक्त होते हुए दो दिन बाद तीसरे दिन बहेड़ा फल बराबर अमृतमय आहार करते हैं।104
जन्म के उपरान्त युवा होने तक का जो क्रम उत्तम भोगभूमि में 3–3 दिन के अन्तराल से सात चरणों में बताया गया था, वही क्रम यहाँ मध्यम भोगभूमि (सुषमा नामक दूसरे काल) में 5–5 दिन के विकास क्रम में होता है। अर्थात् बालकों के शैय्या पर सोते हुए अपना अंगूठा चूसने, बैठने, अस्थिर गमन, स्थिर गमन, कलागुणों की प्राप्ति, तारुण्य और सम्यक्त्व ग्रहण की योग्यता – इनमें प्रत्येक अवस्था में पाँच-पाँच दिन लगते हैं।105 इस प्रकार यहाँ के जीव जन्म के पश्चात् मात्र 35 दिन में सम्यग्दर्शन प्राप्त करने के योग्य हो जाते हैं।
भोगभूमि संबंधी शेष वर्णन उत्तम भोगभूमि के समान ही है। इस काल के प्रारंभ से अंत तक की परिस्थितियों में भी अवसर्पिणी काल होने से बल, आयु, शरीर आदि का ह्रास देखा जाता है। इस प्रकार तीन कोड़ाकोड़ी सागर व्यतीत होने पर यह काल समाप्त हो जाता है।
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तिलोयपण्णत्ती, 4/400–402
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वही, 4/403–404
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
की योग्यता में तीन–तीन दिन व्यतीत होते हैं।99 इसप्रकार उत्तम भोगभूमि में जन्मे मनुष्य मात्र 21 दिनों में यौवन से परिपूर्ण100 होकर सम्यग्दर्शन प्राप्ति के योग्य हो जाते हैं।
सम्यग्दर्शन प्राप्ति के कारणों की चर्चा करते हुये आचार्य यतिवृषभ101 ने तीन कारण बताये हैं – (1) जाति स्मरण ज्ञान (2) देवों द्वारा प्रतिबोध (3) चारणऋद्धि धारी मुनिराज का सदुपदेश। ये सब उत्तम युगल पारस्परिक प्रेम में अत्यन्त मुग्ध रहा करते हैं, इसलिये उनके श्रावकोचित व्रत संयम नहीं होते।102 जैसे-जैसे सुषमा–सुषमा नामक प्रथम काल व्यतीत होता
जाता है, वैसे-वैसे मनुष्य, तिर्यंचों का शरीर, आयु, बल, ऋद्धि आदि भी कम होते रहते हैं। इसप्रकार चार कोड़ाकोड़ी सागर में यह काल पूर्ण हो जाता है। हमने अतीत में अनंत बार इस प्रकार का काल सुख से दूर रहकर ही बिताया है।
अवसर्पिणी का दूसरा काल (सुषमा) –
यह काल मध्यम भोगभूमि का काल कहलाता है। इस काल
में भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों की परिस्थितियाँ हरि क्षेत्र103 एवं रम्यक् क्षेत्र नामक शाश्वत भोगभूमियों के समान होती हैं।
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तिलोयपण्णत्ती, 4/383–384
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‘दिवसैरेकविंशत्या पूर्यन्ते यौवनेन च।’
– लोकविभाग, 5/25 (पूर्वार्द्ध)
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तिलोयपण्णत्ती, 4/385
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‘तेसुं सावय वद संजमो णत्थि’ – वही, 4/390
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‘शेषो विधिस्तु निश्शेषो हरिवर्षसमो मतः’ – आदिपुराण 3/50 काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
तीन कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण सुषमा नामक इस दूसरे काल के प्रारंभ में मनुष्यों के शरीर की ऊँचाई 4000 धनुष (दो कोस), आयु दो पल्य और शरीर की प्रभा पूर्णचन्द्र सदृश होती है। इनके पृष्ठभाग में एक सौ अट्ठाईस हड्डियाँ होती हैं। स्त्रियाँ अप्सराओं सदृश और पुरुष देवों सदृश होते हैं। इस काल में मनुष्य समचतुरस्र संस्थान ये युक्त होते हुए दो दिन बाद तीसरे दिन बहेड़ा फल बराबर अमृतमय आहार करते हैं।104
जन्म के उपरान्त युवा होने तक का जो क्रम उत्तम भोगभूमि में 3–3 दिन के अन्तराल से सात चरणों में बताया गया था, वही क्रम यहाँ मध्यम भोगभूमि (सुषमा नामक दूसरे काल) में 5–5 दिन के विकास क्रम में होता है। अर्थात् बालकों के शैय्या पर सोते हुए अपना अंगूठा चूसने, बैठने, अस्थिर गमन, स्थिर गमन, कलागुणों की प्राप्ति, तारुण्य और सम्यक्त्व ग्रहण की योग्यता – इनमें प्रत्येक अवस्था में पाँच-पाँच दिन लगते हैं।105 इस प्रकार यहाँ के जीव जन्म के पश्चात् मात्र 35 दिन में सम्यग्दर्शन प्राप्त करने के योग्य हो जाते हैं।
भोगभूमि संबंधी शेष वर्णन उत्तम भोगभूमि के समान ही है। इस काल के प्रारंभ से अंत तक की परिस्थितियों में भी अवसर्पिणी काल होने से बल, आयु, शरीर आदि का ह्रास देखा जाता है। इस प्रकार तीन कोड़ाकोड़ी सागर व्यतीत होने पर यह काल समाप्त हो जाता है।
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तिलोयपण्णत्ती, 4/400–402
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वही, 4/403–404
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
अवसर्पिणी का तीसरा काल (सुषमा-दुषमा) –
यह काल जघन्य भोगभूमि का काल कहलाता है। इस काल में भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों की परिस्थितियाँ हैमवत क्षेत्र एवं हैरण्यवत क्षेत्र नामक शाश्वत भोगभूमियों के समान होती है। यहाँ भी सम्पूर्ण कार्य कल्पवृक्षों से ही सम्पन्न होते हैं। तिलोयपण्णत्ती106 एवं आदिपुराण107 में इस काल का स्वरूप स्पष्ट करते हुये लिखा है कि सुषमा-दुषमा नामक यह काल दो कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है। इसके प्रारंभ में मनुष्यों की ऊँचाई दो हजार धनुष (एक कोस), आयु एक पल्य और वर्ण प्रियंगु फल सदृश होता है। इस काल में स्त्री-पुरुषों के पृष्ठ भाग में चौंसठ हड्डियाँ होती हैं। यहाँ के मनुष्य एक दिन के अन्तराल से आँवले बराबर अमृतमय आहार का ग्रहण करते हैं।
इस काल में जन्मे युगल का शैय्या पर अंगूठा चूसने में 7 दिन का काल व्यतीत हो जाता है। शेष परिस्थितियाँ – बैठना, अस्थिर गमन, स्थिर गमन, कला गुणों की प्राप्ति, तारुण्य और सम्यक्त्व ग्रहण की योग्यता – इन सब अवस्थाओं में भी क्रमशः सात-सात दिन लगते हैं।108 इस प्रकार इस काल में उत्पन्न हुये जीवों में मात्र 49 दिन में सम्यग्दर्शन प्राप्त करने की योग्यता हो जाती है।
यहाँ सभी जीवों को अपने पुण्य प्रमाण कल्पवृक्षों से अनुकूलताओं 106. तिलोयपण्णत्ती, 4/407-410
-
आदिपुराण, 3/53-54
-
तिलोयपण्णत्ती, 4/411-412
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
