तर्ज : तीरथ करने चली…
जिनवर भक्ति करें भव्यजन, भाव विशुद्धि बढ़ाने को।
आओ आओ प्रभु गुण गायें, भेदविज्ञान जगाने को।।टेक ।।
जिन सो जीव, जीव सो जिनवर, अन्तर में श्रद्धान करें।
नित्य निरंजन शाश्वत प्रभु का, अन्तर्मुख हो ध्यान धरें।।
शुद्धातम ही शरणभूत है, सुखमय शिवपद पाने को।।१।।
आधि व्याधि उपाधि न जिसमें, अन्तस्तत्व समाधि स्वरूप ।
दुख का कारण लेश न जिसमें, स्वयं सिद्ध आनन्द स्वरूप ।।
निर्विकल्प हो ध्यायें प्रभु सम, कर्मबन्ध विनशाने को।।२।।
इन्द्रिय-सुख तो सुखाभास है, सर्व दुःखों का मूल है।
जिन्हें चाह कर बोता मूरख, शिवपद में विष शूल है ।।
वीतराग की भक्ति केवल, वीतरागता पाने को।।3।।
कृषि में तृण सम इन्द्रिय सुख तो, सहज बीच में आते हैं।
किन्तु उन्हें ही पाकर ज्ञानी, साध्य नहीं विसराते हैं।।
हो विरक्त आराधन करते, अक्षय गुण प्रगटाने को।।4।।
इच्छाओं का हो अभाव ही, प्रभु का दर्शन करने से।
परमाल्हाद सहज ही बढ़ता, प्रभु मारग में चलने से ।।
प्रभु चरणों में शीश नवायें, निज पुरूषार्थ बढ़ाने को।।5।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’