जितना देखेगा बाहर में, उतना होगा हैरान ही तू।
तुझ में दुःख का अस्तित्व नहीं, क्यों व्यर्थ अरे परेशान है तू ॥ टेक ॥
ज्यों सींग नहीं खरगोशों के, जग भर में कहीं देखे जाते।
पर में तेरा सुख लेश न त्यों, खुद ही अनंत सुख खान है तू ॥ 1 ॥
ज्यों-ज्यों दौड़े आगे दिखता, कोरा भ्रम पानी नहीं मिले।
त्यों विषय सुख मृग-तृष्णा सम, क्यों मूढ़ गँवावे जान ही तू ॥ 2 ॥
ज्यों शराबी सोचे मद्य बिना, नहीं चैन मुझे मिल सकता है।
त्यों भूल सहज सुख मान विषय सुख, आज बना हैवान है तू ॥ 3 ॥
अब दूर ही रहना भव्य जरा, वैतरिणी सम दाहोत्पादक।
ऊपर-ऊपर रमणीक लगे, पर मान इन्हें विष खान ही तू॥ 4 ॥
भो 'आत्मन् ’ ! अब भी भ्रम छोड़ो, निज ज्ञानानन्द स्वभाव लखो।
पर्याय दृष्टि अब गौण करो, अनुभव कर खुद भगवान् है तू ॥ 5 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३४६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’