की प्राप्ति होने के कारण कोई चोर नहीं होता। यहाँ किसी की किसी से दुश्मनी नहीं होती। यहाँ शीत, आताप, प्रचण्ड वायु एवं वर्षा नहीं होती, इसलिये प्राकृतिक वातावरण मनोरम रहता है। अवसर्पिणी के प्रारंभिक 3 काल (भोगभूमि) एक नजर में – विषय
सुषमा-सुषमा
सुषमा
सुषमा-दुषमा
भूमि रचना
उत्तम भोगभूमि
मध्यम भोगभूमि
जघन्य भोगभूमि
काल प्रमाण
4 को0को0सागर
3 कोड़ाकोड़ी
2 कोड़ाकोड़ी
उत्कृष्ट आयु
3 पल्योपम
2 पल्योपम
1 पल्योपम
जघन्य आयु
2 पल्योपम
1 पल्योपम
1 कोटिपूर्व+1 समय
उत्कृष्ट ऊँचाई
3 कोस
2 कोस
1 कोस
जघन्य ऊँचाई
2 कोस
1 कोस
500 धनुष
पृष्ठ हड्डियाँ
आहार प्रमाण
बेर बराबर
बहेड़ा बराबर
आँवला प्रमाण
आहार अंतराल
3 दिन बाद
2 दिन बाद
1 दिन बाद
शरीर का रंग
सूर्यप्रभा सदृश
पूर्ण चन्द्रप्रभा
प्रियंगु फल सदृश
सम्यक्त्व पात्रता
21 दिन बाद
35 दिन बाद
49 दिन बाद
भोगभूमि के तीनों कालों में जिसप्रकार मनुष्यों के युगल कल्पवृक्ष सम्बन्धी आहारों से सन्तुष्ट होकर प्रेमपूर्वक क्रीड़ा करते हैं, उसीप्रकार सन्तुष्ट चित्त के धारक तिर्यंचों के जोड़े भी प्रेमपूर्वक क्रीड़ा करते हैं। उस समय कहीं सिंहों के युगल, कहीं हाथियों के युगल, कहीं ऊँटों के युगल, कहीं शूकरों के युगल काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
अवसर्पिणी का तीसरा काल (सुषमा-दुषमा) –
यह काल जघन्य भोगभूमि का काल कहलाता है। इस काल में भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों की परिस्थितियाँ हैमवत क्षेत्र एवं हैरण्यवत क्षेत्र नामक शाश्वत भोगभूमियों के समान होती है। यहाँ भी सम्पूर्ण कार्य कल्पवृक्षों से ही सम्पन्न होते हैं। तिलोयपण्णत्ती106 एवं आदिपुराण107 में इस काल का स्वरूप स्पष्ट करते हुये लिखा है कि सुषमा-दुषमा नामक यह काल दो कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है। इसके प्रारंभ में मनुष्यों की ऊँचाई दो हजार धनुष (एक कोस), आयु एक पल्य और वर्ण प्रियंगु फल सदृश होता है। इस काल में स्त्री-पुरुषों के पृष्ठ भाग में चौंसठ हड्डियाँ होती हैं। यहाँ के मनुष्य एक दिन के अन्तराल से आँवले बराबर अमृतमय आहार का ग्रहण करते हैं।
इस काल में जन्मे युगल का शैय्या पर अंगूठा चूसने में 7 दिन का काल व्यतीत हो जाता है। शेष परिस्थितियाँ – बैठना, अस्थिर गमन, स्थिर गमन, कला गुणों की प्राप्ति, तारुण्य और सम्यक्त्व ग्रहण की योग्यता – इन सब अवस्थाओं में भी क्रमशः सात-सात दिन लगते हैं।108 इस प्रकार इस काल में उत्पन्न हुये जीवों में मात्र 49 दिन में सम्यग्दर्शन प्राप्त करने की योग्यता हो जाती है।
यहाँ सभी जीवों को अपने पुण्य प्रमाण कल्पवृक्षों से अनुकूलताओं 106. तिलोयपण्णत्ती, 4/407-410
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आदिपुराण, 3/53-54
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तिलोयपण्णत्ती, 4/411-412
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
की प्राप्ति होने के कारण कोई चोर नहीं होता। यहाँ किसी की किसी से दुश्मनी नहीं होती। यहाँ शीत, आताप, प्रचण्ड वायु एवं वर्षा नहीं होती, इसलिये प्राकृतिक वातावरण मनोरम रहता है। अवसर्पिणी के प्रारंभिक 3 काल (भोगभूमि) एक नजर में – विषय
सुषमा-सुषमा
सुषमा
सुषमा-दुषमा
भूमि रचना
उत्तम भोगभूमि
मध्यम भोगभूमि
जघन्य भोगभूमि
काल प्रमाण
4 को0को0सागर
3 कोड़ाकोड़ी
2 कोड़ाकोड़ी
उत्कृष्ट आयु
3 पल्योपम
2 पल्योपम
1 पल्योपम
जघन्य आयु
2 पल्योपम
1 पल्योपम
1कोटिपूर्व+1समय
उत्कृष्ट ऊँचाई
3 कोस
2 कोस
1 कोस
जघन्य ऊँचाई
2 कोस
1 कोस
500 धनुष
पृष्ठ हड्डियाँ
आहार प्रमाण
बेर बराबर
बहेड़ा बराबर
आँवला प्रमाण
आहार अंतराल
3 दिन बाद
2 दिन बाद
1 दिन बाद
शरीर का रंग
सूर्यप्रभा सदृश
पूर्ण चन्द्रप्रभा
प्रियंगु फल सदृश
सम्यक्त्व पात्रता
21 दिन बाद
35 दिन बाद
49 दिन बाद
भोगभूमि के तीनों कालों में जिसप्रकार मनुष्यों के युगल कल्पवृक्ष सम्बन्धी आहारों से सन्तुष्ट होकर प्रेमपूर्वक क्रीड़ा करते हैं, उसीप्रकार सन्तुष्ट चित्त के धारक तिर्यंचों के जोड़े भी प्रेमपूर्वक क्रीड़ा करते हैं। उस समय कहीं सिंहों के युगल, कहीं हाथियों के युगल, कहीं ऊँटों के युगल, कहीं शूकरों के युगल काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
और कहीं मद से धीमी चाल चलने वाले व्याघ्रों के युगल क्रीड़ा करते हैं। कहीं मनुष्यों के बराबर आयु को धारण करने वाले गाय, घोड़े और भैंसों के जोड़े अपनी इच्छानुसार अत्यधिक क्रीड़ा करते हैं। 109 वहाँ रहने वाले व्याघ्रादि भूमिचर और काक आदि नभचर तिर्यंच मांसाहार के बिना कल्पवृक्षों के मधुर फल भोगते हैं। मनुष्यों के समान तिर्यंचों के भी अपनी-अपनी योग्यतानुसार फल, कन्द, तृण और अंकुरादि के भोग होते हैं। 110
इन कालों में पुरुष स्त्री को आर्या कहकर और स्त्री पुरुष को आर्य कहकर पुकारती है। आर्या और आर्य भोगभूमिज
स्त्री-पुरुषों के साधारण नाम हैं। उस समय सबकी एक ही उत्तम जाति होती है। वहाँ ब्राह्मण आदि चार वर्ण नहीं होते और न ही असि-मसि आदि षट्कर्म होते हैं। वहाँ न सेवक-स्वामी का सम्बन्ध होता है और न वेषधारी साधु ही। वहाँ के प्राणी सब विषयों में मध्यस्थ रहते हैं, वहाँ न मित्र होते हैं और न शत्रु। वे सभी स्वभाव से ही अल्पकषायी होते हैं। 111
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भोगभूमि का काल
उत्तम काल है, जहाँ प्राणियों को सर्व प्रकार की बाह्य अनुकूलतायें मिलती है, किन्तु यह प्रसिद्ध कहावत है कि ‘सबै दिन जात न एक समाना’ अर्थात् सभी दिन एक समान नहीं रहते। भोगभूमि का काल भी भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों में एक समान नहीं रहता, समय के साथ-साथ परिवर्तन होता है। भोगभूमि का काल उत्तम 109. हरिवंश पुराण, 7/99-101
-
तिलोयपण्णत्ती, 4/396-395
-
हरिवंश पुराण, 7/102-104
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
से मध्यम एवं जघन्य होकर अब समापन की ओर बढ़ता है। इसमें लगभग 9 कोड़ाकोड़ी सागर का काल व्यतीत हो जाता है। तृतीय काल के अन्त में धीरे-धीरे कल्पवृक्षों की फलदान सामर्थ्य कम होने लगती है। अब युग परिवर्तन होना है, भोगभूमि समाप्त होगी और कर्मभूमि का प्रारंभ होगा। इस संधि काल में सृष्टि में बहुत बड़े प्राकृतिक परिवर्तन होने लगते हैं, इनसे भयभीत प्रजा की समस्याओं को दूर करने के लिये कुल परम्परा से धरातल पर विशिष्ट पुण्यशाली महापुरुषों का जन्म होता है, जिन्हें जैन परम्परा में कुलकरों के नाम से जाना जाता है। कुलकर व्यवस्था –
