जीव तू अनादिहीतैं भूल्यौ शिवगैलवा | Jiv Tu Anadihitain Bhulyau Shivagailava

जीव तू अनादिहीतैं भूल्यौ शिवगैलवा

जीव तू अनादिहीतैं भूल्यौ शिवगैलवा ।।टेक।।

मोहमदवार पियौ, स्वपद विसार दियौ, पर अपनाय लियौ,
इन्द्रिसुखमें रचियौ, भवतैं न भियौ, न तजियौ मनमैलवा ।।१।।जीव. ।।

मिथ्या ज्ञान आचरन धरिकर कुमरन, तीन लोककी धरन,
तामें कियो है फिरन, पायो न शरन, न लहायौ सुखशैलवा ।।२।।जीव. ।।

अब नरभव पायौ, सुथल सुकुल आयौ, जिन उपदेश भायौ,
‘दौल’ झट छिटकायौ, परपरनति दुखदायिनी चुरलैवा ।।३।।जीव. ।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १५६

अर्थ

संसारमें मनुष्यके लिए आत्मचिन्तन और आत्मालोचन अत्यन्त कठिन काम है। वे मनुष्य बहुत विरले हैं जिन्हें अपन् सत्य आत्म-स्वरूपः की अनुभूति हो जाती हैं और जो आत्मालोचनपूर्वक अपन दोषोंकी छान-बीन करके सन्मार्गपर जान का जी-जानसे प्रयत्न करते हैं। वैसे अधिकांश जन-समूह संसारकी इस मोहनी मायापर इतना मोहित रहता है कि उसकी आत्म-रूपको समझनेकी कभी प्रवृत्ति ही नहीं होती। वह न आत्म-बोध कर पाता है, त आत्मनिरीक्षणका अवसर ही उसे जीवनम प्राप्त होता है और न ही वह सन्मार्गपर चलता हुआ नजर आता है। इस प्रकारका मानव अपन जीवनमें अत्यन्त असहाय, दीन-दुर्बल और पराधीन रहकर अनन्त पीड़ाओंका चिर-संगी बना रहता है। इसके विपरीत जिसे कुछ आत्म-रूपका साक्षात्कार हुआ है और जो आत्मालोचनपूर्वक अपनी जीवन-साधनामें तन्मय है वह एक दिन अवश्यमेव शाश्वतिक सिद्धिको प्राप्त कर अनन्त कल्याणका अनुभोक्ता होता है। पं० दौलतरामके अन्तस्को चिरकालके पश्चात् आज आत्म-भान हुआ है और जैसे ही उसे आत्म-स्वरूपकी उपलब्धि हुई वह इस प्रकार आत्मालोचनमें तत्पर हो जाता है। वह अपनी आत्माको लक्ष्यमें रखकर कहता है :-

स्रोत: अध्यात्म पदावली।

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