जिनरायके पाय सदा शरनं
जिनरायके पाय सदा शरनं
भव जल पतित निकारन कारन, अन्तरपापतिमिर हरनं ॥ जिन. ॥ १ ॥
परसी भूमि भई तीरथ सो, देव-मुकुट-मनि-छवि धरनं ॥ जिन. ॥ २ ॥
‘द्यानत’ प्रभु-पद-रज कब पावै, लागत भागत है मरनं ॥ जिन. ॥ ३ ॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ७५
खोज: Jinray Ke Pay Sada Sharanam
अर्थ
श्री जिनराज के पादपद्म की चरण कमल की मुझे सदा शरण है।
वे इस भवरूपी समुद्र से पापियों को बाहर निकालने व अंतः स्थल के पापरूपी अंधकार का विनाश करने के लिए कारण हैं।
जहाँ-जहाँ उनके चरणों का स्पर्श हुआ वह भूमि उनके स्पर्श से तीर्थ बन गई और वह भूमि देवों की मुकटों की मणियों की आभा से व्याप्त हो गई अर्थात् वह भूमि देशों द्वारा बंदनीय हो गई।
द्यानतराय कहते हैं कि कब प्रभु के चरणों की रज धूलि का स्पर्श हो अर्थात् प्राप्ति हो जिससे मृत्यु का भय अविलम्ब पलायन हो जाए अर्थात् प्रभु की सन्निधि मिल जाने पर मृत्यु की श्रृंखला भंग हो जाती है, टूट जाती है।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।
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