तर्जः प्रभु बाहुबली ऐसा बल हो…
जिनवर भक्ति आनंदमय हो, चरणों में शीस नवाते हैं।
हम यही भावना भाते हैं ।। टेक ।।
हे वीतराग सर्वज्ञ देव, इन्द्रादिक करते चरण सेव।
प्रभु धर्म तीर्थ आनंदकार, प्रगटे परिणति हो निर्विकार ।।
हम यही भावना भाते हैं ।। 1 ।।
प्रभु के चरणों का संबल हो, अंतर में दृष्टि का बल हो।
कर्मों की कुछ परवाह न हो, इन्द्रिय-विषयों की चाह न हो ।।
हम यही भावना भाते हैं ।। 2 ।।
बाहर में कुछ न सुहाता है, अंतर का आनंद भाता है।
निरपेक्ष रहें निर्द्वन्द्व रहें, निष्काम रहें, निःसंग रहें ।।
हम यही भावना भाते हैं ।। 3 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ४७ से ४८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’