भोगभूमि के अंतिम चरण में भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों के आर्य खण्डों की भूमि पर अत्यन्त युगान्तरकारी प्राकृतिक एवं जैविक परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों से अनभिज्ञ एवं भयभीत मानव जाति को, इन परिवर्तनों के अनुकूल सामंजित होने का उपदेश देने वाले कुछ महापुरुषों का जन्म तृतीय काल के अंत में भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों में होता है, जिन्हें जैन ग्रन्थों में मुख्यरूप से कुलकर कहकर पुकारा है, हिन्दू पुराणों में इनके लिये मनु शब्द का प्रयोग मिलता है। जैन शास्त्रों में कहा है कि जब चतुर्थ काल प्रारंभ होने में पल्य का आठवाँ भाग शेष रहता है, तब क्रम से 14 कुलकर उत्पन्न होते हैं।
सुषमादुषमा नामक तीसरा काल समाप्त होने में जब पल्य का आठवाँ भाग प्रमाण काल शेष रह गया तथा कल्पवृक्ष भी क्रम-क्रम से कम होने लगे तब इस भरत क्षेत्र की दक्षिण दिशा काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
और कहीं मद से धीमी चाल चलने वाले व्याघ्रों के युगल क्रीड़ा करते हैं। कहीं मनुष्यों के बराबर आयु को धारण करने वाले गाय, घोड़े और भैंसों के जोड़े अपनी इच्छानुसार अत्यधिक क्रीड़ा करते हैं। 109 वहाँ रहने वाले व्याघ्रादि भूमिचर और काक आदि नभचर तिर्यंच मांसाहार के बिना कल्पवृक्षों के मधुर फल भोगते हैं। मनुष्यों के समान तिर्यंचों के भी अपनी-अपनी योग्यतानुसार फल, कन्द, तृण और अंकुरादि के भोग होते हैं। 110
इन कालों में पुरुष स्त्री को आर्या कहकर और स्त्री पुरुष को आर्य कहकर पुकारती है। आर्या और आर्य भोगभूमिज
स्त्री-पुरुषों के साधारण नाम हैं। उस समय सबकी एक ही उत्तम जाति होती है। वहाँ ब्राह्मण आदि चार वर्ण नहीं होते और न ही असि-मसि आदि षट्कर्म होते हैं। वहाँ न सेवक-स्वामी का सम्बन्ध होता है और न वेषधारी साधु ही। वहाँ के प्राणी सब विषयों में मध्यस्थ रहते हैं, वहाँ न मित्र होते हैं और न शत्रु। वे सभी स्वभाव से ही अल्पकषायी होते हैं। 111
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भोगभूमि का काल
उत्तम काल है, जहाँ प्राणियों को सर्व प्रकार की बाह्य अनुकूलतायें मिलती है, किन्तु यह प्रसिद्ध कहावत है कि ‘सबै दिन जात न एक समाना’ अर्थात् सभी दिन एक समान नहीं रहते। भोगभूमि का काल भी भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों में एक समान नहीं रहता, समय के साथ-साथ परिवर्तन होता है। भोगभूमि का काल उत्तम 109. हरिवंश पुराण, 7/99-101
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तिलोयपण्णत्ती, 4/396-395
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हरिवंश पुराण, 7/102-104
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
से मध्यम एवं जघन्य होकर अब समापन की ओर बढ़ता है। इसमें लगभग 9 कोड़ाकोड़ी सागर का काल व्यतीत हो जाता है। तृतीय काल के अन्त में धीरे-धीरे कल्पवृक्षों की फलदान सामर्थ्य कम होने लगती है। अब युग परिवर्तन होना है, भोगभूमि समाप्त होगी और कर्मभूमि का प्रारंभ होगा। इस संधि काल में सृष्टि में बहुत बड़े प्राकृतिक परिवर्तन होने लगते हैं, इनसे भयभीत प्रजा की समस्याओं को दूर करने के लिये कुल परम्परा से धरातल पर विशिष्ट पुण्यशाली महापुरुषों का जन्म होता है, जिन्हें जैन परम्परा में कुलकरों के नाम से जाना जाता है। कुलकर व्यवस्था –
भोगभूमि के अंतिम चरण में भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों के आर्य खण्डों की भूमि पर अत्यन्त युगान्तरकारी प्राकृतिक एवं जैविक परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों से अनभिज्ञ एवं भयभीत मानव जाति को, इन परिवर्तनों के अनुकूल सामंजित होने का उपदेश देने वाले कुछ महापुरुषों का जन्म तृतीय काल के अंत में भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों में होता है, जिन्हें जैन ग्रन्थों में मुख्यरूप से कुलकर कहकर पुकारा है, हिन्दू पुराणों में इनके लिये मनु शब्द का प्रयोग मिलता है। जैन शास्त्रों में कहा है कि जब चतुर्थ काल प्रारंभ होने में पल्य का आठवाँ भाग शेष रहता है, तब क्रम से 14 कुलकर उत्पन्न होते हैं।
सुषमादुषमा नामक तीसरा काल समाप्त होने में जब पल्य का आठवाँ भाग प्रमाण काल शेष रह गया तथा कल्पवृक्ष भी क्रम-क्रम से कम होने लगे तब इस भरत क्षेत्र की दक्षिण दिशा काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
में गंगा और सिन्धु नदियों के बीच आर्यखण्ड में 14 कुलकरों की उत्पत्ति हुई। 112 ये प्रजा के जीवन जीने के उपाय का मनन करने अर्थात् जानने से मनु तथा आर्य पुरुषों के कुलों की रचना करने से कुलकर कहलाते हैं, इन्होंने अनेक वंश (कुल) स्थापित किये थे, अतः कुलों को धारण करने से कुलधर हैं तथा युग के आदि में होने से ये युगादिपुरुष भी कहे जाते हैं। 113 आचार्य यतिवृषभ 114 कहते हैं – ये सब कुलों के धारण करने से कुलधर नाम से और कुलों के करने में कुशल होने से कुलकर नाम से भी लोक में प्रसिद्ध हैं। वे इनकी मनुसंज्ञा की सार्थकता बताते हुये कहते हैं - ये अपने अवधिज्ञान एवं जातिस्मरण ज्ञान से भोगभूमिज मनुष्यों को जीवन के उपाय बताते हैं, इसलिये मुनिन्द्रों द्वारा मनु कहे जाते हैं। 115 स्थानांग सूत्र की वृत्ति में आचार्य अभयदेव 116 ने लिखा है कि कुल की व्यवस्था का संचालन करने वाला प्रकृष्ट प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति कुलकर कहलाता था।
चौदह कुलकरों के नाम त्रिलोकसार¹17 एवं आदिपुराण 118 के अनुसार इसप्रकार हैं प्रतिश्रुति, सन्मति, क्षेमंकर, क्षेमन्धर, सीमंकर, सीमन्धर, विमलवाहन, चक्षुष्मान्, यशस्वी, अभिचन्द्र, चन्द्राभ, मरुदेव, प्रसेनजित्, नाभिराय।
-
हरिवंशपुराण, 7/122-124
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(1) आदिपुराण, 3/211-212, (2) लोकविभाग, 5/120-121 114. तिलोयपण्णत्ती, 4/516
