जिया जी थानें किण विध राखूं समझाय | Jiya Ji Thane Kin Vidh Rakhun Samjhay

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जिया जी थानें किण विध राखूं समझाय ॥
घणां दिनां का बिछड़्या पीवण, कुमति रही छे लिपटाय ॥

या तो थानें पर-घर राखे, लालच व्यसन लगाय ॥
मो-मदिरा में किया दीवाना, तीन रतन चुराय ॥

एक थ्यात मम रूप निहारो, निज घर माहीं आय ॥
बुधजन अविचल सुख पाओगे, भव संकट टर जाय ॥

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स्रोत: JinSwara ऑडियो संग्रह।