तर्जः जिनगुण गाओ हर्षाओ…
जिनवर दर्शन मंगलकारी, जिनवर भक्ति मंगलकारी।
जिनवर वाणी मंगलकारी, जिनवर धर्म सु मंगलकारी ।। टेक ।।
महाभाग्य से हमने पाया, जिनवर दर्शन मंगलकारी।
महा हर्ष से हम भी गावें, जिनवर भक्ति मंगलकारी ।। 1 ।।
महानंद से सुनें-सुनावें, जिनवर वाणी मंगलकारी।
महाभाव से हम भी धारें, जिनवर धर्म सु मंगलकारी ।। 2 ।।
जिनदर्शन सम्यक्त्व का कारण, भक्ति करें सब पाप-प्रक्षालन।
जिनवाणी सद्बोध जगावे, धर्मी सहज मुक्ति-पद पावे।। 3।।
हम सब भक्ति भाव से आवें, भाव विशुद्धि सहज बढ़ावें ।
निर्मल भेदज्ञान प्रगटावें, ज्ञानमयी अनुभूति जगावें ।। मंगलकारी ।।4।।
प्रभु चरणों में जो नम जाये, निज स्वरूप में ही रम जाये।
सफल उन्हीं का जग में जीवन, पावन करता उनका सुमिरन ।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ४८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’