-
वही, 4/515
-
स्थानांगवृत्ति, 767/518/1 (जम्बूद्वीप प्रज्ञप्तिसूत्र, प्रस्तावना, पृष्ठ-28 से साभार) 117. त्रिलोकसार, गाथा-792-793
-
आदिपुराण, 3/229 से 232
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
त्रिलोकसार 119 एवं जम्बूद्वीप प्रज्ञप्तिसूत्र 120 में नाभिराय के पुत्र ऋषभदेव को पन्द्रहवाँ कुलकर बताया है। लोकविभाग 121 एवं आदिपुराण122 में नाभिराय के पुत्र ऋषभदेव एवं उनके पुत्र भरत को भी पन्द्रहवें एवं सोलहवें कुलकर के रूप में स्वीकार किया है, इन सभी कुलकरों के लिये आदिपुराण में मनु शब्द का प्रयोग भी किया गया है।
ये सभी कुलकर पूर्वभव में विदेह क्षेत्रों में उच्चकुलीन महापुरुष थे, वहाँ पर सम्यग्दर्शन प्राप्त करने के पहले ही भोगभूमि की आयु बांधकर तीसरे काल में भरत क्षेत्र में उत्पन्न हुये। 123 इन 14 कुलकरों में से कितने ही कुलकरों को जातिस्मरण था और कितने ही अवधिज्ञान के धारक थे। 124 अतः अपने विशिष्ट ज्ञान की सामर्थ्य से प्रजा की विभिन्न समस्याओं का समाधान किया करते थे।
भोगभूमि में सदैव कल्पवृक्षों का प्रकाश रहता था; अतः सूर्यचन्द्रादि विमान दिखाई नहीं देते थे। अब कल्पवृक्ष समाप्त हो जाने से वे सूर्यचन्द्रादि दिखाई देने लगे, उन्हें देखकर लोगों को भयंकर भय उत्पन्न हुआ। भोगभूमि में पुत्र-पुत्री का जन्म होते ही माता-पिता का मरण हो जाता था, वे लोग बच्चों का मुख 119. त्रिलोकसार, गाथा-793
-
इमे पण्णरस कुलगरा समुप्पज्जित्था - जम्बूद्वीप प्रज्ञप्तिसूत्र/2/35/पृ. 54 121. लोकविभाग, 5/122
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वृषभो भरतेशश्च तीर्थचक्रभृतौ मनू । आदिपुराण, 3/232 123. आदिपुराण, 3/207-209
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वही, 3/210
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
में गंगा और सिन्धु नदियों के बीच आर्यखण्ड में 14 कुलकरों की उत्पत्ति हुई। 112 ये प्रजा के जीवन जीने के उपाय का मनन करने अर्थात् जानने से मनु तथा आर्य पुरुषों के कुलों की रचना करने से कुलकर कहलाते हैं, इन्होंने अनेक वंश (कुल) स्थापित किये थे, अतः कुलों को धारण करने से कुलधर हैं तथा युग के आदि में होने से ये युगादिपुरुष भी कहे जाते हैं। 113 आचार्य यतिवृषभ 114 कहते हैं – ये सब कुलों के धारण करने से कुलधर नाम से और कुलों के करने में कुशल होने से कुलकर नाम से भी लोक में प्रसिद्ध हैं। वे इनकी मनुसंज्ञा की सार्थकता बताते हुये कहते हैं - ये अपने अवधिज्ञान एवं जातिस्मरण ज्ञान से भोगभूमिज मनुष्यों को जीवन के उपाय बताते हैं, इसलिये मुनिन्द्रों द्वारा मनु कहे जाते हैं। 115 स्थानांग सूत्र की वृत्ति में आचार्य अभयदेव 116 ने लिखा है कि कुल की व्यवस्था का संचालन करने वाला प्रकृष्ट प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति कुलकर कहलाता था।
चौदह कुलकरों के नाम त्रिलोकसार¹17 एवं आदिपुराण 118 के अनुसार इसप्रकार हैं प्रतिश्रुति, सन्मति, क्षेमंकर, क्षेमन्धर, सीमंकर, सीमन्धर, विमलवाहन, चक्षुष्मान्, यशस्वी, अभिचन्द्र, चन्द्राभ, मरुदेव, प्रसेनजित्, नाभिराय।
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हरिवंशपुराण, 7/122-124
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(1) आदिपुराण, 3/211-212, (2) लोकविभाग, 5/120-121 114. तिलोयपण्णत्ती, 4/516
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वही, 4/515
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स्थानांगवृत्ति, 767/518/1 (जम्बूद्वीप प्रज्ञप्तिसूत्र, प्रस्तावना, पृष्ठ-28 से साभार) 117. त्रिलोकसार, गाथा-792-793
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आदिपुराण, 3/229 से 232
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
त्रिलोकसार 119 एवं जम्बूद्वीप प्रज्ञप्तिसूत्र 120 में नाभिराय के पुत्र ऋषभदेव को पन्द्रहवाँ कुलकर बताया है। लोकविभाग 121 एवं आदिपुराण122 में नाभिराय के पुत्र ऋषभदेव एवं उनके पुत्र भरत को भी पन्द्रहवें एवं सोलहवें कुलकर के रूप में स्वीकार किया है, इन सभी कुलकरों के लिये आदिपुराण में मनु शब्द का प्रयोग भी किया गया है।
ये सभी कुलकर पूर्वभव में विदेह क्षेत्रों में उच्चकुलीन महापुरुष थे, वहाँ पर सम्यग्दर्शन प्राप्त करने के पहले ही भोगभूमि की आयु बांधकर तीसरे काल में भरत क्षेत्र में उत्पन्न हुये। 123 इन 14 कुलकरों में से कितने ही कुलकरों को जातिस्मरण था और कितने ही अवधिज्ञान के धारक थे। 124 अतः अपने विशिष्ट ज्ञान की सामर्थ्य से प्रजा की विभिन्न समस्याओं का समाधान किया करते थे।
भोगभूमि में सदैव कल्पवृक्षों का प्रकाश रहता था; अतः सूर्यचन्द्रादि विमान दिखाई नहीं देते थे। अब कल्पवृक्ष समाप्त हो जाने से वे सूर्यचन्द्रादि दिखाई देने लगे, उन्हें देखकर लोगों को भयंकर भय उत्पन्न हुआ। भोगभूमि में पुत्र-पुत्री का जन्म होते ही माता-पिता का मरण हो जाता था, वे लोग बच्चों का मुख 119. त्रिलोकसार, गाथा-793
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इमे पण्णरस कुलगरा समुप्पज्जित्था - जम्बूद्वीप प्रज्ञप्तिसूत्र/2/35/पृ. 54 121. लोकविभाग, 5/122
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वृषभो भरतेशश्च तीर्थचक्रभृतौ मनू । आदिपुराण, 3/232 123. आदिपुराण, 3/207-209
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वही, 3/210
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखपाते थे, अब बच्चों का मुख देखकर डरने लगे – इसप्रकार की अनेक समस्याएँ भोगभूमि के समापन के समय उत्पन्न होने लगती है, जिनका समुचित समाधान कुलकरों के माध्यम से किया जाता है।
