तर्जः महावीर की जय बोल…
जिनवाणी सुनो सुखकार, फाटक हिय के खुलें।
जिनवाणी सुनो हितकार, सुख का मारग मिले ॥ टेक ॥
जिनवर-ध्वनित कही है ज्ञानी, नित्य बोधिनी माँ जिनवाणी।
सुनो वस्तु स्वरूप अविकार, मिथ्या मोह टले ॥ 1 ॥
निज स्वभाव की महिमा आवे, परिणति अंतर में ढल जावे।
होवे आनंद अपरम्पार, अन्तर्कमल खिले ॥ 2 ॥
वीतरागता मंगलकारी, परमधर्म है आनंदकारी।
भवि हर्ष सहित अवधार, भव से पार चलें ॥ ३॥
भक्ति सहित निज शीश नवाओ, गुण गाओ अरु पढ़ो-पढ़ाओ ।
ये ही तीन भुवन में सार, कर परिणाम भले ॥4॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १६२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’