तर्जः जंगल में मुनिराज अहो…
जिसने जिनवाणी को अपनी, सच्ची मात बनाई ।
नहीं बनानी पड़ती उसको, दूजी माता भाई ॥ टेक ॥
स्वयं सिद्ध अनुपम शुद्धातम, जिनवाणी दरशावे।
पर्यायों के स्वांगों से, न्यारा शुद्ध चिद्रूप दिखावे ॥
महिमावंत स्वरूप सुनत ही, भेदज्ञान प्रगटाई ॥ 1 ॥
रागादिक सब न्यारे भासे, एक स्वरूप दिखाता।
अहो ! अपरिमित सुख का सागर, अन्तर में लहराता ॥
ढले स्वयं उपयोग स्वयं में, भेद न देय दिखाई ॥ 2 ॥
मोह पलावे द्रव्य दृष्टि हो, भव सन्तति कट जाती।
अपनी प्रभुता अपने में ही, मुक्त रूप दिखलाती ॥
उस आनंद को वे ही जानें, जिन अंतर विलसाई ॥ 3 ॥
घर कारागृह वनिता बेड़ी, भोग-रोग सम दीखें।
निज रस फिर न सुहाये, अन्य बाह्य रस फीके ॥
रहें उदास अलिप्त, धन्य निर्ग्रन्थ भावना भाई ॥ 4 ॥
होय विरागी सब परिग्रह तज, जिन मुद्रा को धारें।
होय अकिंचन केशलोंच कर, मोह शत्रु को मारें ॥
प्रचुर स्व-संवेदन रस प्रगट्यो, चौकड़ी तीन नशाई ॥ 5 ॥
पंच महाव्रत समिति शोभे, पंचेन्द्रिय जय पावें।
षट्-आवश्यक मज्जन, मंजन रहित दिखलावें ॥
पाणि पात्र में खड़े-खड़े, एक बार ही अशन कराई ॥ 6 ॥
केश घास सम लुंचे निर्मम, इक करवट भू-पर सोवें।
नाम मात्र निद्रा है मुनि तो, जागृत निजपद जोवें ॥
परीषह विजयी उपसर्गों में, अविचल ध्यान लगाई ॥ 7 ॥
अहो ! यतीश्वर सावधान रह, निज स्वरूप को साधें।
क्षपक श्रेणी आरोहण करते, कर्म स्वयं ही भागें ॥
ध्रुव स्वभाव को ध्याते-ध्याते, ध्रुव प्रभुता प्रगटाई ॥ 8 ॥
अहो ! ज्ञान में भव तो नहीं है, भव का भाव नहीं है।
ज्ञान स्वरूप सहज शुद्धातम, एकहि शरण सही है ॥
प्रगटी ज्ञानानुभूति अहो ! तृप्ति निज में ही पाई ॥ १॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १६३ से १६५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’