जियको लोभ महा दुखदाई, जाकी शोभा ( ? )
जियको लोभ महा दुखदाई, जाकी शोभा ( ? )
लोभ करै मूरख संसारी, छांडै पण्डित शिव अधिकारी ॥ जियको. ॥
तजि घरवास फिरै वनमाहीं, कनक कामिनी छांडै नाहीं ।
लोक रिझावनको व्रत लीना, व्रत न होय ठगई सा कीना ॥ १ ॥
लोभवशात जीव हत डारै, झूठ बोल चोरी चित धारै ।
नारि गहै परिग्रह विसतारै, पाँच पाप कर नरक सिधारै ॥ २ ॥
जोगी जती गृही वनवासी, बैरागी दरवेश सन्यासी ।
अजस खान जसकी नहिं रेखा, ‘द्यानत’ जिनकै लोभ विशेखा ॥ ३ ॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन १३७