जिनेश्वर प्रभुता अपरम्पार | jineshvara prabhuta aparampara

तर्ज : प्रभु मैं हो गया भव से पार…

जिनेश्वर प्रभुता अपरम्पार ।

आप-आप में आपहि दीखे, आनन्द अपरम्पार ।। टेक।।

ज्ञान मात्र निज शुद्धातम में, शक्ति अनन्ता उछल रहीं हैं।
अन्तर्दृष्टि से प्रभु देखा, शक्ति अनन्ता विलस रहीं हैं ।।
ओर-छोर नहीं कहीं दिखावे, वैभव अपरम्पार ।। 1।।

स्याद्वाद वाणी में कथंचित्, कही परस्पर है सापेक्ष।
पर-पर की कुछ नहीं जरूरत, विलसे सहजपने निरपेक्ष ।।
अहो ! स्वाधीन अखण्ड प्रतापी, जीवराज अविकार।। 2।।

पूर्ण स्वयं में स्वयं-स्वयं से, सर्व प्रयोजन होवें सिद्ध ।
दुखकारी पर भाव न उपजें, स्वानुभूति में स्वयं प्रसिद्ध ।।
सहज अकर्त्ता परमानन्दमय, केवल जाननहार।। 3।।

धन्य-धन्य निज नाथ को पाया, निज में ही रम जाऊँ।
आधि-व्याधि-उपाधि रहित अब, परम समाधि सु पाऊँ ।।
तृप्त हुआ निर्मुक्त हुआ, मैं देखन- जाननहार।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ५८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’