तर्ज : मैं देव श्री अरहंत पूजूँ …
ज्यों है अकृत्रिम भाव सुखमय, यों अकृत्रिम बिम्ब हैं।
अरु भाव क्षायिक के समान, सु कृत्रिम श्री जिनबिम्ब हैं ।। 1 ।।
हैं निर्विकारी जगत् में, करते महा उपकार हैं।
दर्शकर निजभाव लखि, भवि होंय भव से पार हैं।। 2।।
रागी की सूरत निरखते ही, भाव विकृत होत हैं।
प्रभु वीतरागी बिम्ब लखते, बहे आनन्द स्रोत है।। 3।।
ऐसा निमित्त सु जानकर, जिनबिम्ब को वंदन करूँ।
अरु निज अकृत्रिम सहज ज्ञायक, भाव दृष्टि में धरूँ ।। 4 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ७३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’