जिनसहस्रनाम अर्घ्य | Jinsahasranam Arghya

गुण अनन्त हैं प्रभो आपके, मेरी है सामर्थ्य कहाँ।

सहस्रनाम से अर्चन करके, अर्घ्य चढ़ाऊँ आज यहाँ ॥

ॐ ह्रीं भगवज्जिनस्याऽष्टाधिकसहस्रनामेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।


Artist: ब्र० श्री रवींद्र जी आत्मन्
स्रोत: जिनेन्द्र आराधना संग्रह