उस समय अपराधी को यदि इतना कह दिया जाता था कि ‘हा’ अर्थात् ये क्या किया ? बस इतना शब्द मात्र अपराधी के लिये सजा का कार्य करता था। इससे बड़ी सजा के रूप में मकार दण्ड व्यवस्था प्रचलित हुई। जिसमें अपराधी को ‘हा’ के अतिरिक्त ‘मा’ कहा जाता था। ‘मा’ अर्थात् अब मत करना। सबसे बड़ी सजा थी – ‘धिक्’ अर्थात् धिक्कार है। इसप्रकार कुलकरों के समय हकार, मकार और धिक्कार (हा–मा–धिक) – ये तीन नीतियाँ दण्ड के रूप में प्रचलित हुईं। ज्यों-ज्यों काल व्यतीत होता चला गया, त्यों-त्यों मानव के अन्तर्मानस में परिवर्तन होता गया और अधिकाधिक कठोर दण्ड की व्यवस्था की गई। कुल परम्परा से हुये चौदह कुलकरों के सामने उपस्थित विविध प्रकार की समस्याओं/परिस्थितियों और उनके उपदेश द्वारा दिये गये विशिष्ट समाधान को तिलोयपण्णत्ती125 में 83 गाथाओं में, हरिवंशपुराण126 में 46 श्लोकों में तथा आदिपुराण127 में लगभग 100 श्लोकों में बहुत विस्तार से बताया है, यहाँ उस सम्पूर्ण विषय वस्तु को संक्षिप्त तालिका के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
- तिलोयपण्णत्ती, 4/428–510 126. हरिवंश पुराण, 7/125 से 170 127. आदिपुराण, 3/55–151, 164
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में क्रम
नाम
समस्या/परिस्थिति
उपदेश/समाधान
प्रतिश्रुति
आकाश में चन्द्र-सूर्य को
देखकर प्रजा भयभीत थी।
ये चन्द्र-सूर्य नित्य ही हैं, तेजांग जाति के कल्पवृक्षों का तेज मंद पडने से अब
प्रगट हुये हैं, इसप्रकार
सूर्य-चन्द्र का परिचय देकर प्रजा का भय दूर किया।
।
सन्मति
सूर्य के अस्त होने पर
अंधकार और तारा पंक्तियों
को देखने से प्रजा में उत्पन्न भय।
तेजांग कल्पवृक्ष सर्वथा नष्ट हो चुके हैं, ऐसा ज्ञान
कराकर अंधकार और
तारागणों का परिचय देकर
भय दूर किया।
।
क्षेमंकर
व्याघ्रादि तिर्यंचों में क्रूर परिणामों को देखकर प्रजा
में भय व व्याकुलता।
काल के विकार से ये
तिर्यंच क्रूरता को प्राप्त हुये हैं, अतः अब इनका विश्वास
कदापि नहीं करना, ऐसा
दिव्य उपदेश दिया।
क्षेमन्धर
क्रूरता को प्राप्त सिंहादि तिर्यंचों द्वारा मनुष्यों का भक्षण।
उन क्रूर तिर्यंचों से अपनी सुरक्षा के उपायभूत दण्डादि रखने का उपदेश दिया।
सीमंकर
कल्पवृक्ष अल्प फलवाले हुये, मनुष्यों में लोभ की वृद्धि होने से उनके स्वामित्व में परस्पर झगड़ा।
कल्पवृक्षों की सीमाओं के
निर्धारण द्वारा पारस्परिक संघर्ष पर रोक।
सीमन्धर
कल्पवृक्षों की अत्यन्त हानि के कारण कलह में वृद्धि।
कल्पवृक्षों को चिन्हित करके उनके स्वामित्व का विभाजन। 7.
विमलवाहन
गमनागमन में बाधा/पीड़ा
का अनुभव।
हाथी, घोड़ा आदि की सवारी
तथा वाहनों के प्रयोग का
उपदेश।
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखपाते थे, अब बच्चों का मुख देखकर डरने लगे – इसप्रकार की अनेक समस्याएँ भोगभूमि के समापन के समय उत्पन्न होने लगती है, जिनका समुचित समाधान कुलकरों के माध्यम से किया जाता है।
उस समय अपराधी को यदि इतना कह दिया जाता था कि ‘हा’ अर्थात् ये क्या किया ? बस इतना शब्द मात्र अपराधी के लिये सजा का कार्य करता था। इससे बड़ी सजा के रूप में मकार दण्ड व्यवस्था प्रचलित हुई। जिसमें अपराधी को ‘हा’ के अतिरिक्त ‘मा’ कहा जाता था। ‘मा’ अर्थात् अब मत करना। सबसे बड़ी सजा थी – ‘धिक्’ अर्थात् धिक्कार है। इसप्रकार कुलकरों के समय हकार, मकार और धिक्कार (हा-मा-धिक) – ये तीन नीतियाँ दण्ड के रूप में प्रचलित हुईं। ज्यों-ज्यों काल व्यतीत होता चला गया, त्यों-त्यों मानव के अन्तर्मानस में परिवर्तन होता गया और अधिकाधिक कठोर दण्ड की व्यवस्था की गई। कुल परम्परा से हुये चौदह कुलकरों के सामने उपस्थित विविध प्रकार की समस्याओं/परिस्थितियों और उनके उपदेश द्वारा दिये गये विशिष्ट समाधान को तिलोयपण्णत्ती125 में 83 गाथाओं में, हरिवंशपुराण126 में 46 श्लोकों में तथा आदिपुराण127 में लगभग 100 श्लोकों में बहुत विस्तार से बताया है, यहाँ उस सम्पूर्ण विषय वस्तु को संक्षिप्त तालिका के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
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तिलोयपण्णत्ती, 4/428-510
-
हरिवंश पुराण, 7/125 से 170
-
आदिपुराण, 3/55-151, 164
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में क्रम नाम समस्या / परिस्थिति
- प्रतिश्रुति
आकाश में चन्द्र-सूर्य को
देखकर प्रजा भयभीत थी।
- सन्मति
सूर्य के अस्त होने पर
अंधकार और तारा पंक्तियों
को देखने से प्रजा में उत्पन्न
भय ।
- क्षेमंकर
व्याघ्रादि तिर्यंचों में क्रूर
परिणामों को देखकर प्रजा
में भय व व्याकुलता ।
- क्षेमन्धर
क्रूरता को प्राप्त सिंहादि
तिर्यंचों द्वारा मनुष्यों का
भक्षण ।
- सीमंकर
कल्पवृक्ष अल्प फलवाले हुये,
मनुष्यों में लोभ की वृद्धि
होने से उनके स्वामित्व में
परस्पर झगड़ा।
-
सीमन्धर कल्पवृक्षों की अत्यन्त हानि के कारण कलह में वृद्धि।
-
विमलवाहन गमनागमन में बाधा / पीड़ा का अनुभव ।
उपदेश / समाधान
ये चन्द्र-सूर्य नित्य ही हैं,
तेजांग जाति के कल्पवृक्षों
का तेज मंद पडने से अब
प्रगट हुये हैं, इसप्रकार
सूर्य-चन्द्र का परिचय देकर
प्रजा का भय दूर किया।
तेजांग कल्पवृक्ष सर्वथा नष्ट
हो चुके हैं, ऐसा ज्ञान
कराकर अंधकार और
तारागणों का परिचय देकर
भय दूर किया।
काल के विकार से ये
तिर्यंच क्रूरता को प्राप्त हुये
हैं, अतः अब इनका विश्वास
कदापि नहीं करना, ऐसा
दिव्य उपदेश दिया।
उन क्रूर तिर्यंचों से अपनी
सुरक्षा के उपायभूत दण्डादि
रखने का उपदेश दिया।
कल्पवृक्षों की सीमाओं के
निर्धारण द्वारा पारस्परिक
संघर्ष पर रोक।
कल्पवृक्षों को चिन्हित करके
उनके स्वामित्व का विभाजन।
हाथी, घोड़ा आदि की सवारी
तथा वाहनों के प्रयोग का
उपदेश।
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में क्रम
नाम
समस्या / परिस्थिति
उपदेश / समाधान
चक्षुष्मान्
अबतक सन्तान का मुख
देखने से पूर्व ही माता-
पिता का मरण हो जाता था,
पर अब सन्तान का मुख देखने के बाद मरण होने लगा, अतः अपने ही बालकों को देखकर
भयभीत होना।
सन्तान का परिचय देकर
भय दूर किया।
यशस्वी
भोगभूमिज युगल बालकों का
नाम रखनेतक जीवित रहनेलगे। बालकों के नामकरण की
शिक्षा ।
अभिचन्द्र
माता-पिता बालकों का
बोलना व खेलना देखने तक
जीवित रहने लगे ।
शिशुओं का रुदन रोकने
हेतु उपदेश तथा उन्हें
बोलना एवं खेलना सिखाने
की शिक्षा।
चन्द्राभ
शीत बढ गई, तुषार छाने
लगा तथा अतिवायु चलने
लगी थी।
सूर्य की किरणों से शीत
निवारण की शिक्षा तथा
कर्मभूमि की निकटता का
ज्ञान ।
मरुदेव
मेघ, वर्षा, बिजली, नदी, पर्वत आदि के दर्शन।
नौका, छाता आदि के प्रयोग का उपदेश तथा पर्वत पर
सीढ़ियाँ बनाने की शिक्षा । 13.
