तर्ज :- पत्थर के सनम तुझे हमने…
जिनराज मैंने तुझे अब तक, इस जगती का कर्ता माना।
बड़ी भूल हुई अरे मुझसे, मैं क्या समझा मैं क्या जाना ।।
चेहरा तेरा मन में लिये, मैं समझ रहा औरों की तरह।
तू ही है-2 मालिक मेरा, ये मान लिया औरों की तरह ।।
मुझसा ना हो ऽ ऽ ऽ कोई अंजाना, जिनराज मैंने तुझे ..।।1।।
सोचा था मैं माँगूँ तुझसे, धन-दौलत-वैभव अपने लिये।
देगें मुझे-2 लम्बी उमर, जीवन सुखद मेरे लिये।
आँखे खुली ऽ ऽ ऽ तब पहचाना, जिनराज मैंने तुझे … ।।2।।
वाणी सुनी जिनराज की, आँखे खुली मेरी तभी।
सस्ता मिला-2 समझा सही जिनवाणी को पाया तभी।
ठोकर लगी ऽ ऽ ऽ तब पहचाना, जिनराज मैंने तुझे … ।।3।।
ए काश समझ पाता पहले, नहीं जग का कोई करता है।
तय होता-2 सब कर्मों से ही, जो करता है सो भरता है।
जिन पथ मिला ऽऽऽ तब ही जाना, जिनराज मैंने तुझे…।।4।।