जिया कब तक घूमेगा संसार में,
चलो चलो न चेतन-दरबार में ।॥ टेक ॥
अनादि काल से घूम रहा है, पर में तू सुख को खोज रहा है;
जहाँ सुख का नहीं है ठिकाना। चलो चलो न… ॥1 ॥
सिद्ध समान स्वभाव है चेतन, जड़ कर्मों से भिन्न है चेतन;
स्व सन्मुख पर्याय प्रगटाओ ना। चलो चलो न… ॥2॥
अब तक जीवन ऐसा बिताया, संसार को ही तूने बढ़ाया;
आज पुण्य उदय है हमारा। चलो चलो न… ॥3॥
मृत्यु महोत्सव की तैयारी करले, ममता को तजकर समता धरले;
तेरे पास है सुख का खजाना। चलो चलो न… ॥4॥
आनन्द सागर अन्तर में उछले, आनन्द-आनन्द की लहर है डोले;
उस सागर में डुबकी लगाओ ना। चलो चलो न… ॥5॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ २१७