प्रसेनजित्
वर्तिपटल (जरायु) से वेष्टित युगल शिशु का जन्म देखकर
माता-पिता भयभीत ।
वर्तिपटल (जरायु) दूर करने का उपदेश।
नाभिराय
बालकों का नाभिनाल अत्यन्त लम्बा होने लगा तथा कल्पवृक्षों का अत्यन्त अभाव हो गया।
पृथ्वी पर औषधि, धान्य व
फलों की उत्पत्ति होने लगी। नाभिनाल काटने का एवं
आजीविका के उपाय का
उपदेश, औषधियों व धान्य
आदि की पहिचान तथा
उनके प्रयोग की शिक्षा ।
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में अवसर्पिणी के अंतिम तीन काल (कर्म भूमि) – जिस भूमि में असि, मसि, कृषि, विद्या, शिल्प, वाणिज्य आदि कर्म की प्रधानता हो, वह कर्मभूमि है। इसके अन्तर्गत जिन दुःषमादि तीन काल विभागों की गणना की जाती है, वे विभाग कृषि आदि षट्कर्म प्रधान होने के कारण कर्मभूमि के नाम से अभिहित किये जाते हैं।
जैन परम्परानुसार वर्तमान कल्पार्द्ध में कर्मभूमि की व्यवस्था के आद्य संस्थापक राजा ऋषभदेव थे। उन्होंने ही जीविकोपार्जन के लिये भारतवासियों को सर्वप्रथम षट्कर्मों का उपदेश दिया। अंतिम कुलकर नाभिराय के पुत्र प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव एवं उनके पुत्र प्रथम चक्रवर्ती सम्राट भरत भी सुषमा-दुषमा नामक तीसरे काल में ही उत्पन्न हुये। इसी काल में ऋषभदेव का निर्वाण भी हो गया। यद्यपि तृतीय काल भोगभूमि का काल है, तथापि इस काल के अंतिम चरणों में ही कर्मभूमि का प्रारंभ हो गया था।
अवसर्पिणी का चतुर्थ काल (दुषमा-सुषमा) – अवसर्पिणी काल के प्रारंभ से 9 कोड़ाकोड़ी सागर तक चलता हुआ भोगभूमि का काल समाप्त होने के पश्चात् 1 कोड़ाकोड़ी सागर में 42000 वर्ष कम प्रमाण वाला दुषमा-सुषमा नामक चौथा काल प्रारंभ होता है। यह काल ऋषभदेव के निर्वाण जाने के 3 वर्ष, 8 माह 15 दिन पश्चात् प्रारंभ हुआ।128 128. तिलोयपण्णत्ती, 4/1287 काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में क्रम
नाम
समस्या / परिस्थिति
उपदेश / समाधान
चक्षुष्मान्
अबतक सन्तान का मुख
देखने से पूर्व ही माता-
पिता का मरण हो जाता था,
पर अब सन्तान का मुख देखने के बाद मरण होने लगा, अतः अपने ही बालकों को देखकर
भयभीत होना।
सन्तान का परिचय देकर
भय दूर किया।
यशस्वी
भोगभूमिज युगल बालकों का
नाम रखनेतक जीवित रहनेलगे। बालकों के नामकरण की
शिक्षा।
अभिचन्द्र
माता-पिता बालकों का
बोलना व खेलना देखने तक
जीवित रहने लगे।
शिशुओं का रुदन रोकने
हेतु उपदेश तथा उन्हें
बोलना एवं खेलना सिखाने
की शिक्षा।
चन्द्राभ
शीत बढ गई, तुषार छाने
लगा तथा अतिवायु चलने
लगी थी।
सूर्य की किरणों से शीत
निवारण की शिक्षा तथा
कर्मभूमि की निकटता का
ज्ञान।
मरुदेव
मेघ, वर्षा, बिजली, नदी, पर्वत आदि के दर्शन।
नौका, छाता आदि के प्रयोग का उपदेश तथा पर्वत पर
सीढ़ियाँ बनाने की शिक्षा। 13.
प्रसेनजित्
वर्तिपटल (जरायु) से वेष्टित युगल शिशु का जन्म देखकर
माता-पिता भयभीत।
वर्तिपटल (जरायु) दूर करने का उपदेश।
नाभिराय
बालकों का नाभिनाल अत्यन्त लम्बा होने लगा तथा कल्पवृक्षों का अत्यन्त अभाव हो गया।
पृथ्वी पर औषधि, धान्य व
फलों की उत्पत्ति होने लगी। नाभिनाल काटने का एवं
आजीविका के उपाय का
उपदेश, औषधियों व धान्य
आदि की पहिचान तथा
उनके प्रयोग की शिक्षा।
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में अवसर्पिणी के अंतिम तीन काल (कर्म भूमि) – जिस भूमि में असि, मसि, कृषि, विद्या, शिल्प, वाणिज्य आदि कर्म की प्रधानता हो, वह कर्मभूमि है। इसके अन्तर्गत जिन दुःषमादि तीन काल विभागों की गणना की जाती है, वे विभाग कृषि आदि षट्कर्म प्रधान होने के कारण कर्मभूमि के नाम से अभिहित किये जाते हैं।
जैन परम्परानुसार वर्तमान कल्पार्द्ध में कर्मभूमि की व्यवस्था के आद्य संस्थापक राजा ऋषभदेव थे। उन्होंने ही जीविकोपार्जन के लिये भारतवासियों को सर्वप्रथम षट्कर्मों का उपदेश दिया। अंतिम कुलकर नाभिराय के पुत्र प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव एवं उनके पुत्र प्रथम चक्रवर्ती सम्राट भरत भी सुषमा-दुषमा नामक तीसरे काल में ही उत्पन्न हुये। इसी काल में ऋषभदेव का निर्वाण भी हो गया। यद्यपि तृतीय काल भोगभूमि का काल है, तथापि इस काल के अंतिम चरणों में ही कर्मभूमि का प्रारंभ हो गया था।
अवसर्पिणी का चतुर्थ काल (दुषमा-सुषमा) – अवसर्पिणी काल के प्रारंभ से 9 कोड़ाकोड़ी सागर तक चलता हुआ भोगभूमि का काल समाप्त होने के पश्चात् 1 कोड़ाकोड़ी सागर में 42000 वर्ष कम प्रमाण वाला दुषमा-सुषमा नामक चौथा काल प्रारंभ होता है। यह काल ऋषभदेव के निर्वाण जाने के 3 वर्ष, 8 माह 15 दिन पश्चात् प्रारंभ हुआ।128 128. तिलोयपण्णत्ती, 4/1287 काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
इस काल में कल्पवृक्षों का पूर्णतः अभाव होता है और उनके स्थान पर नाना प्रकार की वनस्पतियाँ स्वयमेव उगने लगती हैं। पहले तो मानव जीवन इन्हीं पर आधारित रहा, किन्तु धीरे-धीरे जब इनका भी अभाव होने लगा तब मानव ने कृषि आदि श्रमपूर्ण कार्यों से अपनी आवश्यकतानुसार उनका उत्पादन आदि प्रारम्भ कर दिया। कृषि आदि षट् कर्मों की मुख्यता से ही इस काल को कर्मभूमि का काल कहा गया है।
इस काल के प्रारंभ में उत्कृष्ट आयु 1 कोटि पूर्व की होती है, शरीर की उत्कृष्ट अवगाहना (ऊँचाई) 525 धनुष तथा पृष्ठ भाग की हड्डियाँ अड़तालीस होती है। 129 लोकविभाग में इनकी उत्कृष्ट ऊँचाई 500 धनुष बताई है। 130 इनकी उत्कृष्ट आयु लगभग एक कोड़ाकोड़ी सागर काल तक क्रमशः घटते-घटते अन्त में 120 वर्ष रह जाती है। कर्म भूमि के सभी मनुष्य, तिर्यंचों की जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त होती है। 131
तरेसठ शलाका पुरुष –
