जिनवानी प्रानी! जान लै रे | Jinvani Prani! Jaan Lai Re

जिनवानी प्रानी! जान लै रे

जिनवानी प्रानी! जान लै रे …

छहों दरब परजाय गुन सरब, मन नीके सरधान लै रे॥जिनवानी. ॥१॥

देव धरम गुरु निहचै धर उर, पूजा दान प्रमान लै रे॥जिनवानी.॥२॥

‘द्यानत’ जान्यो जैन बखान्यो, ॐ अक्षर मन आन लै रे॥जिनवानी.॥३॥


Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन १३२

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अर्थ

हे प्राणी! तू जिनवाणी को जान ले, समझ ले। छहों द्रव्यों को उनकी गुण-पर्याय सहित अच्छी तरह से श्रद्धान करले । देव, शास्त्र और गुरु का निश्चय से, हृदय से श्रद्धान करके, उनकी पूजा करके, दान करने का प्रमाण निश्चित करले व उसका निर्वाह कर। द्यानतराय कहते हैं कि जैनों द्वारा ‘ऊ’ अक्षर को मन में धारण करके समझने का उपदेश दिया गया है।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।

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