जीवराज उड़ के जाओ सम्मेद शिखर में,
भावसहित वंदन करो, पार्श्व चरण में।
जीयरा…ओ जीयरा… ओ जीयरा… ।। टेक ।।
आज सिद्धों से अपनी बात होके रहेगी,
शुद्ध आतम से मुलाकात होके रहेगी ।
रंग सहित राग रहित भेद रहित जो,
मोह रहित क्षोभ रहित शुद्ध बुद्ध जो।।1।।
ध्रुव अनुपम अचल गति जिनने पाई है,
सारी उपमायें जिनसे आज शरमाई हैं।
अनंतज्ञान अनंतसुख अनंतवीर्यमय,
अनंतसूक्ष्म नामरहित- अव्याबाधी हैं ।।2।।
अहो शाश्वत सिद्धधाम तीर्थराज है,
यहाँ आकर प्रसन्न चैतन्यराज है।
शुरू करें आज यहाँ आत्म साधना,
चतुर्गति में हो कभी जन्म-मरण न।।३।।
स्रोत: भक्ति-भावना (प्रथम खण्ड)
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
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