इस चतुर्थ काल में भरत एवं ऐरावत क्षेत्र में पुण्योदय से मनुष्यों में श्रेष्ठ और सम्पूर्ण लोक में प्रसिद्ध 63 शलाका पुरुष – 24 तीर्थंकर, 12 चक्रवर्ती, 9 बलभद्र, 9 नारायण और 9 प्रतिनारायण उत्पन्न होते हैं। 132 ये सभी पदवियाँ सम्यग्दृष्टि जीवों को ही प्राप्त 129. तिलोयपण्णत्ती, 4/1288
-
लोकविभाग, 5/143
-
त्रिलोकसार, गाथा-330
-
(1) तिलोयपण्णत्ती, 4/517-518
(2) लोकविभाग, 5/142
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
होती हैं। पश्चात् इनमें से नरक जाने वालों के सम्यक्त्व छूट जाता है; किन्तु वे भी भविष्य में कभी न कभी पुनः सम्यक्त्व लेकर मोक्ष अवश्य जाते हैं।
तीर्थकर – जो धर्मतीर्थ का उपदेश देते हैं, समवशरण
आदि विभूतियों से युक्त होते हैं और जिनके तीर्थंकर नामकर्म 133 नाम का महापुण्य का उदय होता है, उन्हें तीर्थंकर कहते हैं। चार घातिया कर्मों का अभाव होने से इनकी अरिहंत संज्ञा है। इनके जीवन में सर्वोत्कृष्ट पुण्योदय दिखाई देता है; इसलिये आचार्य कुन्दकुन्ददेव ने इनके लिये पुण्णफलां अरहंता 134 शब्द का प्रयोग किया है।
प्रत्येक उत्सर्पिणी व अवसर्पिणी काल में 24 तीर्थंकर होते हैं। ये सभी जैन धर्म के प्रवर्तक हैं, सिद्धान्तों को बताने वाले हैं; बनाने वाले नहीं हैं। ये प्राणी मात्र को समान बताकर, सबके प्रति समभाव का उपदेश देते हैं। आचार्य प्रभाचन्द्र तीर्थंकर का स्वरूप स्पष्ट करते हुये लिखते हैं –
‘तीर्थकृतः संसारोत्तरणहेतुभूतत्वात्तीर्थमिव तीर्थमागमः तत्कृतवतः ।’ 135 अर्थात् संसार से तारने के कारणभूत हो, वह तीर्थ है, ऐसा तीर्थ आगम है, उसके कर्त्ता तीर्थंकर हैं। धर्मतीर्थ को चलाने वाले होने से ये तीर्थंकर कहलाते हैं। इनकी बहुत बड़ी धर्मसभा होती है, जिसे समवशरण के नाम से जाना जाता है। 133. तीर्थकर नामकर्म – ज्ञानावरण आदि आठ कर्मों में नामकर्म की एक प्रकृति। इस कर्म के उदय में तीर्थंकरपना होता है।
-
प्रवचनसार, गाथा-45
-
समाधितंत्र, श्लोक-2 संस्कृत टीका
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
इस काल में कल्पवृक्षों का पूर्णतः अभाव होता है और उनके स्थान पर नाना प्रकार की वनस्पतियाँ स्वयमेव उगने लगती हैं। पहले तो मानव जीवन इन्हीं पर आधारित रहा, किन्तु धीरे-धीरे जब इनका भी अभाव होने लगा तब मानव ने कृषि आदि श्रमपूर्ण कार्यों से अपनी आवश्यकतानुसार उनका उत्पादन आदि प्रारम्भ कर दिया। कृषि आदि षट् कर्मों की मुख्यता से ही इस काल को कर्मभूमि का काल कहा गया है।
इस काल के प्रारंभ में उत्कृष्ट आयु 1 कोटि पूर्व की होती है, शरीर की उत्कृष्ट अवगाहना (ऊँचाई) 525 धनुष तथा पृष्ठ भाग की हड्डियाँ अड़तालीस होती है। 129 लोकविभाग में इनकी उत्कृष्ट ऊँचाई 500 धनुष बताई है। 130 इनकी उत्कृष्ट आयु लगभग एक कोड़ाकोड़ी सागर काल तक क्रमशः घटते-घटते अन्त में 120 वर्ष रह जाती है। कर्म भूमि के सभी मनुष्य, तिर्यंचों की जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त होती है। 131
तरेसठ शलाका पुरुष –
इस चतुर्थ काल में भरत एवं ऐरावत क्षेत्र में पुण्योदय से मनुष्यों में श्रेष्ठ और सम्पूर्ण लोक में प्रसिद्ध 63 शलाका पुरुष – 24 तीर्थंकर, 12 चक्रवर्ती, 9 बलभद्र, 9 नारायण और 9 प्रतिनारायण उत्पन्न होते हैं। 132 ये सभी पदवियाँ सम्यग्दृष्टि जीवों को ही प्राप्त 129. तिलोयपण्णत्ती, 4/1288
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लोकविभाग, 5/143
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त्रिलोकसार, गाथा-330
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(1) तिलोयपण्णत्ती, 4/517-518
(2) लोकविभाग, 5/142
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
होती हैं। पश्चात् इनमें से नरक जाने वालों के सम्यक्त्व छूट जाता है; किन्तु वे भी भविष्य में कभी न कभी पुनः सम्यक्त्व लेकर मोक्ष अवश्य जाते हैं।
तीर्थकर – जो धर्मतीर्थ का उपदेश देते हैं, समवशरण
आदि विभूतियों से युक्त होते हैं और जिनके तीर्थंकर नामकर्म 133 नाम का महापुण्य का उदय होता है, उन्हें तीर्थंकर कहते हैं। चार घातिया कर्मों का अभाव होने से इनकी अरिहंत संज्ञा है। इनके जीवन में सर्वोत्कृष्ट पुण्योदय दिखाई देता है; इसलिये आचार्य कुन्दकुन्ददेव ने इनके लिये पुण्णफलां अरहंता 134 शब्द का प्रयोग किया है।
प्रत्येक उत्सर्पिणी व अवसर्पिणी काल में 24 तीर्थंकर होते हैं। ये सभी जैन धर्म के प्रवर्तक हैं, सिद्धान्तों को बताने वाले हैं; बनाने वाले नहीं हैं। ये प्राणी मात्र को समान बताकर, सबके प्रति समभाव का उपदेश देते हैं। आचार्य प्रभाचन्द्र तीर्थंकर का स्वरूप स्पष्ट करते हुये लिखते हैं –
‘तीर्थकृतः संसारोत्तरणहेतुभूतत्वात्तीर्थमिव तीर्थमागमः तत्कृतवतः ।’ 135 अर्थात् संसार से तारने के कारणभूत हो, वह तीर्थ है, ऐसा तीर्थ आगम है, उसके कर्त्ता तीर्थंकर हैं। धर्मतीर्थ को चलाने वाले होने से ये तीर्थंकर कहलाते हैं। इनकी बहुत बड़ी धर्मसभा होती है, जिसे समवशरण के नाम से जाना जाता है। 133. तीर्थकर नामकर्म – ज्ञानावरण आदि आठ कर्मों में नामकर्म की एक प्रकृति। इस कर्म के उदय में तीर्थंकरपना होता है।
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प्रवचनसार, गाथा-45
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समाधितंत्र, श्लोक-2 संस्कृत टीका
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
आचार्य यतिवृषभ136 कहते हैं – इसमें पूर्वादि प्रदक्षिणा रूप से 12 कोठे (सभा) होते हैं। जिनमें उनके प्रमुख शिष्य गणधर एवं मुनिराज, चार प्रकार के देव, चार प्रकार की देवियाँ, आर्यिका व स्त्रियाँ, पुरुष एवं तिर्यंच बैठकर धर्मोपदेश का लाभ प्राप्त करते हैं। तिर्यंच गति के हाथी, सिंह, व्याघ्र और हिरणादि भी परस्पर बैर को छोड़कर समवशरण में मित्र भाव से बैठते हैं।
हम भी अनन्त बार समवशरण में गये, तीर्थंकर परमात्मा की वाणी भी सुनी, उनकी महिमा भी आई; किन्तु फिर भी अपने निज ज्ञायक की महिमा एवं उसका अवलम्बन न होने से संसार समुद्र से पार होने की राह न मिल सकी।
चक्रवर्ती – प्रत्येक चतुर्थ काल में 12 चक्रवर्ती होते हैं। वर्तमान चतुर्थ काल में भरत क्षेत्र में भरत, सगर, मघवा, सनत्कुमार, शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ, सुभौम, पद्म, हरिषेण, जयसेन और ब्रह्मदत्त – ये 12 चक्रवर्ती137 छह खण्डरूप पृथ्वीमंडल को जीतने वाले परमप्रतापी पुरुष हुये हैं।
इन सभी चक्रवर्तियों का वैभव तिलोयपण्णत्ती में 4/1382 से 1409 तक बहुत विस्तार से बताया है। इनके 96000 रानियाँ, 84 लाख हाथी, 18 करोड़ घोड़े, कई करोड़ विद्याधर, 88000 म्लेच्छ राजा, 32000 मुकुटबद्ध राजा, इतनी ही नाट्यशालायें, इतनी ही संगीत शालायें, 14 रत्न, 9 निधियाँ, 32000 अंगरक्षक देव, छत्र, 32 चॅवर आदि होते हैं। इन समस्त दिव्य वैभव से युक्त होकर वे 136. तिलोयपण्णत्ती, 4/865-872 का सार
- वही, 4/522-523
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
दशांग भोग भोगते हैं।
ध्यान रहे, चक्रवर्ती यदि राज्य भोग में मरे तो नियम से सातवें नरक में जाते हैं और यदि राज्य का त्याग कर मुनिव्रत अंगीकार करे तो ऊर्ध्वगामी/स्वर्ग अथवा मोक्ष को प्राप्त होते हैं। ये सभी भोग हमें देखने/भोगने में तो बहुत अच्छे लगते हैं; किन्तु हैं बहुत खतरनाक। पंचेन्द्रिय विषय भोगों को भोगना अथवा भोगने के परिणामों का फल तो अधोगति ही है; अतः सावधान रहकर इनसे विरक्त होने की भावना भाना चाहिये।
बलदेव, नारायण व प्रतिनारायण – वर्तमान अवसर्पिणी
के चतुर्थ काल में तीर्थंकर एवं चक्रवर्तियों के समान ही विशिष्ट पुण्यशाली 9 बलदेव, 9 नारायण एवं 9 प्रतिनारायण हुये हैं। तिलोयपण्णत्ती138 में उन सभी के नामों का उल्लेख निम्नानुसार मिलता है – विजय, अचल, सुधर्म, सुप्रभ, सुदर्शन, नन्दी, नन्दिमित्र, राम और पद्म – ये नौ बलदेव हुये हैं। त्रिपृष्ठ, द्विपृष्ठ, स्वयंभू, पुरुषोत्तम, पुरुषसिंह, पुण्डरीक, दत्त, नारायण (लक्ष्मण) और कृष्ण – ये नौ नारायण (विष्णु) हैं तथा अश्वग्रीव, तारक, मेरक, मधुकैटभ, निशुंभ, बलि, प्रहरण, रावण और जरासंध – ये नौ प्रतिनारायण (प्रतिशत्रु) हैं। इनके पर्यायान्तर के संबंध में आचार्य यतिवृषभ का मूल कथन निम्नानुसार है –
'उड्ढंगामी सव्वे बलदेवा केसवा अधोगामी’139 अर्थात्
सभी बलदेव नियम से ऊर्ध्वगामी (स्वर्ग या मोक्षगामी) होते हैं 138. तिलोयपण्णत्ती, 4/524-526 तथा 4/1423-1425
- वही, 4/1448
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
आचार्य यतिवृषभ136 कहते हैं – इसमें पूर्वादि प्रदक्षिणा रूप से 12 कोठे (सभा) होते हैं। जिनमें उनके प्रमुख शिष्य गणधर एवं मुनिराज, चार प्रकार के देव, चार प्रकार की देवियाँ, आर्यिका व स्त्रियाँ, पुरुष एवं तिर्यंच बैठकर धर्मोपदेश का लाभ प्राप्त करते हैं। तिर्यंच गति के हाथी, सिंह, व्याघ्र और हिरणादि भी परस्पर बैर को छोड़कर समवशरण में मित्र भाव से बैठते हैं।
हम भी अनन्त बार समवशरण में गये, तीर्थंकर परमात्मा की वाणी भी सुनी, उनकी महिमा भी आई; किन्तु फिर भी अपने निज ज्ञायक की महिमा एवं उसका अवलम्बन न होने से संसार समुद्र से पार होने की राह न मिल सकी।
चक्रवर्ती – प्रत्येक चतुर्थ काल में 12 चक्रवर्ती होते हैं। वर्तमान चतुर्थ काल में भरत क्षेत्र में भरत, सगर, मघवा, सनत्कुमार, शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ, सुभौम, पद्म, हरिषेण, जयसेन और ब्रह्मदत्त – ये 12 चक्रवर्ती137 छह खण्डरूप पृथ्वीमंडल को जीतने वाले परमप्रतापी पुरुष हुये हैं।
इन सभी चक्रवर्तियों का वैभव तिलोयपण्णत्ती में 4/1382 से 1409 तक बहुत विस्तार से बताया है। इनके 96000 रानियाँ, 84 लाख हाथी, 18 करोड़ घोड़े, कई करोड़ विद्याधर, 88000 म्लेच्छ राजा, 32000 मुकुटबद्ध राजा, इतनी ही नाट्यशालायें, इतनी ही संगीत शालायें, 14 रत्न, 9 निधियाँ, 32000 अंगरक्षक देव, छत्र, 32 चॅवर आदि होते हैं। इन समस्त दिव्य वैभव से युक्त होकर वे 136. तिलोयपण्णत्ती, 4/865–872 का सार
- वही, 4/522–523
काल चक्र : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में
दशांग भोग भोगते हैं।
ध्यान रहे, चक्रवर्ती यदि राज्य भोग में मरे तो नियम से सातवें नरक में जाते हैं और यदि राज्य का त्याग कर मुनिव्रत अंगीकार करे तो ऊर्ध्वगामी/स्वर्ग अथवा मोक्ष को प्राप्त होते हैं। ये सभी भोग हमें देखने/भोगने में तो बहुत अच्छे लगते हैं; किन्तु हैं बहुत खतरनाक। पंचेन्द्रिय विषय भोगों को भोगना अथवा भोगने के परिणामों का फल तो अधोगति ही है; अतः सावधान रहकर इनसे विरक्त होने की भावना भाना चाहिये।
बलदेव, नारायण व प्रतिनारायण – वर्तमान अवसर्पिणी
के चतुर्थ काल में तीर्थंकर एवं चक्रवर्तियों के समान ही विशिष्ट पुण्यशाली 9 बलदेव, 9 नारायण एवं 9 प्रतिनारायण हुये हैं। तिलोयपण्णत्ती138 में उन सभी के नामों का उल्लेख निम्नानुसार मिलता है – विजय, अचल, सुधर्म, सुप्रभ, सुदर्शन, नन्दी, नन्दिमित्र, राम और पद्म – ये नौ बलदेव हुये हैं। त्रिपृष्ठ, द्विपृष्ठ, स्वयंभू, पुरुषोत्तम, पुरुषसिंह, पुण्डरीक, दत्त, नारायण (लक्ष्मण) और कृष्ण – ये नौ नारायण (विष्णु) हैं तथा अश्वग्रीव, तारक, मेरक, मधुकैटभ, निशुंभ, बलि, प्रहरण, रावण और जरासंध – ये नौ प्रतिनारायण (प्रतिशत्रु) हैं।
- अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3664.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है
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